टिएनपी डेस्क(TNP DESK): नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ के करीब एक सप्ताह बाद भी हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं. पहाड़ों से अचानक आए पानी, बर्फ, चट्टानों और मिट्टी के तेज बहाव ने कई इलाकों की तस्वीर बदल दी. घर और सड़कें बह गईं, पुल टूट गए और कई जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले लोग फंस गए. अब राहत अभियान उन इलाकों तक पहुंच रहा है, जहां शुरुआती दिनों में जाना बेहद मुश्किल था.
नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी के मुताबिक, 31 अगस्त की शाम तक 939 शव बरामद किए जा चुके थे, जबकि 3,925 लोग अब भी संपर्क से बाहर थे. 1 सितंबर को सामने आए नए आंकड़ों में मृतकों की संख्या 987 तक पहुंचने की जानकारी दी गई. संख्या लगातार बदल रही है क्योंकि नए इलाकों में खोज अभियान जारी है.
26 अगस्त को कैसे आई इतनी बड़ी बाढ़?
इस तबाही की शुरुआत नेपाल और तिब्बत की सीमा के पास ऊंचे हिमालयी इलाके से हुई. शुरुआती जानकारी के मुताबिक, ग्लेशियर से जुड़ा एक बड़ा हिस्सा टूटने के बाद बर्फ, पानी, चट्टान और मिट्टी तेजी से नीचे की तरफ आए. इसने देखते ही देखते भोटे कोशी नदी में बेहद तेज बहाव पैदा कर दिया.
पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा आने के कारण नदी के रास्ते में मौजूद मकान, सड़कें, पुल और दूसरी संरचनाएं टिक नहीं सकीं. सबसे ज्यादा असर रसुवा और उसके नीचे के इलाकों में दिखाई दिया. पानी और मलबा आगे बढ़ते हुए त्रिशूली और नारायणी नदी प्रणाली तक पहुंच गया.
यही कारण है कि कई शव मूल घटनास्थल से बहुत दूर चितवन और दूसरे निचले इलाकों में मिले.

करीब 21 हजार जवान मैदान में, हेलिकॉप्टर से भी बचाव
नेपाल सरकार ने सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल को बड़े स्तर पर राहत अभियान में लगाया है. 31 अगस्त तक करीब 20,819 सुरक्षाकर्मी अलग-अलग प्रभावित इलाकों में तैनात थे.
नेपाल की सेना ने 400 से ज्यादा हवाई उड़ानें कर हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया. अब तक 10 हजार से ज्यादा लोगों को प्रभावित क्षेत्रों से बचाया जा चुका है.
जहां सड़कें पूरी तरह टूट गई थीं, वहां अस्थायी पुल बनाए जा रहे हैं. नुवाकोट जैसे बुरी तरह प्रभावित इलाके में सड़क संपर्क दोबारा शुरू होने से राहत सामग्री पहुंचाना आसान हुआ है. कुछ इलाकों में बिजली और संचार सेवाएं भी वापस शुरू हो गई हैं.
अब सुरंगों में फंसे लोगों पर सबसे ज्यादा ध्यान
इस समय बचाव अभियान का सबसे मुश्किल हिस्सा जलविद्युत परियोजनाएं हैं. बाढ़ के समय इन परियोजनाओं और उनकी सुरंगों में बड़ी संख्या में कर्मचारी मौजूद थे.
तेज बहाव के साथ आए पत्थर और मिट्टी ने कई सुरंगों के प्रवेश वाले हिस्से बंद कर दिए. अब बचाव टीमें इन्हीं रास्तों को खोलने की कोशिश कर रही हैं.
1 सितंबर तक जलविद्युत परियोजनाओं से करीब 279 कर्मचारियों को बचाया जा चुका था. करीब 600 लोगों के अब भी अलग-अलग प्रभावित परियोजनाओं में फंसे होने की आशंका जताई गई.
सुरंगों के अंदर जमा मलबे को हटाने के साथ हवा पहुंचाने और सुरक्षित रास्ता तैयार करने का काम किया जा रहा है.

भारत ने भेजे सुरंग बचाव विशेषज्ञ
भारत इस पूरे अभियान में नेपाल की कई स्तर पर मदद कर रहा है. सबसे महत्वपूर्ण मदद सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के लिए दी जा रही है.
नेपाल सरकार के मुताबिक, भारत की 11 सदस्यीय विशेष सुरंग बचाव टीम को अभियान में लगाया गया. इसके अलावा चीन के 9 विशेषज्ञ और दक्षिण कोरिया की टीम भी नेपाली अधिकारियों के साथ काम कर रही है.
भारत ने नेपाल को जनरेटर, दवाइयां, खाने के पैकेट, पानी साफ करने की गोलियां और तकनीकी उपकरण सहित करीब 68.5 टन राहत सामग्री पहुंचाई. भारतीय वायुसेना के विमानों से यह सामान काठमांडू भेजा गया.
इसके अलावा 230 फीट लंबे अस्थायी स्टील पुल के लिए 16 ट्रक उपकरण नेपाल पहुंचाए गए. सात और अस्थायी पुलों के उपकरण उपलब्ध कराने की तैयारी भी की गई.
अंतिम संस्कार की जगह क्यों दफनाए जा रहे अज्ञात शव?
नेपाल हिंदू बहुल देश है और सामान्य तौर पर हिंदू परंपरा में शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है. लेकिन इस आपदा में स्थिति अलग है.
चितवन के अस्पतालों और शवगृहों में क्षमता से कहीं ज्यादा शव पहुंचने लगे. कई शवों की पहचान भी नहीं हो पा रही थी. तेजी से खराब होती स्थिति और स्वास्थ्य से जुड़े खतरे को देखते हुए प्रशासन ने अज्ञात शवों को अस्थायी रूप से दफनाने का फैसला किया.
चितवन के देवघाट जंगल में 30 अगस्त तक बड़ी संख्या में अज्ञात शवों को दफनाया गया. सिर्फ एक दिन में 96 शवों को यहां दफनाया गया था.
लेकिन शवों को बिना रिकॉर्ड के नहीं दफनाया जा रहा है. हर शव की तस्वीर ली जा रही है, पोस्टमार्टम किया जा रहा है और डीएनए नमूना सुरक्षित रखा जा रहा है. शव को एक नंबर दिया जाता है और जिस स्थान पर उसे दफनाया गया है, उसका रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखा जा रहा है.

अब राहत से पुनर्वास की तरफ बढ़ रहा नेपाल
नेपाल में अभियान अब केवल लोगों को बचाने तक सीमित नहीं है. एक तरफ सुरंगों और मलबे में लापता लोगों की तलाश जारी है, दूसरी तरफ सुरक्षित बचे लोगों के लिए खाना, साफ पानी, दवाइयां और अस्थायी घरों की व्यवस्था की जा रही है.
नेपाल के सामने अगली बड़ी चुनौती तबाह हुए गांवों को दोबारा बसाने की होगी. सड़कें, पुल, बिजली व्यवस्था और जलविद्युत परियोजनाओं को फिर खड़ा करने में लंबा समय लग सकता है.
फिलहाल सबसे बड़ी उम्मीद उन परिवारों की है जिनके अपने अब भी लापता हैं. इसी वजह से बचाव अभियान बंद नहीं किया गया है. सुरंगों से मलबा हटाया जा रहा है, नदियों और दूर-दराज के इलाकों में तलाश चल रही है और अज्ञात शवों की डीएनए जांच की जा रही है. करीब एक सप्ताह बाद नेपाल की लड़ाई अब बाढ़ के पानी से नहीं, बल्कि उसके पीछे छोड़ी गई भारी तबाही से है.