मां की बाहें, पिता का दुलार तलाशती हैं हमारी आंखें, दर्द भरी किन्नरों की दास्तां, देखिए वीडियो में

    मां की बाहें, पिता का दुलार तलाशती हैं हमारी आंखें, दर्द भरी किन्नरों की दास्तां, देखिए वीडियो में

     ढुलमुलाते कदम से चलते हुए जब भी हम गिरते हैं, आंखें मां की बाहें और पिता का दुलार ही तलाशती हैं. राखी पर भाई-बहनों की प्यार भरी नोंक-झोंक में हम भी अपनी हिस्सेदारी चाहते. हमारी नींद भी दादी की कहानियों और नानी की लोरियों की भूखी हैं. जीवन की राह में हमें मां की दुआएं और पिता के मार्गदशन की दरकार है. शरीर के कुछ अंग जरूर विकृत हुए, पर मन स्नेह-दुलार वैसा ही चाहता जैसा आंगन के दूसरे फूलों को मिला. हम भी हैं आपके आंगन की गौरेया, हमें भी यहां चहकने-फुदकने दो. ओ मेरी मां...ओ बाबा, जब आप अपनाओगे, तभी तो सही अर्थों में समाज से सम्मान और सरकार से हक मिल सकेगा. किन्नरों की ऐसी ही बातें, कुछ ऐसा ही दर्द उभरा जमशेदपुर के एक कार्यक्रम में. मौका था किन्नरों के जीवन पर आधारित एक किताब के विमोचन का. इस मौके पर किन्नरों यानी थर्ड जेंडर के कई शख्स शरीक हुए. सुख-दुख की बातें हुईं. बधाई गीत-नृत्य की एक खूबसूरत शाम, समाज की इस उपेक्षित धारा के नाम.

    लौटकर लेते नहीं खबर

    इस मौके पर किन्नरों ने दर्द बयां करते हुए कहा कि हमें समाज शादी ब्याह, बच्चे के जन्म पर घर तो बुलाता है, लेकिन  अपने ही घर में हमारे जन्म पर मातम मनाया जाता है. बात यहीं तक सीमित नहीं. हमारे माता-पित ही हमारा परित्याग कर देते हैं. फिर लौट कर हमारी खबर नहीं लेते. जन्म तो किसी आंगन में होता, पर नसीब सड़क पर लिखा जाता.  किन्नरों के इस दुख, संघर्ष और उनकी जीवन यात्रा की आवाज़ बनी है एक पुस्तक "मां-पापा हम भी आपकी संतान हैं." टाटा स्टील से सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रा शरण  लिखित इस पुस्तक का सोनारी कम्युनिटी सेंटर में  विमोचन हुआ.

    पैरेंट्स से अपील

    मीडिया से बातचीत करते हुए चंद्रा शरण ने कहा कि अगर माता पिता किन्नर संतान का परित्याग न करें तो समाज भी उनको सहज स्वीकार कर लेगा. जब वे मजबूत बनेंगी तो अपनी समस्याओं और अधिकारों की तरफ सरकार का ध्यान भी पुरजोर तरीके से उठा पाएंगी. ये आसान नहीं लेकिन नामुमकिन भी नहीं. कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि डा  शुक्ला मोहंती ने मांग की कि आम छात्रों की तरह किन्नरों को भी स्कौलरशिप मिले. वहीं पुस्तक की समीक्षा करते हुए डा नेहा तिवारी ने इस पुस्तक को मील का पत्थर बताया जो आगे चलकर समाज की मनोवृत्ति को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. मुख्य अतिथि रंजना मिश्रा ने कहा कि इस पुस्तक को पढ़कर उनलोगों में भी जिम्मेदारी का भाव आएगा जिन्होंने किन्नर संतान का परित्याग कर दिया.

     


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