आखिर पांच महीने बाद भी क्यों नहीं रुक रही अमेरिका-ईरान की लड़ाई? पढ़िए डिटेल रिपोर्ट

आखिर पांच महीने बाद भी क्यों नहीं रुक रही अमेरिका-ईरान की लड़ाई? पढ़िए डिटेल रिपोर्ट

टिएनपी डेस्क(TNP DESK): अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को पांच महीने से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन तनाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ यह संघर्ष अब केवल दो देशों के बीच सैन्य टकराव नहीं रह गया है. इसका असर पूरे पश्चिम एशिया, तेल बाजार, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. कई बार युद्धविराम और बातचीत की कोशिशें हुईं, लेकिन स्थायी शांति का रास्ता अभी तक साफ नहीं हुआ है.

अमेरिका-ईरान तनाव की शुरुआत कैसे हुई?

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कई दशक पुराना है. 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के रिश्ते लगातार खराब होते गए. इसके बाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया.

2015 में अमेरिका, ईरान और दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच परमाणु समझौता हुआ. इसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई सीमाएं स्वीकार कीं और बदले में उसे आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिली. लेकिन 2018 में अमेरिका इस समझौते से बाहर निकल गया और ईरान पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगा दिए. इसके बाद दोनों देशों के बीच भरोसा तेजी से कमजोर होता गया.

बातचीत से अचानक युद्ध तक कैसे पहुंचा मामला?

2025 और 2026 में परमाणु मुद्दे पर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की कोशिश फिर शुरू हुई. फरवरी 2026 में दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी और ऐसा लग रहा था कि किसी समझौते का रास्ता निकल सकता है.

लेकिन इसी दौरान तनाव तेजी से बढ़ा. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की. ईरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया.

इसके जवाब में ईरान ने अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों से जुड़े ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इसके बाद संघर्ष का दायरा बढ़ता गया और पश्चिम एशिया में बड़े क्षेत्रीय युद्ध का खतरा पैदा हो गया.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?

अमेरिका-ईरान संघर्ष में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन गया है. यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के तेल कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

ईरान ने इस क्षेत्र में अपना दबाव बढ़ाया, जबकि अमेरिका ने समुद्री मार्ग को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खुला रखने की कोशिश की. इस दौरान जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई और तेल की सप्लाई को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ी.

अगर होर्मुज लंबे समय तक बाधित रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ सकती है. इसका सीधा असर भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

अप्रैल में हुआ युद्धविराम, फिर क्यों बिगड़े हालात?

लगातार संघर्ष के बाद अप्रैल में पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की कोशिश हुई. इससे उम्मीद जगी कि दोनों देश अब सैन्य कार्रवाई रोककर बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे.

लेकिन युद्धविराम के बावजूद दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई. परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे सवाल जस के तस बने रहे.

यही वजह रही कि युद्धविराम स्थायी शांति में नहीं बदल सका.

जून में समझौते की कोशिश भी क्यों रही नाकाम?

जून में दोनों देशों ने तनाव कम करने और बातचीत आगे बढ़ाने की कोशिश की. लेकिन अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी सीमाएं स्वीकार करे.

ईरान दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिबंध हटाने और अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहता था. दोनों पक्ष अपनी मुख्य मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए.

यही मतभेद आगे चलकर फिर तनाव का कारण बने.

जुलाई और अगस्त में फिर क्यों बढ़ा तनाव?

जुलाई में अमेरिका और ईरान के बीच आरोप-प्रत्यारोप फिर बढ़ने लगे. समुद्री क्षेत्र में हुई घटनाओं ने भी स्थिति को गंभीर कर दिया. अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाया, जबकि ईरान ने होर्मुज को लेकर अपना रुख और सख्त कर दिया.

अगस्त 2026 तक दोनों देशों के बीच स्थायी शांति समझौता नहीं हो पाया है. बातचीत की कोशिशें जरूर जारी हैं, लेकिन भरोसे की कमी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है.

आखिर पांच महीने बाद भी युद्ध क्यों नहीं रुक रहा?

इसका पहला कारण भरोसे की कमी है. दोनों देश एक-दूसरे की बातों और समझौतों पर भरोसा नहीं करते.

दूसरा बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. अमेरिका को डर है कि ईरान भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने की क्षमता हासिल कर सकता है. ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है.

तीसरा कारण आर्थिक प्रतिबंध हैं. अमेरिका चाहता है कि प्रतिबंधों के जरिए ईरान पर दबाव बना रहे. ईरान इन प्रतिबंधों को हटाने की मांग करता है.

चौथा कारण इजरायल की सुरक्षा है. इजरायल ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को अपने लिए बड़ा खतरा मानता है. इसलिए अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी समझौते में इजरायल का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

पांचवां कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है. इस समुद्री रास्ते पर नियंत्रण और सुरक्षा का सवाल अब युद्ध का अहम हिस्सा बन चुका है.

भारत और दुनिया पर क्या असर पड़ रहा है?

इस युद्ध का सबसे बड़ा असर तेल और गैस की सप्लाई पर पड़ सकता है. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का खतरा रहता है. इसका असर पेट्रोल, डीजल, परिवहन और महंगाई पर पड़ सकता है.

भारत के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है. इसके अलावा खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते हैं. इसलिए क्षेत्र में बढ़ता तनाव उनकी सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय है.

अब आगे क्या होगा?

अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति के लिए दोनों देशों को बातचीत के जरिए कई कठिन मुद्दों का समाधान निकालना होगा. परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, सुरक्षा और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे मुद्दों पर समझौता करना आसान नहीं होगा.

अगर दोनों देश बातचीत का रास्ता अपनाते हैं तो तनाव धीरे-धीरे कम हो सकता है. लेकिन अगर कोई बड़ा सैन्य या समुद्री टकराव होता है, तो संघर्ष और गंभीर हो सकता है.

कुल मिलाकर अमेरिका-ईरान की पांच महीने पुरानी लड़ाई सिर्फ दो देशों की सैन्य लड़ाई नहीं है. इसके पीछे परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, इजरायल की सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव और तेल के महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते का सवाल जुड़ा हुआ है. यही कारण है कि कई दौर की बातचीत और युद्धविराम के बावजूद स्थायी शांति नहीं बन पाई है. अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि अमेरिका और ईरान बातचीत से समाधान निकालते हैं या यह संघर्ष आने वाले दिनों में और बड़ा रूप लेता है.