भूमिगत आग झेल रहे झरिया वासी अब बिजली और पानी से जुझ रहे, भाजपा-कांग्रेस से भी उम्मीद नहीं हुई पूरी

    भूमिगत आग झेल रहे झरिया वासी अब बिजली और पानी से जुझ रहे,  भाजपा-कांग्रेस से भी उम्मीद नहीं हुई पूरी

    धनबाद(DHANBAD) - 'आंचल में है दूध और आंखों में पानी' यही है झरिया की कहानी. न बिजली है न पानी.   भूमिगत आग  से झरिया को खतरा है फिर भी झरिया शहर अपनी रफ्तार में चलता है, अपने ढंग से जीता है.  झरिया की कहानी भी कुछ अजीब है, शहर को चाहिए 30 से 40 मेगावाट बिजली ,रात में गर्मी के दिनों में कुछ  अधिक जरूरत भी पड़ती  है लेकिन  इतनी बिजली भी शहर को नहीं मिलती है.  पानी की तो बात ही निराली है- आज के जमाने में भी जलकुंभी झरिया की जलापूर्ति को रोक देती है. और लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस जाते हैं और विभाग बहाना बनाकर बैठा रहता है. 

     52 साल बाद कांग्रेस की वापसी

     हालांकि यह एक दिन की बात नहीं है, झरिया इस तरह का दंश काफी दिनों से झेल रही है. झरिया में 2019 के चुनाव में लगभग 52 साल के बाद कांग्रेस की वापसी हुई और जब  झारखंड की सरकार में कांग्रेस शामिल हुई तो लोगों को लगा कि झरिया का कुछ भाग्य बदलेगा लेकिन ऐसा हो न सका.  जानकार बताते हैं कि 1967 में झरिया विधानसभा का गठन हुआ था.  52 साल पहले  यहां कांग्रेस जीती थी .  उसके बाद 2019 में कांग्रेस के टिकट पर  पूर्णिमा नीरज सिंह चुनाव जीती, लेकिन झरिया शहर को जो उम्मीद थी, वह उम्मीद धूल धूसरित  होने लगी है. 


      1977 से सूर्यदेव सिंह परिवार का कब्जा

     यह कहना गलत  नहीं होगी कि 1977 से ही झरिया शहर पर सूर्यदेव सिंह परिवार का प्रभुत्व  रहा है.  झरिया से सूर्यदेव सिंह 1977, 1980, 1985, 1990 में चुनाव जीते.  1991 में सूर्य देव बाबू  का निधन हो गया.  उसके बाद  1991 और 1995 में स्वर्गीय राजू यादव की पत्नी आबो  देवी विधायक बनी और बिहार सरकार में मंत्री तक बनी.  माडा  की अध्यक्ष भी बनी.  उसके बाद 2000 में सूर्यदेव सिंह के भाई बच्चा सिंह झरिया से चुनाव जीते और झारखंड सरकार में  नगर विकास मंत्री बने, फिर भी झरिया को अपेक्षित लाभ नहीं दिला पाए.  हालांकि उस समय सिंह मेंशन एकजुट था.  उसके बाद से ही विवाद बढ़ने लगा.   2005 और 2009 में सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह विधायक बनी लेकिन 2014 में बेटे संजीव सिंह के लिए सीट छोड़ दी और संजीव सिंह झरिया से विधायक बने.  

    2019 में चचेरे भाईयों और 2019 गोतनी के बीच लड़ाई

      उस वक्त उनके चचेरे भाई नीरज सिंह कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़े और दूसरे नंबर पर रहे.  2019 में झरिया सीट पर भाजपा और कांग्रेस में जबरदस्त टक्कर हुई और इस टक्कर में पूर्णिमा नीरज सिंह ने अपनी गोतनी रागिनी सिंह को 11000 से  भी अधिक वोटों से हराकर चुनाव जीत गई.  अभी झरिया से पूर्णिमा नीरज सिंह विधायक हैं लेकिन झरिया के लोग बिजली-पानी के लिए सड़क पर हैं ,रागिनी सिंह के नेतृत्व में विपक्ष हल्ला बोल रहा है और सत्ता पक्ष चुप है.  ऐसे में झरिया के लोग अब सवाल कर रहे हैं कि क्या बिजली -पानी उन्हें मिलेगा या नहीं. यह सवाल तो जाहिर तौर पर सत्ता पक्ष से ही पूछा जाएगा.  उनका सवाल यह भी है कि क्या पुनर्वास  के पहले ही लोगों को जानबूझकर तो परेशान नहीं किया जा रहा है,ताकि वह लोग शहर छोड़ कर हट जाए , इस सवाल में कितनी सच्चाई है यह  तो सरकार ही बता पाएगी लेकिन झरिया के लोग बिन  बिजली और बिन पानी   के बीच जिंदगी गुजार रहे है. 


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