आखिर 4 साल बाद भी क्यों नहीं थम रही रूस-यूक्रेन की जंग? पढ़िए डीटेल रिपोर्ट
: रूस-यूक्रेन युद्ध को चार साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन जमीन, सुरक्षा और रणनीतिक हितों पर मतभेद के कारण शांति अब भी दूर है.
: रूस-यूक्रेन युद्ध को चार साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन जमीन, सुरक्षा और रणनीतिक हितों पर मतभेद के कारण शांति अब भी दूर है.
टीएनपी डेस्क(TNP DESK): रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग को चार साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन युद्ध खत्म होने के बजाय लगातार खिंचता जा रहा है. 24 फरवरी 2022 को रूस के बड़े सैन्य अभियान के साथ शुरू हुई इस जंग ने अब तक लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित की है. शहर तबाह हुए, करोड़ों लोग विस्थापित हुए और दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा. सवाल है कि आखिर इतनी लंबी लड़ाई के बाद भी शांति का रास्ता क्यों नहीं निकल पा रहा है.
2014 से ही शुरू हो गया था तनाव
रूस और यूक्रेन के बीच मौजूदा युद्ध को समझने के लिए 2014 तक पीछे जाना होगा. इसी साल रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में रूस समर्थित अलगाववादियों और यूक्रेनी सेना के बीच संघर्ष शुरू हुआ.
समय के साथ यूक्रेन यूरोप और पश्चिमी देशों के करीब जाता गया. वहीं रूस लगातार NATO के विस्तार और यूक्रेन के पश्चिमी सैन्य गठजोड़ का विरोध करता रहा. यही तनाव आगे चलकर 2022 के बड़े युद्ध में बदल गया.

24 फरवरी 2022 को शुरू हुआ बड़ा हमला
24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया. रूस का कहना था कि वह अपनी सुरक्षा चिंताओं और यूक्रेन में रूसी भाषी आबादी के हितों की रक्षा के लिए कार्रवाई कर रहा है. दूसरी तरफ यूक्रेन ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया.
रूस ने शुरुआत में यूक्रेन के कई इलाकों में तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन यूक्रेनी सेना के कड़े प्रतिरोध और पश्चिमी देशों से मिली सैन्य मदद ने रूसी अभियान को मुश्किल बना दिया.
इसके बाद युद्ध एक लंबी लड़ाई में बदल गया.
चार साल बाद भी मोर्चे पर क्यों फंसा है युद्ध?
युद्ध के शुरुआती महीनों में रूस ने तेजी से बढ़त बनाने की कोशिश की थी. लेकिन अब हालात काफी बदल चुके हैं. दोनों पक्षों ने अपनी रणनीति बदली है और कई इलाकों में कुछ किलोमीटर की बढ़त के लिए भी लंबे समय तक लड़ाई चल रही है.
2026 में भी रूस को कुछ इलाकों में बढ़त मिली है, लेकिन उसकी रफ्तार पहले की तुलना में काफी धीमी है. एक आकलन के मुताबिक जुलाई 2026 में रूसी सेना ने करीब 38 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बढ़त बनाई. इसके मुकाबले जुलाई 2025 में यह आंकड़ा करीब 456 वर्ग किलोमीटर था.
इससे साफ है कि अब युद्ध में बड़ी क्षेत्रीय बढ़त हासिल करना आसान नहीं है.

इंसानी कीमत लगातार बढ़ रही है
इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ी है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक 2025 में यूक्रेन में 2,500 से ज्यादा नागरिकों की मौत हुई, जबकि 12 हजार से अधिक लोग घायल हुए.
2026 में भी हमले जारी रहे. मई 2026 में ही संयुक्त राष्ट्र ने कम से कम 274 नागरिकों की मौत और 1,763 लोगों के घायल होने की पुष्टि की थी.
युद्ध की शुरुआत के बाद लाखों यूक्रेनी नागरिकों को अपने घर छोड़ने पड़े. जनवरी 2026 तक करीब 37 लाख लोग यूक्रेन के अंदर ही विस्थापित थे.
यूक्रेन को 588 अरब डॉलर की जरूरत
युद्ध का असर सिर्फ लोगों की जिंदगी पर नहीं पड़ा है. यूक्रेन की सड़कें, पुल, घर, अस्पताल, बिजली व्यवस्था और दूसरे बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान हुआ है.
विश्व बैंक और अन्य संस्थाओं के फरवरी 2026 के अनुमान के मुताबिक यूक्रेन को अगले 10 वर्षों में पुनर्निर्माण और रिकवरी के लिए करीब 588 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है.
युद्ध से सीधे हुए नुकसान का अनुमान भी 195 अरब डॉलर से ज्यादा लगाया गया है. आवास, परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं.

रूस के लिए भी भारी पड़ रही जंग
लंबे समय तक युद्ध जारी रखना रूस के लिए भी आसान नहीं है. सैन्य खर्च बढ़ा है और बड़ी संख्या में सैनिकों के हताहत होने का अनुमान है.
अमेरिकी थिंक टैंक CSIS के अनुसार रूस के सैन्य हताहतों की संख्या करीब 14 लाख तक पहुंच सकती है, जिसमें लगभग 4.5 लाख सैनिकों की मौत का अनुमान शामिल है. हालांकि युद्ध के दौरान हताहतों की सही संख्या की स्वतंत्र पुष्टि मुश्किल है और अलग-अलग स्रोतों के आंकड़ों में काफी अंतर है.
इसके बावजूद रूस ने अपने रक्षा उत्पादन को युद्ध की जरूरतों के हिसाब से बढ़ाया है. यही वजह है कि वह लंबे समय तक युद्ध जारी रखने की क्षमता बनाए हुए है.
शांति की राह में सबसे बड़ी अड़चन क्या है?
रूस और यूक्रेन के बीच बातचीत की कोशिशें कई बार हुई हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या दोनों देशों की शर्तों में भारी अंतर है.
पहला मुद्दा जमीन का है. रूस जिन इलाकों पर कब्जा कर चुका है, उन्हें लेकर दोनों देशों की स्थिति बिल्कुल अलग है. यूक्रेन अपने क्षेत्र वापस चाहता है, जबकि रूस अपनी सैन्य बढ़त को बनाए रखना चाहता है.
दूसरा मुद्दा सुरक्षा का है. यूक्रेन भविष्य में रूस के हमले से बचने के लिए मजबूत सुरक्षा गारंटी चाहता है. वहीं रूस यूक्रेन के NATO से करीबी रिश्तों का विरोध करता है.
तीसरा मुद्दा भरोसे का है. दोनों देशों के बीच इतना गहरा अविश्वास पैदा हो चुका है कि किसी भी युद्धविराम को स्थायी शांति में बदलना आसान नहीं होगा.

दुनिया पर भी पड़ा असर
रूस-यूक्रेन युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ा है. यूरोप में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है. कई देशों ने अपने रक्षा बजट बढ़ाए हैं. ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी यूरोपीय देशों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी है.
भारत के लिए भी यह युद्ध महत्वपूर्ण है. भारत के रूस के साथ पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं, वहीं अमेरिका और यूरोप के साथ भी भारत के रणनीतिक रिश्ते मजबूत हैं. ऐसे में भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए युद्ध खत्म करने की बात करता रहा है.
आखिर कब खत्म होगी जंग?
चार साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध खत्म होने की कोई आसान राह दिखाई नहीं दे रही है. दोनों देशों की सैन्य, राजनीतिक और रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं.
युद्ध खत्म करने के लिए सिर्फ हथियारों का इस्तेमाल रोकना काफी नहीं होगा. जमीन, सुरक्षा गारंटी, प्रतिबंध, भविष्य के राजनीतिक रिश्ते और यूक्रेन की सुरक्षा जैसे कई मुद्दों पर सहमति बनानी होगी.
यही वजह है कि रूस-यूक्रेन की जंग अब सिर्फ दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं रह गई है. यह यूरोप की सुरक्षा, वैश्विक राजनीति और बदलती विश्व व्यवस्था से जुड़ा बड़ा संघर्ष बन चुकी है.