हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय इन बातों का रखें ख्याल, अनदेखी की तो खुद के पॉकेट से भरना होगा इलाज का पैसा


टीएनपी डेस्क (TNP DESK): देश में संक्रामक बीमारियों और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. ऐसे में बेहतर इलाज और आर्थिक सुरक्षा के लिए हेल्थ इंश्योरेंस पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है. अगर आप गंभीर बीमारियों के इलाज के खर्च से खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैं और हेल्थ इंश्योरेंस लेने की योजना बना रहे हैं, तो पॉलिसी खरीदने से पहले कुछ अहम बातों को समझना बेहद जरूरी है.
पॉलिसी में मिलने वाले कवर को ध्यान से समझें
बीमा कंपनियां अलग-अलग तरह के हेल्थ इंश्योरेंस प्लान पेश करती हैं और हर प्लान के नियम अलग होते हैं. पॉलिसी लेने से पहले यह जरूर जांच लें कि उसमें इलाज से जुड़ा कौन-कौन सा खर्च शामिल है. ऐसी पॉलिसी चुनना बेहतर होता है, जिसमें अस्पताल में भर्ती होने के खर्च के साथ जांच, एम्बुलेंस और अन्य जरूरी सेवाएं भी कवर हों, ताकि इलाज के समय जेब से पैसे खर्च न करने पड़ें.
पहले से मौजूद बीमारियों की शर्तें जान लें
अधिकांश हेल्थ इंश्योरेंस प्लान पहले से मौजूद बीमारियों को कवर करते हैं, लेकिन इसके लिए एक तय वेटिंग पीरियड होता है. आमतौर पर यह कवर 36 से 48 महीने बाद शुरू होता है. पॉलिसी लेते समय अपनी पुरानी बीमारियों की पूरी और सही जानकारी देना जरूरी है, ताकि बाद में क्लेम के दौरान किसी तरह की परेशानी न आए.
नेटवर्क अस्पतालों की सूची जरूर जांचें
हेल्थ प्लान लेने से पहले यह सुनिश्चित करें कि आपके आसपास अधिक और अच्छे नेटवर्क अस्पताल शामिल हों. नेटवर्क अस्पताल वही होते हैं, जहां कैशलेस इलाज की सुविधा मिलती है. अगर आपके क्षेत्र में नेटवर्क अस्पताल कम हैं, तो आपात स्थिति में पॉलिसी होने के बावजूद परेशानी हो सकती है.
को-पे का विकल्प सोच-समझकर चुनें
प्रीमियम कम करने के लिए कई लोग को-पे का विकल्प चुन लेते हैं. इसका मतलब है कि क्लेम के समय इलाज के खर्च का एक हिस्सा आपको खुद देना होगा. प्रीमियम में मिलने वाली छूट सीमित होती है, लेकिन बीमारी के वक्त यह विकल्प आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है.
मेडिकल हिस्ट्री छुपाने की गलती न करें
हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय अपनी मेडिकल जानकारी पूरी और सही देना बेहद जरूरी है. डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को छुपाने से पॉलिसी तो मिल सकती है, लेकिन क्लेम के वक्त कंपनी उसे खारिज कर सकती है. गलत या अधूरी जानकारी देना बीमा नियमों के खिलाफ माना जाता है.
कवर कम लगे तो सुपर टॉप-अप का सहारा लें
इलाज के बढ़ते खर्चों को देखते हुए कई बार मौजूदा इंश्योरेंस कवर पर्याप्त नहीं लगता. ऐसे में सुपर टॉप-अप प्लान एक बेहतर विकल्प हो सकता है. यह कम प्रीमियम में अतिरिक्त कवर देता है और उन लोगों के लिए फायदेमंद होता है, जिनके पास पहले से हेल्थ इंश्योरेंस मौजूद है.
बीमारियों के दौर में बढ़े इंश्योरेंस क्लेम
हाल के वर्षों में स्वास्थ्य संकटों के चलते देश में हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम की संख्या तेजी से बढ़ी है. जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार लाखों क्लेम दर्ज किए गए हैं और हजारों करोड़ रुपये की राशि का निपटान हो चुका है. इससे साफ है कि सही हेल्थ इंश्योरेंस मुश्किल वक्त में बड़ी राहत साबित हो सकता है.
कुल मिलाकर, हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय जल्दबाजी न करें. पॉलिसी की शर्तों और कवरेज को अच्छी तरह समझें, ताकि जरूरत पड़ने पर आपका बीमा सही मायनों में काम आ सके.
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