टीएनपी डेस्क (TNP DESK): भोजपुरी सिर्फ बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुछ हिस्सों में बोली जाने वाली भाषा नहीं है. पिछले करीब दो सौ वर्षों में यह भाषा भारत से निकलकर दुनिया के कई देशों तक पहुंची. मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में आज भी भोजपुरी की विरासत दिखाई देती है. इसकी अंतरराष्ट्रीय यात्रा के पीछे सबसे बड़ी वजह 19वीं सदी में भारत से हुआ मजदूरों का प्रवासन था. हालांकि, एक जरूरी बात यह है कि भोजपुरी के इंडोनेशिया पहुंचने की कहानी को सीधे बड़े पैमाने के भोजपुरी प्रवासन से जोड़ना सही नहीं होगा. उपलब्ध प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत भोजपुरी प्रवासी समुदाय के बड़े केंद्रों के रूप में मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और कैरेबियाई देशों का उल्लेख करते हैं.
भोजपुरी की शुरुआत कहां से हुई
भोजपुरी पूर्वी भारत की प्रमुख इंडो-आर्यन भाषाओं में शामिल है. इसका मुख्य क्षेत्र पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश रहा है. झारखंड के कुछ हिस्सों और नेपाल के तराई क्षेत्र में भी भोजपुरी बोलने वाले समुदाय लंबे समय से मौजूद रहे हैं.
भोजपुरी का विकास अचानक नहीं हुआ. दूसरी भारतीय भाषाओं की तरह इसका स्वरूप भी कई भाषाई चरणों से गुजरते हुए बना. इसकी लोक परंपरा में गीत, बिरहा, विवाह गीत, सोहर और खेती-किसानी से जुड़े लोकगीतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यही मौखिक परंपरा बाद में विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के लिए अपनी पहचान बचाए रखने का माध्यम बनी.

19वीं सदी में शुरू हुआ बड़ा बदलाव
भोजपुरी के वैश्विक सफर में सबसे बड़ा मोड़ 19वीं सदी में आया. ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी खत्म होने के बाद कई उपनिवेशों में खेती और खासकर गन्ने के बागानों के लिए मजदूरों की जरूरत बढ़ गई. इसके बाद भारत से अनुबंधित मजदूरों को अलग-अलग देशों में ले जाया जाने लगा.
1834 के बाद बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में लोग इस व्यवस्था के तहत बाहर गए. इनमें भोजपुरी बोलने वालों की संख्या काफी थी. मॉरीशस में भारतीय मजदूरों का आगमन 1830 के दशक में तेज हुआ. बाद में सूरीनाम, फिजी और कैरेबियाई क्षेत्रों तक भी यह प्रवासन पहुंचा.
मॉरीशस में भोजपुरी बनी पहचान
भोजपुरी के विदेशी सफर की सबसे मजबूत कहानियों में मॉरीशस का नाम आता है. 19वीं और 20वीं सदी के शुरुआती दौर में बिहार और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में भारतीय मजदूर वहां पहुंचे. इनमें अधिकांश लोग ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे और भोजपुरी समेत उत्तर भारतीय भाषाएं बोलते थे.
मॉरीशस के गन्ने के खेतों और भारतीय बस्तियों में भोजपुरी धीरे-धीरे संपर्क भाषा बन गई. अलग-अलग भारतीय भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच भी इसका इस्तेमाल होने लगा. समय के साथ स्थानीय क्रियोल, फ्रेंच और अंग्रेजी का प्रभाव भोजपुरी पर पड़ा और वहां भोजपुरी का एक अलग स्थानीय रूप विकसित हुआ.
आज भी मॉरीशस में भोजपुरी केवल भाषा नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है. गीत गवई जैसी परंपरा इसका बड़ा उदाहरण है. यूनेस्को ने गीत गवई को 2016 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी थी.
फिजी से सूरीनाम तक पहुंची आवाज
भोजपुरी भाषी मजदूरों का एक बड़ा समूह फिजी भी पहुंचा. 1879 से भारतीय अनुबंधित मजदूरों का वहां जाना शुरू हुआ. इनमें बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए लोगों की बड़ी संख्या थी. उनके साथ भोजपुरी लोकगीत और सांस्कृतिक परंपराएं भी पहुंचीं. इन गीतों में घर से दूर रहने का दर्द, खेतों में मेहनत और अपने गांव की याद जैसी भावनाएं दिखाई देती थीं.
सूरीनाम में भारतीय मजदूरों का आगमन 1873 में शुरू हुआ. वहां भी बड़ी संख्या में मजदूर वर्तमान बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों से आए. उनकी भाषाई विरासत ने आगे चलकर स्थानीय भारतीय समुदाय की पहचान को आकार दिया.

फिर इंडोनेशिया का नाम क्यों आता है
इंडोनेशिया में भारतीय समुदाय का इतिहास काफी पुराना है. 19वीं सदी में डच शासन के दौरान भारत से मजदूर भी इंडोनेशिया लाए गए थे. लेकिन उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि वहां आने वाले भारतीयों में बड़ी संख्या दक्षिण भारत से थी. बाद में उत्तर भारतीय समुदाय भी वहां पहुंचा. इसलिए इंडोनेशिया को मॉरीशस या सूरीनाम की तरह भोजपुरी के बड़े ऐतिहासिक केंद्र के रूप में देखना उचित नहीं है.
आज भारत और इंडोनेशिया के बीच सांस्कृतिक संपर्क जरूर जारी है. भारतीय सांस्कृतिक संस्थाएं इंडोनेशिया में कार्यक्रमों और सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडलों के जरिए भारतीय भाषाओं और परंपराओं को पहुंचाती रही हैं.

भोजपुरी का असली सफर क्या बताता है
भोजपुरी का अंतरराष्ट्रीय सफर केवल एक भाषा के फैलने की कहानी नहीं है. यह उन लाखों भारतीयों की कहानी भी है जिन्होंने अपने गांव, परिवार और देश से दूर जाकर नई जगहों पर जीवन शुरू किया. वे अपने साथ सिर्फ सामान नहीं ले गए. वे अपनी बोली, गीत, त्योहार, खान-पान और यादें भी लेकर गए.
इसी वजह से आज भोजपुरी भारत की सीमाओं से बाहर भी सुनाई देती है. कहीं इसका स्वर मॉरीशस के गीतों में मिलता है, कहीं फिजी के लोकगीतों में और कहीं सूरीनाम की भाषाई विरासत में. समय के साथ इसके शब्द और उच्चारण बदले हैं, लेकिन इसकी जड़ें अब भी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की उस मिट्टी से जुड़ी हैं, जहां से करीब दो सदी पहले इसका वैश्विक सफर शुरू हुआ था.
