'सरहदों पर तनाव है क्या, पता तो करो चुनाव है क्या' जानिये, 2024 के महासंग्राम के पहले सीएम नीतीश ने क्यों चला विशेष राज्य के दर्जे का दांव

    'सरहदों पर तनाव है क्या, पता तो करो चुनाव है क्या' जानिये, 2024 के महासंग्राम के पहले सीएम नीतीश ने क्यों चला विशेष राज्य के दर्जे का दांव

    Patna-मगध की धरती पटना को यों ही सियासत की राजधानी नहीं माना जाता, इस धरती ने देश की सियासी धार बार-बार बदल कर इस उपाधि को सार्थकता प्रदान प्रदान किया है. एक दौर वह भी था जब पूरे देश में कांग्रेस का जयकारा लगता था, “इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा” की गूंज होती थी, लेकिन जब वही इंदिरा ने देश पर आपातकाल लगाने का बेहद दुर्भाग्यपूर्ण फैसला लिया तो बगावत की पहली आवाज इसी मगध की धरती से आयी, और वह दौर भी आया जब कांग्रेस की सत्ता पूरे देश में जमीदोंज हो गयी, लेकिन चंद वर्षों के बाद ही इसी मगध की धरती से एक दूसरा नारा भी लगा और वह  नारा था “आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को जीतायेंगे”

    मगध की धरती की सियासी तासीर ही कुछ अलग है

    जब मंडल कमंडल के संघर्ष के उस भीषण दौर में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा को रोकना सियासी आत्महत्या माना जा रहा था, तब मगध की धरती पर प्रवेश करते ही लालू यादव ने इस काफिले को रोकने में जरा भी संकोच नहीं किया, और इसके साथ ही वीपी सिंह की सरकार गिर गयी.

    ऐसी अनेकों कहानियां आज भी मगध के खेत खलिहानों में गूंजती रहती है. इस मगध की धरती पर आप एक चरवाहे से भी देश की सियासत और उसके बदलते रंग को समझ सकते हैं. वह अपने ठेठ अंदाज में बिना किसी लाग लपेट के आपको उस जमीनी हकीकत से रुबरु करवा देगा, जिसको समझने के लिए टीवी चैनलों पर चुनावी विश्लेषकों की एक पूरी टीम जुटती है.

    अल्लहड़पना और सियासी बेबाकी यहां कण कण में विराजमान है

    दरअसल मगध की धऱती की तासीर ही कुछ ऐसी है, अल्लहड़पना और सियासी बेबाकी यहां की धरती पर कण कण पर बिखरा पड़ा है. अब उसी मगध की धरती से 2024 के महासंग्राम के ठीक पहले सीएम नीतीश ने एक बड़ा सियासी पासा फेंका है. और वह पासा है बिहार को विशेष राज्य के दर्जे का. जो लोग यह मान रहे थें कि जातीय जनगणना और पिछड़ों के आरक्षण विस्तार के बाद नीतीश के तरकश के सारे तीर  बाहर निकल चुके हैं, उन्हे यह अंदाजा भी नहीं होगा कि जातीय जनगणना और पिछड़ों के आरक्षण विस्तार के पिच पर अब सीएम नीतीश विशेष राज्य का मास्टर स्ट्रोक खेलेंगे, और बेहद खूबसूरती के साथ जातीय जनगणना के साथ करवाये गये आर्थिक-सामाजिक रिपोर्ट को इसका आधार बनायेंगे. क्योंकि अब तक सीएम नीतीश के द्वारा विशेष राज्य की मांग तो की जा रही थी, लेकिन उसके लिए उनके पास कोई सामाजिक आर्थिक डाटा नहीं था. लेकिन इस बार इस मांग के पीछे मजबूत डाटा है.

    देखिये अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर क्या लिखते हैं सीएम नीतीश

    यही कारण है कि अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर सीएम नीतीश लिखते हैं कि “देश में पहली बार बिहार में जाति आधारित गणना का काम कराया गया है. जाति आधारित गणना के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति के आंकड़ों के आधार पर अनुसूचित जाति के लिये आरक्षण सीमा को 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षण की सीमा को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 2 प्रतिशत, अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिये आरक्षण की सीमा को 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत तथा पिछड़ा वर्ग के लिये आरक्षण की सीमा को 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है, अर्थात सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के लिये आरक्षण सीमा को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया गया. सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिये 10 प्रतिशत आरक्षण पूर्ववत लागू रहेगा। अर्थात इन सभी वर्गो के लिए कुल आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया है.  जाति आधारित गणना में सभी वर्गों को मिलाकर बिहार में लगभग 94 लाख गरीब परिवार पाये गये हैं, उन सभी परिवार के एक सदस्य को रोजगार हेतु 2 लाख रूपये तक की राशि किश्तों में उपलब्ध करायी जायेगी.  63,850 आवासहीन एवं भूमिहीन परिवारों को जमीन क्रय के लिए दी जा रही 60 हजार रूपये की राशि की सीमा को बढ़ाकर 1 लाख रूपये कर दिया गया है. साथ ही इन परिवारों को मकान बनाने के लिए 1 लाख 20 हजार रूपये दिये जायेंगे. जो 39 लाख परिवार झोपड़ियों में रह रहे हैं, उन्हें भी पक्का मकान मुहैया कराया जायेगा. जिसके लिए प्रति परिवार 1 लाख 20 हजार रूपये की दर से राशि उपलब्ध करायी जायेगी. सतत् जीविकोपार्जन योजना के अन्तर्गत अत्यंत निर्धन परिवारों की सहायता के लिए अब 01 लाख रूपये के बदले 02 लाख रूपये दिये जायेंगे। इन योजनाओं के क्रियान्वयन में लगभग 2 लाख 50 हजार करोड़ रूपये की राशि व्यय होगी. इन कामों के लिये काफी बड़ी राशि की आवश्यकता होने के कारण इन्हें 5 साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. यदि केन्द्र सरकार द्वारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाय तो हम इस काम को बहुत कम समय में ही पूरा कर लेंगे. हमलोग बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग वर्ष 2010 से ही कर रहे हैं। इसके लिए 24 नवम्बर, 2012 को पटना के गाँधी मैदान में तथा 17 मार्च, 2013 को दिल्ली के रामलीला मैदान में बिहार को विशेष राज्य के दर्जे के लिए अधिकार रैली भी की थी. हमारी माँग पर तत्कालीन केन्द्र सरकार ने इसके लिए रघुराम राजन कमेटी भी बनाई थी जिसकी रिपोर्ट सितम्बर, 2013 में प्रकाशित हुई थी. परन्तु उस समय भी तत्कालीन केन्द्र सरकार ने इसके बारे में कुछ नहीं किया. मई, 2017 में भी हमलोगों ने विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए केन्द्र सरकार को पत्र लिखा था। आज कैबिनेट की बैठक में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने हेतु केन्द्र सरकार से अनुरोध करने का प्रस्ताव पारित किया गया है. मेरा अनुरोध है कि बिहार के लोगों के हित को ध्यान में रखते हुये केन्द्र सरकार बिहार को शीघ्र विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करें.

    2024 के महासंग्राम के पहले क्या है नीतीश का मास्टर प्लान

    साफ है कि 2024 के महासंग्राम के पहले नीतीश एक बड़े प्लान की ओर बढ़ते हुए दिखलायी पड़ रहे हैं. जातीय जनगणना और पिछड़ों के आरक्षण विस्तार कर वह पहले ही अपनी सियासी जमीन को धारदार बना चुके हैं, और उन्ही आंकड़ों के आधार पर अब 63,850 आवासहीन और 94 लाख गरीब परिवारों की बेहतरी के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग कर एक और मास्टर स्ट्रोक चल रहे हैं. यदि भाजपा इसका विरोध करती है तो माना जायेगा कि वह बिहार के 94 लाख गरीब परिवारों की सामाजिक आर्थिक बेहतरी के खिलाफ है,  और यदि स्वीकार करती है तो दूसरे कई राज्यों से भी इसी प्रकार की मांग तेज होगी. कुल मिलाकर यह मांग 2024 के महाजंग में भाजपा के सामने मुश्किलें खड़ा करने जा रहा है.

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