साल 2025 इन नेताओं के लिए रहा बेमिसाल, जानिए कैसे इस साल ने दिलाई इन नेताओं को बड़ी उपलब्धियां

    साल 2025 इन नेताओं के लिए रहा बेमिसाल, जानिए कैसे इस साल ने दिलाई इन नेताओं को बड़ी उपलब्धियां

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK): साल 2025 खत्म होने को है और सभी लोग आने वाले साल का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. ऐसे में इस जाते साल में ना सिर्फ हमारे राज्य बल्कि देश-दुनिया ने कई तरह की चीजें देखी, सुनी और उनकी चर्चा भी खूब हुई. ऐसे में चर्चाओं का दौर राजनीतिक गलियारियों में भी खूब देखने को मिला है. इस बीते एक साल में कई ऐसे राजनेताओं की चमक देश विदेश तक देखने को मिली. यह भी कहना नहीं होगा की यह बीता हुआ साल इन राजनेताओं के लिए काफी शुभ रहा और उनके राजनीतिक करिअर में उन्हें एक शिखर तक भी पहुंचाया है. 

    ऐसे में साल 2025 में अगर राजनीतिक उपलब्धियों का जिक्र होगा तो इन नेताओं की चरकह सबसे पहले होगी. गौर करने वाली बात यह है की इस सूची में झारखंड और बिहार से ही आने वाले कई नेताओं के नाम शामिल है.

    इनकी रही खूब चर्चा 
    नीतीश कुमार : इस साल अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल मीडिया के साथ-साथ अगर लोगों की ज़बान पर किसी नेता की चर्चा सबसे ज्यादा रही है तो वह है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. नीतीश कुमार साल 2025 में रिकॉर्ड दसवीं बार शपथ ली है, जो बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उनका दसवां कार्यकाल है. बिहार वधानसभा चुनावों में प्रचंड जीत के अलावा भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिलाओं के रोजगार को बढ़ावा देने हेतु ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ का शुभारंभ किया, जिसके तहत महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये की राशि भेजी गई. 

    हेमंत सोरेन : साल 2025 में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की खूब चर्चा रही है. उनके साथ-साथ यह साल झारखंड वासियों लिए काफी अहम रहा. वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सबसे ज्यादा चर्चा, ‘मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना से बटोरी. इस योजना के तहत राज्य की महिलाओं को आर्थिक सहायता के रूप में 2,500 रुपये दिए जाते हैं. उसके बाद दिशोंम गुरु शिबू सोरेन के निधन के समय भी मुख्यमनतरी हेमंत सोरेन को बड़ा झटका लगा था. वहीं भाजपा और एनडीए से गठबंधन की अटकलों के बीच भी मुख्यमंत्री ने खूब सुर्खियां बटोरी थी. वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कैबिनेट ने साल के अंत में राज्य में पेसा ऐक्ट लागू कर के एक और ऐतिहासिक निर्णय लिया है. 

    नितिन नबीन : नितिन नबीन की नियुक्ति बीजेपी के उस दावे को मजबूत करती है कि पार्टी में एक सामान्य कार्यकर्ता भी शीर्ष पद तक पहुंच सकता है. इस सोच को पहले भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सार्वजनिक रूप से सामने रख चुके हैं. हालांकि नितिन नबीन को पूरी तरह “मामूली कार्यकर्ता” कहना भी सही नहीं होगा, लेकिन वे ऐसे नेता भी नहीं माने जाते थे जिनसे यह उम्मीद की जा रही हो कि वे धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव या अनुराग ठाकुर जैसे वरिष्ठ नेताओं से आगे निकल जाएंगे. बिहार चुनाव के दौरान परिवारवाद की राजनीति पर काफी चर्चा हुई थी. कांग्रेस नेता शशि थरूर ने अपने एक लेख में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव का जिक्र किया था. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही बीजेपी नेताओं को परिवारवाद से दूरी बनाए रखने की हिदायत दे चुके हैं. इन सबके बीच नीतीश कुमार ने भी अपने बेटे निशांत को राजनीति में नहीं उतारा. नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से बीजेपी के भीतर हाईकमान संस्कृति पर भी बहस तेज हुई है. साथ ही यह संदेश भी साफ हुआ है कि पार्टी में अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का ही माना जाता है, और वही आम सहमति का रूप ले लेता है. 

    सीपी राधाकृष्णन : सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना बीजेपी की ओर से विरोधियों को दिया गया एक सशक्त राजनीतिक जवाब माना जा रहा है. जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से अचानक इस्तीफे के बाद विपक्ष ने बीजेपी पर तीखे हमले शुरू कर दिए थे. कई नाम चर्चा में थे, जिनमें बीजेपी के वरिष्ठ नेता और राज्यपाल भी शामिल थे, लेकिन अंततः सीपी राधाकृष्णन को ही सफलता मिली. बीजेपी को ऐसे उम्मीदवार की जरूरत थी जो राजनीतिक दृष्टि से संतुलित और लाभकारी हो. तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष रह चुके सीपी राधाकृष्णन का चयन केवल अनुभव के आधार पर नहीं, बल्कि आने वाले 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भी किया गया है. इस तरह उनकी नियुक्ति से बीजेपी ने दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक रणनीति को और मजबूत करने का संकेत दिया है.

    असदुद्दीन ओवैसी : सांसद असदुद्दीन ओवैसी का नाम अक्सर चर्चाओं में रहता है. वहीं इस साल भी ओवैसी ने खूब पॉपुलैरिटी बटोरी है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल होकर ओवैसी ने मिडल ईस्ट कंट्रीज़ में जाकर देश का प्रतिनधित्व करके काफी चर्चाएँ बटोरी थी. भले ही देश में वह विपक्ष के तौर पर अपनी भूमिका निभाते हुए NDA गठबंधन पर कटाक्ष कसते हुए नजर आते हों, पर विश्व पटल पर उन्होंने भारतीय एकता और संप्रभुता का उदाहरण पेश किया है.


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