इस्तीफे की खबरें खारिज! सियासी कफन ओढ़ सीएम हेमंत ने किया जंगे मैदान में कूदने का एलान

    इस्तीफे की खबरें खारिज!  सियासी कफन ओढ़ सीएम हेमंत ने किया जंगे मैदान में कूदने का एलान

    Ranchi-इस वर्ष  जनवरी का महीना झारखंड के इतिहास में सबसे सियासी तपिश भरा महीना रहा, नववर्ष की शुरुआत से ही झारखंड की सियासत में बड़े बदलाव की खबरें मीडिया की सुर्खियों में है, सूत्रों पर आधारित इन खबरों में हेमंत की सत्ता हिलती नजर आ रही है, दावा किया जा रहा है कि बस इस सरकार के पास गिनती के चंद घंटें बचे हैं, कभी दावा किया गया कि सरफराज अहमद का इस्तीफा कल्पना सोरेन को विधान सभा की दहलीज तक पहुंचाने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत लिया गया है, तो कभी यह खबरें चलायी गयी कि ईडी से महज चंद कदम दूरी पर खड़े सीएम हेमंत सोरेन अपना इस्तीफा तैयार कर चुके हैं, जैसे ही ईडी का कदम उनकी ओर बढ़ा, उनके पॉकेट से एक लिफाफा निकलेगा, और उसकी मजमून इस्तीफे की होगी.

     सूत्रों  पर खबरों का खेल

    और ये सारी खबरें सूत्रों के आधार पर चलायी जा रही थी, इन अफवाहों को बल तब मिला, जब मुख्यमंत्री आवास में महागठबंधन के विधायकों की बैठक बुलाने की खबर आयी, जैसे ही यह खबर सामने आयी, यह मान लिया गया कि अब तो इस्तीफा होना तय है, और इसी बैठक में अगले सीएम चेहरे का एलान हो जायेगा, खबर यह भी चलायी गयी कि सत्ता पक्ष के कुछ विधायक इस बैठक से दूरी बना सकते हैं, सत्ता पक्ष में सब कुछ सही नहीं है, और सीएम हेमंत को चौतरफा संकट में घिरा देखकर अब कांग्रेस भी मोल-भाव में लग चुकी है, अब उसकी ओर से उपमुख्यमंत्री की कुर्सी का सौदा किया जायेगा. कल्पना सोरेन राज्य की अगली और पहली मुख्यमंत्री होगी, लेकिन इसके साथ ही इस बार कांग्रेस कोटे से कोई उपमुख्यमंत्री होगा, सूत्र यहां तक बता गयें कि इस बार कांग्रेस कोटे के मंत्रियों पर भी आफत आने वाली है, कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी इन मंत्रियों को चलता करने का मन बना चुके हैं, इन चेहरों के स्थान पर अब जमीनी कार्यकर्ताओं को मंत्री पद तक पहुंचाया जायेगा, खास कर बादल पत्रलेख और बन्ना गुप्ता को लेकर चर्चा काफी तेज रही है, दावा किया गया कि इन मंत्रियों से कांग्रेस खेमे के विधायकों में काफी नाराजगी है, इन मंत्रियों को रहते कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को सत्ता में हिस्सेदारी नहीं  मिली, सारी मलाई ये मंत्री ही खाते रहें, इसके कारण पार्टी नेताओं को अपने अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है.

    लेकिन जैसे ही मीटिंग खत्म हुई सारे कयासों पर विराम लग गया

    लेकिन जैसे ही मुख्यमंत्री आवास में मीटिंग शुरु हुई, विधायकों ने सीएम हेमंत को नववर्ष की शुभकामनाएं दी, चाय पानी का दौर चला, मिठाईयां बांटी गयी और बैठक खत्म हो गयी, बाहर निकलते विधायकों ने एक स्वर से एलान कर दिया कि इस्तीफे की तमाम खबरें मीडिया की देन है, सीएम हेमंत हैं, हेमंत थें और हेमंत ही रहेंगे, उसके बाद अचानक से तमाम मीडिया चैनलों में दूसरी सुर्खी चलने लगी कि दावा किया जाने लगा कि सीएम हेमंत ने इस्तीफे की खबरों को भाजपा का प्रोपगंडा करार दिया है, ना तो कहीं कल्पना सोरेन के चेहरे पर विचार हो रहा है, और ना ही इस्तीफे पर कोई चर्चा है.

    तो क्या यह तमाम खबरें महज अटकलबाजियां थी

    तो क्या यह सब कुछ महज मीडिया की अटकलबाजियां थी, और यदि यह सब महज अटकलबाजियां थी तो इन भ्रामक खबरों को एक प्रवक्ता के माध्यम से भी दूर किया जा सकता था, इस बात का जवाब देने के लिए खुद मुख्यमंत्री को सारे विधायकों को बैठक क्यों बुलानी पड़ी. तो यह कहानी एक बार फिर से सूत्रों से ही आगे बढ़ती है, इस बार का दावा है कि सीएम हेमंत अपना इस्तीफा सौंप कर भाजपा को बढ़त की स्थिति में आने नहीं देना चाहते, उनकी रणनीति है कि उनके पास खुद ही ईडी पहुंचे और उनकी गिरफ्तारी की घोषणा करें, और उसके बाद सेकेंड लाईन नेतृत्व की ओर से मोर्चा संभाला जायेगा और सीएम हेमंत के बदले नये चेहरे को चुनने की औपचारिकता पूरी की जायेगी.

    फिर वही सवाल अपनी गिरफ्तारी क्यों करवाना चाहते हैं हेमंत

    लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सीएम हेमंत अपना इस्तीफा सौंपने के बजाय अपनी गिरफ्तारी करवाने क्यों चाहते हैं. तो इस रणनीति का मकसद बेहद साफ है, सीएम हेमंत अपनी गिरफ्तारी के साथ ही अपने को शहीद धोषित करवाने की रणनीति पर काम कर रहें हैं. वह इस गिरफ्तारी के साथ अपने समर्थक समूहों को इस बात का सियासी मैसेज देना चाहते कि आदिवासी-मूलवासी हितों से समझौता नहीं करने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी है. 1932 का खतियान, सरना धर्म कोड, और पिछड़ों का आरक्षण विस्तार का इनाम उनकी यह गिरफ्तारी है, भाजपा कभी भी इन मुद्दों को सियासी विमर्श के केन्द्र आने देना नहीं चाहता, वह नहीं चाहता कि आदिवासी-मूलवासियों को 50 वर्ष की उम्र में पेंशन मिले, 36 लाख वंचित परिवारों को राशन मिले, जिन्हे उनके पूर्ववर्ती रघुवर दास की सरकार में लाईन लगानी पड़ती थी. वह जल जंगल और जमीन पर आदिवासी-मूलवासी समाज की मिल्कियत को स्वीकार नहीं करना चाहता, उसकी सोच तो इन आदिवासी-मूलवासियों को विभिन्न कानूनों की आड़ में जंगल और जमीन से बेदखल करने की है, ताकि उनकी बेशकीमती जमीनों को कॉपोरेट घऱानों को सौंपा जा सकें.

     बड़ी सियासी लकीर खिंचने की दिशा में बढ़ रहे हैं हेमंत

    साफ है कि सीएम हेमंत सियासत में एक बड़ी लकीर खिंचने का मन बना चुके हैं. और यह लड़ाई आर पार को होने वाली है. और इस आर पार की लड़ाई के लिए वह सियासी कफन ओढ़ कर निकल चुके हैं, जहां उन्हे मालूम है कि उनके सामने सियासी शहादत इंतजार कर रहा है, लेकिन उन्हे यह भी मालूम है कि यदि उनका यह संदेश उनके समर्थक समूहों तक चला गया तो सीएम की कुर्सी भले ही जाय, राज्य की सत्ता से झामुमो को कोई हटा नहीं सकता, अब तय भाजपा को करना है कि वह सीएम हेमंत के शहादत के लिए तैयार हैं या वह अभी और इंतजार करना चाहता है.

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