राजनीति में बिना गॉड फादर के हासिल किया मुकाम, हार के बाद भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, जानिए कैसा है डॉ. लुईस मरांडी का राजनीतिक सफर

    राजनीति में बिना गॉड फादर के हासिल किया मुकाम, हार के बाद भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, जानिए कैसा है डॉ. लुईस मरांडी का राजनीतिक सफर

    दुमका(DUMKA): एक समय था जब हमारे समाज में महिला को अबला बोल दिया जाता था. लेकिन धीरे-धीरे समय बदला और इस बदलते समय के साथ महिलाओं ने यह साबित किया कि महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं. The News Post की खास पेशकश Know Your MLA में आज हम बात करेंगे दुमका जिला के जामा विधानसभा क्षेत्र से नव निर्वाचित विधायक डॉ. लुईस मरांडी की.

    कठिनाई के बाबजूद शिक्षा के प्रति समर्पित रही डॉ. लुईस

    एक सामान्य परिवार में डॉ. लुईस मरांडी का जन्म हुआ था. लेकिन बचपन से ही शिक्षा से लगाव रहा. कठिनाई के बावजूद अपनी लगन और मेहनत से स्कूली और उच्च शिक्षा प्राप्त की. अध्यापन कार्य से जुड़कर छात्रों का भविष्य संवारने वाली डॉ.लुईस मरांडी सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेती रही.  हालांकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था.

    डॉ. लुईस मरांडी का राजनीतिक सफर

    अलग झारखंड राज्य बनने के बाद भाजपा से जुड़कर डॉ. लुईस मरांडी राजनीति में सक्रिय हुई. भाजपा के लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई. भाजपा महिला शाखा की अध्यक्ष रहीं. झारखंड महिला आयोग की सदस्य भी बनाई गई. 2009 के चुनाव में दुमका विधानसभा सीट से भाजपा ने प्रत्याशी बनाया लेकिन सफलता नहीं मिली. हेमंत सोरेन ने उन्हें पराजित किया. 2012 में लुईस मरांडी भाजपा की राष्ट्रीय सचिव बनाई गई. 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर डॉ. लुईस मरांडी पर भरोसा जताया और इस बार वह पार्टी के भरोसे पर खरी भी उतरी. हेमंत सोरेन को पराजित कर दुमका की विधायक निर्वाचित हुई.

    रघुवर दास के नेतृत्व में गठित सरकार में लुईस मरांडी अल्पसंख्यक कल्याण, सामाजिक कल्याण, महिला एवं बाल विकास और कल्याण मंत्री बनाई गईं. मंत्री के रूप में उन्होंने न केवल दुमका बल्कि झारखंड राज्य में बेहतर कार्य किया. लेकिन 2019 के चुनाव में एक बार फिर हेमंत सोरेन ने इन्हें पराजित कर दिया. 2020 के उपचुनाव में भी डॉ. मरांडी को सफलता नहीं मिली और हेमंत सोरेन के छोटे भाई बसंत सोरेन से पराजय का सामना करना पड़ा. ऐसे में 2024 के चुनाव में भाजपा ने जब डॉ. लुईस मरांडी को चुनावी टिकट नहीं दिया तो बगावती तेवर अपनाते हुए उन्हों भाजपा छोड़ झामुमो का दामन थाम लिया. झामुमो ने जामा विधानसभा सीट से डॉ. लुईस मरांडी को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा जहां से चुनाव जीतने में वह सफल भी रहीं.

    राजनीति में कोई गॉड फादर नहीं, मेहनत से पाया मुकाम

    राजनीतिक उतार चढ़ाव के बीच डॉ. लुईस मरांडी कहती हैं कि उसने कभी भी जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखा.  चुनाव में सफलता नहीं मिलने के बावजूद दूसरे दिन से ही आगामी चुनाव की तैयारी में लग जाती थी. उनका कहना है कि मेहनत के बदौलत ही मुकाम पाया जा सकता है. राजनीति में उनका कोई गॉड फादर नहीं रहा.

    रिपोर्ट: पंचम झा 


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