अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर कितना पड़ा असर? तेल से लेकर हवाई यात्रा और महंगाई तक समझिए पूरी कहानी
अमेरिका-ईरान तनाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिख रहा है. महंगे कच्चे तेल, हवाई यात्रा, रुपये और महंगाई से लेकर गैस की कीमतों तक इसका असर कैसे पहुंच रहा है, जानिए पूरी कहानी.
टिएनपी डेस्क (TNP DESK): अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव का असर अब सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है. इसकी गर्मी भारत की अर्थव्यवस्था तक भी पहुंच रही है. सबसे ज्यादा असर तेल, गैस, हवाई यात्रा, रुपये और महंगाई पर देखने को मिल रहा है. खास बात यह है कि भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है. ऐसे में दुनिया में तेल महंगा होते ही भारत का खर्च भी बढ़ जाता है.
सबसे पहले तेल पर पड़ा असर
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल पर पड़ा है. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के साथ दुनिया के सबसे अहम तेल रास्तों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित हुई. इस रास्ते से दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल और गैस गुजरता है. इसलिए यहां थोड़ी भी परेशानी होने पर दुनियाभर में तेल के दाम बढ़ने लगते हैं.
अगस्त में एक बार फिर कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई. 20 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 93.78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. अगर यह कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा. इसका सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ेगा.
पेट्रोल-डीजल महंगा होने का डर
कच्चा तेल महंगा होने का असर पेट्रोल और डीजल पर भी पड़ सकता है. हालांकि, भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत सिर्फ अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत से तय नहीं होती. सरकार और तेल कंपनियों की नीतियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं.
यही वजह है कि तेल की कीमत बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में बढ़ोतरी को कुछ समय तक रोका जा सकता है. लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल महंगा रहा तो तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा और आगे चलकर इसका असर ग्राहकों तक पहुंच सकता है.

गैस और एलपीजी की भी चिंता
भारत की परेशानी सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक नहीं है. पश्चिम एशिया से भारत को एलपीजी और एलएनजी की भी बड़ी मात्रा मिलती है. अगर समुद्री रास्तों में दिक्कत रहती है तो गैस की सप्लाई और उसे भारत तक पहुंचाने का खर्च दोनों बढ़ सकते हैं.
इसका असर घरों की रसोई से लेकर कारखानों तक पड़ सकता है. गैस महंगी होने पर बिजली, खाद और कई उद्योगों की लागत भी बढ़ सकती है. यानी एक जगह बढ़ी ऊर्जा कीमत धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था में असर डाल सकती है.
हवाई सफर भी हुआ मुश्किल
युद्ध का असर हवाई यात्रा पर भी साफ दिखाई दे रहा है. पश्चिम एशिया के कई एयर रूट प्रभावित हुए हैं. ऐसे में भारतीय एयरलाइंस को कई जगह लंबा रास्ता लेना पड़ा. लंबा रूट यानी ज्यादा समय और ज्यादा विमान ईंधन का खर्च.
इसका असर यात्रियों पर भी पड़ सकता है. उड़ानें महंगी हो सकती हैं और कुछ रूट पर उड़ानों की संख्या भी घट सकती है.
अप्रैल से जून 2026 के बीच भारत आने-जाने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या करीब 10.5 फीसदी घटकर 1.7 करोड़ रह गई. भारतीय एयरलाइंस पर इसका असर और ज्यादा पड़ा. उनके अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या करीब 26 फीसदी कम हुई. एयर इंडिया ग्रुप की अंतरराष्ट्रीय कैरिज में करीब 35 फीसदी और इंडिगो में 15.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
रुपये पर भी बढ़ा दबाव
तेल खरीदने के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है. जब तेल महंगा होता है तो भारत को पहले से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आ सकता है.
यानी महंगा तेल सिर्फ पेट्रोल पंप तक की समस्या नहीं है. इसका असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ता है. अगर रुपया कमजोर होता है तो विदेश से आने वाली कई चीजें महंगी हो सकती हैं.

महंगाई का असर आम लोगों तक
अब सबसे बड़ा सवाल है कि इसका असर आम आदमी की जेब पर कितना पड़ेगा.
मान लीजिए डीजल महंगा हुआ. तो ट्रक से सामान लाने-ले जाने का खर्च बढ़ेगा. इससे सब्जी, फल, अनाज और दूसरी रोजमर्रा की चीजों की कीमत पर असर पड़ सकता है.
इसी तरह कारखानों में तेल और गैस महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ती है. कंपनियों का खर्च बढ़ेगा तो वे इसका कुछ हिस्सा अपने उत्पादों की कीमत में जोड़ सकती हैं. यही वजह है कि महंगा तेल धीरे-धीरे महंगाई बढ़ाने का कारण बन सकता है.
भारतीय रिजर्व बैंक भी इस जोखिम पर नजर रख रहा है. अगस्त में आरबीआई ने ब्याज दर को 5.25 फीसदी पर बनाए रखा, लेकिन अधिकारियों ने साफ संकेत दिया कि अगर तेल और दूसरी लागत बढ़ने से महंगाई का दबाव ज्यादा बढ़ा तो आगे सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं.
भारत ने क्या किया?
भारत ने इस संकट के बीच एक ही जगह से तेल लेने पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे देशों से भी तेल खरीदना शुरू किया है. हाल के महीनों में लैटिन अमेरिका से तेल आयात बढ़ाने की कोशिश हुई है. वेनेजुएला भी भारत के लिए एक अहम वैकल्पिक सप्लायर बनकर सामने आया है. हालांकि, वहां से तेल लाने में समुद्री दूरी ज्यादा होने के कारण परिवहन खर्च भी बढ़ सकता है.
भारत की रिफाइनरियां भी इस स्थिति में काफी सक्रिय हैं. देश की कुछ बड़ी रिफाइनरियां ज्यादा क्षमता पर काम कर रही हैं और विदेशों में पेट्रोलियम उत्पाद भेज रही हैं. इससे भारत को वैश्विक सप्लाई संकट के बीच कुछ फायदा भी मिल रहा है.

आगे क्या होगा?
आगे भारत पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कितने समय तक चलता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही कब सामान्य होती है.
अगर तनाव कम होता है और तेल की सप्लाई सामान्य होती है तो कीमतों पर दबाव घट सकता है. लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है तो भारत का तेल आयात बिल, रुपये की स्थिति और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है.
कुल मिलाकर देखें तो अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर सबसे बड़ा असर तेल के रास्ते पड़ा है. तेल महंगा हुआ तो उसका असर पेट्रोल-डीजल, गैस, हवाई यात्रा, माल ढुलाई, रुपये और आखिर में आम आदमी की जेब तक पहुंचता है. भारत ने दूसरे देशों से तेल खरीदकर और अपनी रिफाइनरियों का इस्तेमाल बढ़ाकर स्थिति संभालने की कोशिश की है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है.