सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड कर रहा हैं “मोदी है तो भुखमरी है”, जानिए इसके पीछे की पूरी कहानी  

    सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड कर रहा हैं “मोदी है तो भुखमरी है”, जानिए इसके पीछे की पूरी कहानी  

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक Hashtag सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है. विपक्ष भी इसे लेकर सरकार को घेरने में लगी है. ये hashtag है, “मोदी है तो भुखमरी है”. आखिर अचानक से ये hashtag क्यों ट्रेंड करने लगा इसके पीछे भी कहानी है. दरअसल, ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 121 देशों में भारत को 107वां स्थान मिला है. इस रैंकिंग में भारत, श्रीलंका, म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश से पीछे है. इसी वजह से सरकार को घेरा जा रहा है. इस आंकड़े के मुताबिक भारत में भूखमरी की स्थिति है. ऐसे में लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सवाल उठा रहे हैं और “मोदी है तो भुखमरी है” ट्रेंड करा रहे हैं.

    हालांकि, भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने GHI की रिपोर्ट को खारिज कर दिया है. उनका मानना है कि देश में ऐसी कोई भुखमरी की स्थिति नहीं है. दो साल में दूसरी बार महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) को खारिज कर दिया, जिसने 121 देशों में भारत को 107वां स्थान दिया था. भारत को श्रीलंका (66), म्यांमार (71), नेपाल (81) और बांग्लादेश (84) से पीछे रखते हुए, 100 में से 29.1 का स्कोर दिया गया.  

    ग्लोबल हंगर इंडेक्स(GHI) क्या है?

    GHI, एक वार्षिक रिपोर्ट है, जो कि कई रिव्यू पर आधारित होता है. इस रिपोर्ट में वैश्विक, क्षेत्रीय और देश के स्तर पर भूख को व्यापक रूप से मापने और ट्रैक करने का प्रयास किया जाता है. यह जर्मनी स्थित गैर-लाभकारी संगठन वेल्थुंगरहिल्फ़ और आयरलैंड स्थित कंसर्न वर्ल्डवाइड द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है. रिपोर्ट के लेखक मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र के Sustainable Development Goal 2 (SDG 2) का उल्लेख करते हैं, जो 2030 तक zero hunger प्राप्त करने का प्रयास करता है. उनके अनुसार यह रिपोर्ट भूख के खिलाफ संघर्ष के बारे में जागरूकता और समझ बढ़ाने का प्रयास करती है. GHI की पहली रिपोर्ट 2006 में प्रकाशित हुई थी. 2022 में प्रकाशित ये रिपोर्ट GHI का 17वां संस्करण है.

    महिला और बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, रिपोर्ट कुपोषित (PoU) जनसंख्या के अनुपात के अनुमान के आधार पर भारत की रैंक को कम करती है. यह विस्तार से बताता है कि अमेरिकी खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) का अनुमान गैलप वर्ल्ड पोल का उपयोग करके किए गए 'खाद्य असुरक्षा अनुभव स्केल (एफआईईएस)' सर्वेक्षण मॉड्यूल पर आधारित है. इसमें कहा गया है कि डेटा भारत के आकार के देश के लिए एक छोटे से अनुपात का प्रतिनिधित्व करता है. इसने रिपोर्ट में दावों का खंडन किया कि भारत की प्रति व्यक्ति आहार ऊर्जा आपूर्ति साल-दर-साल देश में प्रमुख कृषि वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि के कारण बढ़ रही है.

    विवाद क्यों?

    मंत्रालय के अनुसार, रिपोर्ट न केवल जमीनी हकीकत से अलग है, बल्कि विशेष रूप से महामारी के दौरान केंद्र सरकार के खाद्य सुरक्षा प्रयासों को जानबूझकर नजरअंदाज करती है. प्रधान मंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएम-जीकेएवाई) के माध्यम से केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुसार खाद्यान्न के अपने सामान्य कोटे के अलावा हर महीने प्रति व्यक्ति अतिरिक्त पांच किलो राशन का प्रावधान किया. इसे हाल ही में दिसंबर 2022 तक बढ़ा दिया गया था. बात चाहे जो भी, लेकिन सोशल मीडिया पर इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को जमकर ट्रोल किया जा रहा है.

     


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