देश में एक गांव ऐसा है कि जहां पति की जल्द मौत हो जाती है, इसलिए इसे ‘’विधवाओं का गांव’’ भी बोला जाने लगा है, आखिर पढ़िए ऐसा क्यो हैं ?

    देश में एक गांव ऐसा है कि जहां पति की जल्द मौत हो जाती है, इसलिए इसे ‘’विधवाओं का गांव’’ भी बोला जाने लगा है, आखिर पढ़िए ऐसा क्यो हैं ?

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK) :- भारत गांवों का देश है, जहां एक परंपरा, विरासत औऱ एक साझी संस्कृति वास करती है. कई चिजे कुछ वजहों से ऐसी भी घटती है, जिसे लोग अपशकुन या देविय श्राप तक मानकर चलने लगते हैं. हम आपको ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे हैं. जिसे ‘विधवाओं का गांव’ कहा जाता है. जहां महिलाएं सादे लिबास में ज्यादातर मिल जायेगी. दरअसल, यहां पतियों की असमय मौत बेहद कम उम्र में ही हो जाती है. यह अभागा गांव राजस्थान के बूंदी जिले में है. इसका नाम बुधपुरा है.

    अब सवाल है कि इस गांव में सुहागन कोई लंबे समय तक क्यो नहीं रहती ?.आखिर उनके माथे का सिंदूर समय से पहले मिट क्यों जाता है?. आखिर पुरुषों की असमय मौत क्यों हो जाती है?.इन मौतों के पीछे बड़ा कारण  बुधपुरा की बलुआ पत्थर की खदानें हैं. दरअसल, इन माइंस में काम करने के चलते पुरुषो को सिलिकोसिस नाम की जानलेवा बीमारी हो जाती है. समय पर इलाज नहीं मिलने के चलते ज्यादा पुरुष वक्त से पहले मौत के मुंह में चले जाते हैं.

    सिलिकोसिस बीमारी से हो रही मौते

    बुधपुरा गांव जिंदगी की तमाम इम्तहान तो पहले ही दे रही है, गरीबी के चलते लोग खदानों में काम करते हैं, ताकि रोजी-रोटी चलती रही. यहां डर का साया तब और ज्यादा मंडराने लगता है. जब लोगो के मुंह से खून निकलता है. क्योंकि सिलिकोसिस बीमारी का खतरा रहता है. पत्थरों की कटाई का काम करने वाले मजदूर. जब इसकी धातक धूल उड़ती है, तो इससे यह जानलेवा बीमारी हो जाती है. बूंदी की तालेड़ा तहसील का बरड़ इलाका पत्थर के खनन के लिए काफी चर्चीत है. इस इलाके में करीब 40-50 गांव शामिल हैं. लेकिन बुधपुरा सबसे ज्यादा प्रभावित माना जाता है. क्षेत्र के खनिकों में सिलिकोसिस से होने वाली मौतों की उच्च दर के कारण बुधपुरा को विधवा गांव भी कहा जाने लगा.

    महिलाओं की जिंदगी हो जाती है बदत्तर

    जब किसी महिला के पति की मौत हो जाती है, तो फिर विधवा महिला को अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए खुद मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है. इस गांव की ज्यादातर महिलाएं जिंदगी चलाने के लिए दिन में दस-दस घंटे बलुआ पत्थर तोड़ने और तराशाने का काम करती है. क्योंकि उनके पास रोजी-रोटी का कोई दूसरा साधान नहीं है. खदानों में काम करने वालों की औसत आय तकरीबन 300 से 400 रुपए रोजाना है. दूसरा कोई रोजगार का साधन नहीं है. अगर दूसरा कमाई का जरिया है भी तो फिर कमाई उतनी नहीं है कि परिवार को पाल सके.

    हैरान करने वाली बात तो ये है कि महिलाएं अपने पतियों की मौत की वजह जानने के बावजूद इन्हीं पत्थर की खदानों में कान करने को मजबूर है. क्योंकि, इस इलाके में जीवन यापन करने का कोई दूसरा साधन नहीं है. बताया जाता है कि एकबार सिलिकोसिस का शिकार होने के बाद किसी की भी उम्र पांच साल से ज्यादा वक्त तक नहीं रहती. इससे बचने का इकलौता उपाय खुद का बचाव है

    गांव के लगभग 70 फीसदी महिलाओं के पति नहीं हैं

    डॉक्टरों के पास पहुंचने वाले अधिकांश मरीजों को सांस लेने में दिक्कत या श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियां ही ज्यादा होती हैं. हालात इतने खराब हैं कि मरीजों में 50 फीसदी की जांच करने पर सिलिकोसिस बीमारी का पता चलता है. यहां की विडंबना या फिर लापरवाही कहिए कि आमूमन मरीज तभी डॉक्टैर के पास पहुंचते हैं, जब उनकी हालत बेहद खराब हो चुकी होती है. बीमारी के गंभीर स्टेज में पहुंचने के बाद मरीजों को ज्यादा फायदा नहीं मिलता. अगर वक्त रहते संक्रमण मालूम पड़ जाए और इलाज का पता चल जाए तो कामगारों की जान बच सकती है. लेकिन, ज्यादातर मामलों में कामगारों को बहुत देर से पता चलता है.

    गांव की 35 साल की ऊपर की उम्र की 70 फीसदी महिलाओं के पति अब इस दुनिया में नहीं हैं. इसी वजह से यहां यह मजाक भी चलता है कि यहां के पुरुषों को कभी बुढ़ापा नहीं आता है. ज्यादातर पुरुष जवानी में ही इस बीमारी के चलते आकाल मौत मरते हैं. इसके चलते सुहागनों को सिंदूर कम उम्र में ही मिट जाता है. सिलिकोसिस बीमारी अब इस गांव की नियति बन चुकी है. अगर सरकार आगे आकर खनिकों की सुरक्षा के लिए कड़े कानून नहीं बनाती, तो यह बीमारी कितनी महिलाओं का सुहाग उजाड़ेगा और घरों में मातम लायेगा

    बुधपुरा सिर्फ अकेला ऐसा गांव नहीं है, जहां बलुआ पत्थरों की खदानें हैं. दरअसल, राजस्थान में 33,000 से ज्यादा खदानें हैं. यह संख्या राज्य के किसी भी अन्य इलाके से ज्यादा हैं. एक अनुमान के अनुसार इस उद्योग में करीब 25 लाख लोग काम करते हैं. राज्य में 2018 से जनवरी 2023 के बीच सिलिकोसिस के 31,869  मामले दर्ज किए गए.  लेकिन हजारों अन्य मामलों की पुष्टि लैब टेस्ट से नहीं हुई. लिहाजा, वास्तविक संख्या बहुत ज्यादा है.  चिकित्सा विभाग के अनुसार उनके पास बरड़ क्षेत्र में सिलकोसिस से कितनों की मौत हो गई यह जानकारी नहीं है.


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