इकतरफा प्यार में लटके चिराग! काम नहीं आया पीएम मोदी का हनुमान बनना, क्या संकटमोचक की भूमिका निभायेंगे चाचा लालू

    इकतरफा प्यार में लटके चिराग! काम नहीं आया पीएम मोदी का हनुमान बनना, क्या संकटमोचक की भूमिका निभायेंगे चाचा लालू

    पटना(PATNA)- कभी अपने आप को मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान इन दिनों राजनीतिक उलझन का शिकार दिख रहे हैं. उलझन भी कुछ ऐसी वैसी नहीं है, महज चंद दिन पहले महागठबंधन से किनारा करने वाले पूर्व सीएम जीतन राम मांझी की पार्टी ‘हम’ आज एनडीए का घोषित हिस्सा है, वहीं  बार-बार अपने एकतरफा प्यार का इजहार करते रहे चिराग पासवान आज भी बीच भंवर में फंसे नजर आ रहे हैं.

    बीच भंवर में चिराग

    और यह हालत तब है, जबकि 2024 का महासंग्राम अब महज चंद कदम दूर है, तमाम दूसरे दलों के समान भाजपा भी एक-एक सीट पर अपनी तैयारियों में जुटी है. लेकिन चिराग पासवान के लिए तो अभी यह भी साफ नहीं है कि उनके हिस्से में कौन-कौन सी सीट आने वाली है.

    अति राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार बने चिराग

    सूत्रों का दावा है कि चिराग की यह स्थिति उनके अति राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण हुई है, चिराग अपने पूर्व के लोजपा के सामान ही लोकसभा की 6 सीट और एक राजसभा की सीट पर अड़े हुए हैं, जबकि बदले राजनीतिक हालात में भाजपा चिराग की शर्तों पर बातचीत को भी तैयार नहीं है.

    चिराग की राजनीतिक मजबूरी का लाभ लेने की कोशिश में भाजपा

    दावा किया जाता है कि इसके पीछे भी भाजपा की एक रणनीति है, उसका आकलन है कि बिहार की सियासत में चिराग के सामने सिर्फ और सिर्फ एनडीए ही एक विकल्प है, क्योंकि चिराग ने अपने बयानों और गतिविधियों को कारण सीएम नीतीश का दरवाजा बंद कर दिया है, यही उनकी राजनीतिक मजबूरी है, जिसका लाभ एनडीए उठाना चाहता है, जबकि मुकेश सहनी ने बेहद ही राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए महागठबंधन के साथ अपने रिश्तों को सामान्य बना रखा है, जबकि चिराग अपने राजनीतिक आतुरता में हर दिन सीएम नीतीश के खिलाफ बयान देते रहते हैं.

    गलत भी हो सकता है भाजपा यह आकलन

    हालांकि जानकारों का दावा है कि भाजपा यह आकलन गलत भी साबित हो सकता है, यह सच है कि चिराग और सीएम नीतीश के रिश्ते तल्ख है, लेकिन बावजूद इसके चिराग के लिए महागठबंधन के दरवाजे पूरी तरह से बंद नहीं हुए है, महागठबंधन में राजद के दरवाजे चिराग की इंट्री की गुंजाइश अभी भी बनी हुई है. यानी राजद अपने हिस्से की कुछ सीटों को चिराग के नाम कर सकता है. लेकिन उस स्थिति में चुनाव चिह्न को लोजपा का होगा, लेकिन वास्तविक उम्मीदवार राजद का होगा.

    यही स्थिति भी चिराग को नागवार गुजर रही है, दूसरे समस्या सीटों को लेकर है, दावा है कि महागठबंधन तकरीबन हर सीट पर अपने उम्मीवारों का चयन कर चुका है, इस हालत में चिरगा की इंट्री के साथ ही एक और समस्या सामने आयेगी, हालांकि इसका समाधान बहुत पेचिदा नहीं होगा. लेकिन मूल सवाल वही हो छह लोकसभा और एक राज्य सभा पर उनकी दावेदारी, जिसे पूरा करने में अपने दम पर राजद समर्थ नहीं है.

    संकट मोचक बन कर सामने आ सकते हैं लालू यादव

    हां, कल के दिन चाचा नीतीश के दिल में इस भतीजे के प्रति कुछ प्यार उमड़ पड़ता है तो इसका समाधान कुछ ज्यादा संभव है, सीटों की संख्या कुछ इधर उधर हो सकती है, और खास कर लालू यादव की पटना में  उपस्थिति को देखते हुए इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, याद रहे कि लालू परिवार से चिराग के रिश्ते आज भी बेहद खास है. यदि अंतिम समय में भतीजे चिराग के लिए लालू संकटमोचक बन कर सामने आते हैं तो उस स्थिति में छोटे भाई नीतीश का झुकना  तो तय है.


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