टीनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड के सियासी गलियारों पर इन दिनों एक शब्द बहुत तेजी से गूंज रहा है और वो शब्द है 'SIR' (एसआईआर). झारखंड में इस 'SIR' ने राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा झारखंड समेत कई राज्यों में 'SIR' प्रक्रिया की घोषणा के बाद से ही राज्य में हलचल पैदा हो रही है. एक तरफ जहां बीजेपी SIR को झारखंड के अस्तित्व को बचाने का जरिया बता रही है तो वहीं दूसरी तरफ सत्तारूढ़ सरकार झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस गठबंधन इसे लोकतंत्र पर हमला करार दे रहा है. लेकिन इससे पहले समझते यही की आखिर क्या है SIR?
क्या है 'SIR' (Special Intensive Revision)?
SIR यानी 'Special Intensive Revision' (विशेष गहन पुनरीक्षण) एक चुनावी प्रक्रिया है जहां चुनाव आयोग के अधिकारी और बीएलओ (BLO - बूथ लेवल ऑफिसर) घर-घर जाकर प्रत्येक मतदाता का भौतिक सत्यापन करते हैं. यह आम मतदाता सूची (Voter List) संशोधन जैसा नहीं है बल्कि इसके तहत फर्जी मतदाताओं, एक से अधिक जगह नाम रखने वाले लोगों और मृत व्यक्तियों के नाम लिस्ट से हटाए जाते हैं. अगर झारखंड में SIR की बात करें तो इसके तहत ढाई करोड़ से अधिक मतदाताओं के दस्तावेजों की स्क्रूटनी की जा रही है और सूत्रों के अनुसार, करीब 12 लाख संदिग्ध नामों को लिस्ट से हटाने की तैयारी है.
क्यों हो रहा इसपर बड़ा विवाद?
'SIR' को लेकर विवाद की मुख्य जड़ 'डेमोग्राफी' (जनसांख्यिकी बदलाव) और 'अवैध घुसपैठ' से जुड़ी हुई है. झारखंड का संथाल परगना क्षेत्र (जिसमें पाकुड़, साहिबगंज, जामताड़ा और दुमका जैसे जिले शामिल हैं) लंबे समय से बांग्लादेशी घुसपैठ की मार झेल रहा है. अब यहाँ भाजपा का आरोप है कि पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सीमाओं से सटे इन जिलों में पिछले कुछ दशकों में रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों ने बड़े पैमाने पर अवैध तरीके से स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से अपने वोटर कार्ड और आधार कार्ड बनवा लिए हैं. साथ ही
विवाद तब और गहरा गया जब पड़ोसी राज्यों असम में एनआरसी-यूसीसी (NRC-UCC) की सख्ती और पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों के लिए 'डिटेंशन सेंटर' बनाने की घोषणा हुई. बीजेपी का दावा है कि वहां से भागकर घुसपैठिए अब झारखंड को अपना 'सेफ जोन' बना रहे हैं. 'SIR' के जरिए चुनाव आयोग इन्हीं फर्जी वोटरों की पहचान कर रहा है, जिससे राज्य का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकता है.
किसे और क्या है इस पर एतराज?
झारखंड की सत्तारूढ़ महागठबंधन सरकार (JMM, कांग्रेस और आरजेडी) को 'SIR' की इस प्रक्रिया पर सबसे तीखा एतराज है. जेएमएम और कांग्रेस का सीधा आरोप है कि बीजेपी चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल करके उनके पारंपरिक वोट बैंक यानी विशेषकर आदिवासियों, मूलवासियों और अल्पसंख्यकों का नाम वोटर लिस्ट से कटवाना चाहती है. वहीं दूसरा कारण है महागठबंधन के नेताओं का कहना है कि झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले गरीब आदिवासियों और मूलवासियों के पास दशकों पुराने कागजात या सर्टिफिकेट नहीं होते हैं. वे सिर्फ पर्चा देखकर वोट देते आए हैं. ऐसे में कठिन दस्तावेज मांगने से असली और गरीब नागरिक भी वोटिंग के अधिकार से वंचित हो जाएंगे.
बता दें, इस विवाद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हेमंत सरकार के मंत्री इरफान अंसारी ने एक जनसभा में यहां तक कह दिया था कि "यदि कोई अधिकारी वोटर लिस्ट से नाम काटने या वेरिफिकेशन के नाम पर पेपर मांगने आए, तो उसे कमरे में बंद कर ताला मार दो." हालांकि बाद में उन्होंने इस पर सफाई दी, लेकिन विपक्ष ने इसे सरकारी काम में बाधा और भड़काऊ बयान माना.
बीजेपी का क्या है स्टैंड?
इसके विपरीत, झारखंड बीजेपी इस मिशन 'SIR' को लेकर पूरी तरह आक्रामक है. भाजपा नेताओं का कहना है कि साल 1951 से 2011 के बीच संथाल परगना में आदिवासियों की आबादी 16% घट गई और एक विशेष समुदाय की आबादी 14% बढ़ गई. बीजेपी के अनुसार, यह घुसपैठियों के कारण हुआ है जो स्थानीय आदिवासी युवतियों से शादी करके उनकी जमीन और राजनीतिक अधिकारों पर कब्जा कर रहे हैं. बीजेपी का साफ स्टैंड है कि 100% गहनता के साथ 'SIR' होना चाहिए ताकि कोई भी अवैध विदेशी नागरिक भारत का मतदाता न बन सके.

