क्या खत्म होने वाला है डॉलर का दबदबा, BRICS से बढ़ रही अमेरिकी करेंसी की चुनौती

दुनिया की अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा कायम है, लेकिन BRICS देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या दुनिया धीरे-धीरे डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रही है.

क्या खत्म होने वाला है डॉलर का दबदबा, BRICS से बढ़ रही अमेरिकी करेंसी की चुनौती

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): दुनिया की अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा दशकों से कायम है. कच्चा तेल खरीदना हो, दो देशों के बीच व्यापार करना हो या किसी केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा का भंडार रखना हो, डॉलर की भूमिका सबसे अहम रही है. लेकिन अब इस व्यवस्था में धीरे-धीरे बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं. BRICS देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाने और डॉलर पर निर्भरता कम करने के रास्ते तलाश रहे हैं.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर जल्द दुनिया की नंबर-1 करेंसी का दर्जा खोने वाला है. IMF के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2026 की पहली तिमाही में दुनिया के घोषित विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 57.13% थी. पिछली तिमाही में यह 56.42% थी. यानी डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है.

आखिर डॉलर इतना ताकतवर कैसे बना

दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में शामिल होकर उभरा. अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार, मजबूत वित्तीय बाजार और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की बड़ी और लिक्विड मार्केट ने डॉलर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाया.

आज भी डॉलर केवल रिजर्व रखने की करेंसी नहीं है. इसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय कर्ज, बैंकिंग, विदेशी मुद्रा कारोबार और सीमा पार भुगतान में बड़े स्तर पर होता है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व के मुताबिक डॉलर दुनिया में विदेशी मुद्रा लेनदेन और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली करेंसी बना हुआ है.

यही वजह है कि डॉलर को चुनौती देना केवल दूसरी करेंसी जारी करने जितना आसान नहीं है.

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BRICS क्यों चाहता है डॉलर पर निर्भरता कम करना

BRICS में शामिल और उससे जुड़े कई देश चाहते हैं कि आपसी व्यापार के लिए हर बार डॉलर की जरूरत न पड़े. इसके पीछे एक कारण लेनदेन की लागत कम करना है, जबकि दूसरा कारण अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता घटाना है.

खासकर रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद यह चर्चा और तेज हुई कि किसी देश की अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था अगर डॉलर और पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क पर बहुत ज्यादा निर्भर है, तो राजनीतिक तनाव के समय उसके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

BRICS में वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम, सदस्य देशों की डिजिटल करेंसी को जोड़ने और भारत के UPI, चीन के CIPS और ब्राजील के PIX जैसी मौजूदा प्रणालियों के बीच बेहतर संपर्क बनाने जैसे विकल्पों पर चर्चा हो रही है.

चीन का युआन भी बढ़ा रहा अपनी मौजूदगी

डॉलर के विकल्प की चर्चा में चीन की करेंसी रेनमिन्बी यानी युआन सबसे महत्वपूर्ण नामों में से एक है. हालांकि, अभी इसका अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल डॉलर के मुकाबले काफी कम है.

SWIFT के जनवरी 2026 के आंकड़ों में रेनमिन्बी वैश्विक भुगतान में पांचवीं सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली करेंसी थी और उसकी हिस्सेदारी 3.13% थी.

लेकिन ट्रेड फाइनेंस में चीन की करेंसी तेजी से आगे बढ़ रही है. यूरोपियन सेंट्रल बैंक के मुताबिक मार्च 2026 तक SWIFT ट्रेड फाइनेंस मैसेज में रेनमिन्बी की हिस्सेदारी करीब 8% पहुंच गई, जबकि डॉलर की हिस्सेदारी करीब 81% रही.

यह आंकड़ा बताता है कि बदलाव हो रहा है, लेकिन डॉलर और उसके संभावित प्रतिद्वंद्वियों के बीच अभी भी बड़ा अंतर है.

क्या BRICS अपनी करेंसी लॉन्च करेगा

BRICS की एक साझा करेंसी को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है. लेकिन फिलहाल ज्यादा व्यावहारिक कोशिश डॉलर को पूरी तरह हटाकर एक नई करेंसी लाने के बजाय सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्रा में व्यापार और वैकल्पिक पेमेंट नेटवर्क विकसित करने की है.

यह रास्ता आसान भी है. उदाहरण के लिए भारत और किसी दूसरे देश के बीच व्यापार का कुछ हिस्सा रुपये और उस देश की मुद्रा में होने लगे तो हर लेनदेन के बीच डॉलर लाने की जरूरत कम हो सकती है.

भारत ने BRICS देशों की डिजिटल करेंसी को भविष्य में आपस में जोड़ने का विचार भी रखा है. दूसरी तरफ दुनियाभर के केंद्रीय बैंक भी तेज और सस्ते क्रॉस-बॉर्डर डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहे हैं.

डॉलर की सबसे बड़ी ताकत क्या है

डॉलर के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उसे चुनौती मिल रही है या नहीं. असली सवाल यह है कि उसकी जगह कौन ले सकता है.

यूरो एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय करेंसी है, लेकिन उसका दायरा डॉलर से छोटा है. चीन दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन युआन पर पूंजी नियंत्रण और चीन के वित्तीय बाजार की संरचना उसके तेजी से वैश्विक रिजर्व करेंसी बनने की राह में चुनौती हैं.

वहीं अमेरिकी ट्रेजरी मार्केट दुनिया के निवेशकों और केंद्रीय बैंकों को बड़े पैमाने पर ऐसी संपत्ति उपलब्ध कराती है, जिसे आसानी से खरीदा और बेचा जा सकता है. यही नेटवर्क डॉलर की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है. फेड के विश्लेषण में भी डॉलर की मजबूती के पीछे अमेरिकी वित्तीय बाजार की गहराई, लिक्विडिटी और संस्थानों पर भरोसे को अहम माना गया है.

डॉलर खत्म नहीं होगा, लेकिन दुनिया बदल सकती है

फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि डॉलर का दबदबा अचानक खत्म होने वाला है. बल्कि तस्वीर यह है कि दुनिया धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है, जहां एक ही करेंसी पर निर्भरता पहले से कम होगी.

डॉलर नंबर-1 बना रह सकता है, लेकिन उसके साथ यूरो, युआन और दूसरी स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ सकता है. BRICS की कोशिशों का सबसे बड़ा असर भी शायद डॉलर को हटाने के बजाय दुनिया को ज्यादा मल्टी-करेंसी सिस्टम की ओर ले जाने में दिखाई दे.

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि "क्या डॉलर खत्म होगा". ज्यादा सही सवाल यह है कि क्या आने वाले वर्षों में दुनिया को हर बड़े अंतरराष्ट्रीय सौदे के लिए डॉलर की उतनी ही जरूरत होगी, जितनी पिछले कई दशकों से रही है. मौजूदा बदलाव बताते हैं कि इस सवाल का जवाब धीरे-धीरे बदल रहा है.