बस्तर के घने जंगलों में दशकों से बारूद की गंध फिजाओं में घूमती थी, आज खूंखार नक्सली बसवा राजू की मौत के बाद संगठन के वजूद पर ही संकट मंडराने लगा है? पढ़िए कैसे  

    बस्तर के घने जंगलों में दशकों से बारूद की गंध फिजाओं में घूमती थी, आज खूंखार नक्सली बसवा राजू की मौत के बाद संगठन के वजूद पर ही संकट मंडराने लगा है? पढ़िए कैसे  

    टीएनपी डेस्क (Tnp Desk):- बस्तर के घने जंगलों में दशकों से बारूद की गंध फिजाओं में तैरती थी. इसके दम पर ही माओवादियों का साम्राज्य खड़ा था. लेकिन आज इन सुनसुना जंगलों में गोलियों की तड़तड़ाहट तो गूंजती है. लेकिन  नक्सलियों की सल्तनत सिकुड़ और दरक सी गई है. माओवादियों का वर्चस्व और हिंसा अब मानों  अंतिम सांस गिन रहा है. या फिर अंत की दहलीज पर खड़ा है. इस बार भारत सरकार के द्वारा चलाए जा रहे इतिहास के सबसे बड़े एंटी नक्सल ऑपरेशन में बड़े से बड़े नक्सली नेता ढेर हो रहे हैं. जिनकी कभी नाम से ही खौफ और तूती बोला करती थी.

    नक्सलियों के लिए वसवा राजू की मौत बड़ा झटका

    21 मई को खासकर माओवादियों के केंद्रीय सैन्य प्रमुख बसवा राजू को गोलियों से छलनी कर दिया गया. तो नक्सल संगठन की तो रीढ़ ही टूट गई.  नंबाला केशव राव उर्फ बसवा राजू माओवादियों के प्रमुख रणनीतिकार थे, जिसने तकरीबन चार दशक तक संगठन को खड़ा करने औऱ सींचने में बीताया. सत्तर साल के इस बूढ़े नक्सली की मौत से संगठन को झटका ही नहीं लगा, बल्कि वजूद पर ही संकट ला दिया. राजू के साथ ही माओवादियों शिक्षा विभाग  इंचार्ज और शीर्ष नेता सुधाकर को भी मार गिराया गया. सुधाकर के साथ ही एक औऱ बड़ा नाम भाष्कर को भी ढेर कर दिया गया. इन शीर्ष नेताओं की मौत के विरोध औऱ बौखलाहट में नक्सली संगठनों ने 10 जून को भारत बंद बुलाया .इसके साथ ही एक बड़ा बदलाव देखने को ये मिला कि पहली बार  11 जून से 3 अगस्त तक  "शहीदी माह" मनाने की घोषणा की. जो उनकी परंपरागत शहीदी सप्ताह से एक बड़ा बदलाव है.

    पहली बार शहीदी माह मनायेंगे नक्सली !

    दरअसल, हर साल नक्सली 28 जुलाई से शहीदी सप्ताह मनाते थे लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है कि नक्सली शहीद माह मनाएंगे. सेट्रल कमेटी की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि उनके लोगों को मारा जा रहा है. इसलिए संगठन शहीदी माह के दौरान विविध आयोजन करते हुए मारे गए नक्सलियों को याद किया जाएगा .बस्तर से लेकर तेलंगाना और आंध्र तक में इस दौरान आयोजन होंगे. आमतौर पर माना जाता है कि नक्सली बंद और शहीदी सप्ताह या माह में हिंसक वारदात करते रहे हैं. इस बार भी इसकी आशंका जतायी जा रही है. ऐसे में बस्तर में सुरक्षाबलों को अलर्ट कर दिया गया है. इस बार के अभियान में देखा जाए तो एंटी नक्सल ऑपरेशन में तेलंगाना, छत्तीसगढ़ औऱ झारखंड में माओवादियों को तगड़ा नुकसान हुआ है. एक अनुमान के मुताबिक पिछले 16 महीने में तकरीबन 1400 से ज्यादा नक्सलियों ने सरेंडर भी किया है. जो इस बात को दर्शाता है कि उनके मन में भी एक खौफ है,तब ही आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं

    क्या नक्सल संगठन में पड़ गई है फूट ?

    बस्तर आईजी पी. सुंदरराज ने भी दावा किया है कि कई शीर्ष माओवादी समर्पण के लिए पुलिस से संपर्क साधे हुए हैं. नक्सल संगठन में ही फूट की बात भी बतायी जा रही है. अप्रैल से जून 2025 के बीच 12 बड़ी मुठभेड़ों में से नौ में अग्रिम खुफिया जानकारी के आधार पर ही कार्रवाई की गई. बसवा राजू की मौत के बाद माओवादियों ने पत्र जारी कर स्वीकारा किया कि उसकी सुरक्षा में तैनात कंपनी नंबर सात के दो माओवादियों ने उसकी मौजूदगी की जानकारी पुलिस तक पहुंचाई थी.पिछले दिनों शीर्ष माओवादी सुधाकर और भास्कर को भी स्पष्ट सूचना के आधार पर ही ढेर किया गया था. इसके साथ ही पिछले 16 माह में 1400 से अधिक माओवादियों के समर्पण से भी स्पष्ट है कि अब कैडरों का भरोसा माओवादी संगठन से टूटा है।

    इधर अभी जो मौजूदा हालत है, इससे तो नहीं लगता कि सुरक्षाबल अपना ऑपरेशन ढीला करने वाले हैं. क्योंकि अगले साल मार्च तक सरकार ने नक्सलवाद के जड़ से सफाया करने का शपथ लिया है. ऐसे में जाहिर है कि माओवादियों के लिए आने वाले दिन अभी और झटका लगेगा. जिसमे उनके बड़े-बड़े लिडर्स जैसे हिड़मा, गणपति, मिसिर बेसरा, देवा, दामोदर और सुजाता मुख्य रुप से निशाने पर होंगे.


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