भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत? मोदी-शी की मुलाकात के बाद क्या बदला, जानिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद भारत-चीन रिश्तों में बातचीत का दौर आगे बढ़ता दिख रहा है. सीमा विवाद, व्यापार, उड़ान और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच चर्चा हुई.

भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत? मोदी-शी की मुलाकात के बाद क्या बदला, जानिए

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): भारत और चीन के रिश्ते पिछले कुछ सालों में काफी उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं. 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के बीच भरोसा बुरी तरह प्रभावित हुआ था. सीमा पर तनाव के साथ-साथ व्यापार, आवाजाही और लोगों के बीच संपर्क पर भी इसका असर पड़ा. ऐसे में 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को दोनों देशों के रिश्तों में एक अहम पड़ाव माना जा रहा है. यह मुलाकात BRICS सम्मेलन के दौरान हुई और करीब सात साल बाद शी जिनपिंग भारत आए.

सीमा विवाद पर क्या बात हुई?

मोदी-शी मुलाकात में सबसे अहम मुद्दा सीमा का ही रहा. भारत ने साफ किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा. प्रधानमंत्री मोदी ने पुराने सीमा समझौतों और आपसी सहमतियों का पालन करने की जरूरत पर जोर दिया.

दोनों नेताओं ने सीमा विवाद के एक निष्पक्ष, उचित और दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही. यानी सीमा का मुद्दा खत्म नहीं हुआ है, लेकिन बातचीत और तनाव कम रखने का रास्ता खुला हुआ है.

यहां दोनों देशों की सोच में एक फर्क भी नजर आता है. भारत सीमा पर शांति को बाकी रिश्तों की प्रगति के लिए जरूरी आधार मानता है, जबकि चीन व्यापक रिश्तों और सीमा विवाद पर एक साथ आगे बढ़ने की बात करता है.

व्यापार बढ़ाने पर भी जोर

सीमा के अलावा व्यापार भी बातचीत का बड़ा मुद्दा रहा. दोनों देशों ने माना कि आर्थिक रिश्तों में अभी कई समस्याएं हैं. खास तौर पर व्यापार में असंतुलन और सप्लाई चेन से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने पर बात हुई.

भारत चाहता है कि उसके कारोबारियों और कंपनियों को चीन के बाजार में ज्यादा आसान और भरोसेमंद पहुंच मिले. दूसरी तरफ चीन के साथ व्यापार में भारत की निर्भरता भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है. 2025-26 में चीन भारत के लिए आयात का सबसे बड़ा स्रोत रहा और करीब 132 अरब डॉलर का सामान चीन से भारत आया.

इसलिए आने वाले समय में सिर्फ व्यापार बढ़ाना ही मुद्दा नहीं होगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि दोनों देशों के बीच व्यापार किस तरह संतुलित होता है.

हवाई सेवा और लोगों की आवाजाही में सुधार

भारत-चीन रिश्तों में बदलाव सिर्फ नेताओं की बैठकों तक सीमित नहीं है. दोनों देशों के बीच आम लोगों की आवाजाही भी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है.

भारत सरकार के मुताबिक, 2025 में करीब पांच साल के अंतराल के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हुई. 2026 में भी यात्रा जारी रही. इसके अलावा दोनों देशों के बीच सीधी उड़ान सेवाएं अक्टूबर 2025 में फिर शुरू हुई थीं.

अब दोनों देशों ने कल्चरल कान्टैक्ट, कारोबार और लोगों की आवाजाही को और बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया है. इसका मतलब यह है कि रिश्तों को सिर्फ सीमा और राजनीति के नजरिए से नहीं, बल्कि सामान्य संपर्क के स्तर पर भी सुधारने की कोशिश हो रही है.

क्या 2020 के बाद सब कुछ सामान्य हो गया?

ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी. गलवान के बाद दोनों देशों के बीच जो भरोसे की कमी आई, उसे एक-दो मुलाकातों से पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता.

सीमा पर दोनों देशों की सैन्य मौजूदगी अभी भी बनी हुई है. इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद हैं. चीन की तरफ से अरुणाचल प्रदेश पर दावे किए जाते रहे हैं, जबकि भारत लगातार इसे अपने क्षेत्र का हिस्सा बताता है. व्यापार में भी कई अड़चनें अभी मौजूद हैं.

यानी रिश्तों में सुधार के संकेत जरूर हैं, लेकिन पुराने विवाद अभी खत्म नहीं हुए हैं.

फिर मोदी-शी की मुलाकात का मतलब क्या है?

सीधी भाषा में समझें तो इस मुलाकात का सबसे बड़ा मतलब यह है कि दोनों देश बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहते हैं. 2020 के तनाव के बाद जहां रिश्ते काफी हद तक ठहर गए थे, वहीं अब सीमा, व्यापार, उड़ान, तीर्थयात्रा और लोगों की आवाजाही जैसे कई मोर्चों पर धीरे-धीरे संपर्क बढ़ रहा है.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी दोनों देशों को साझेदार के तौर पर देखने और एक-दूसरे की ताकत का फायदा उठाकर आगे बढ़ने की बात कही. भारत ने भी साफ किया है कि मतभेदों को विवाद में बदलने से बचना जरूरी है.

इसलिए अभी इसे भारत-चीन रिश्तों की पूरी तरह सामान्य वापसी कहना ठीक नहीं होगा. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि दोनों देशों के बीच बातचीत और संपर्क का एक नया दौर चल रहा है. अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि सीमा पर शांति, व्यापार और आपसी भरोसे को लेकर बनी यह बातचीत आने वाले महीनों में जमीन पर कितनी आगे बढ़ती है.