हरिकिशन गिरि गोस्वामी की कहानी: जिनकी देशभक्ति से लबरेज़ फिल्मों के कारण लोग कहने लगे उन्हें भारत कुमार

    हरिकिशन गिरि गोस्वामी की कहानी: जिनकी देशभक्ति से लबरेज़ फिल्मों के कारण लोग कहने लगे उन्हें भारत कुमार

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बात तब की है, जब भारत अखंड था. पाकिस्तान और बांगलदेश भी इसके अंग थे. तारीख थी 24 जुलाई 1937. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अब खैबर पख्तुन्वा) के एक शहर एबटाबाद के जलियाला शेर खान में एक ब्राह्मण परिवार में हरिकिशन गिरि गोस्वामी का जन्म हुआ था. तब ये भारत का हिस्सा हुआ करता था. लेकिन जब हरि की उम्र 10 साल  रही होगी तो देश में बंटवारे की लकीर खींच गई. जिसने हिंदू-मुस्लिम के बीच दरार डाल दी. जिसके हिंसक प्रभाव ने बड़ी आबादी को इधर से उधर विस्थापन के लिए विवश कर दिया. इसका शिकार हरि का परिवार भी हुआ. उजड़-फकड़ कर एचएल. गोस्वामी और कृष्णा कुमारी के परिवार को बच्चों हरि, राजीव और नीलम के साथ दिल्ली आना पड़ गया. उन्हें  विजय नगर, किंग्सवे कैंप में शरणार्थियों के तौर पर रहना पड़ा. कुछ समय के बाद पुराने राजेंद्र नगर इलाके में शिफ्ट हुआ. बच्चे पढ़ने लगे. हरि जब छोटे थे, उस समय से ही उन्हें एक्टर्स को पर्दे पर देखना काफी पसंद था. वो अक्सर दिलीप कुमार, अशोक कुमार और कामिनी कौशल की फिल्में देखा करते थे. हरि ने हिंदू कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया.

    पहली फिल्म और हरि से मनोज का सफ़र

    पढ़ाई के दौरान ही शहीद-ए-आज़म भगत सिंह से उसे दीवानगी की हद तक प्यार हो गया. इसके अलावा उसकी रुचि अभिनय की ओर भी हो गई. तब दिलीप कुमार की तूती बोलती थी. इस नौजवान को उनके जैसे ही अभिनय करने और नाम रखने की धुन सवार हो गई. क्योंकि तब अशोक कुमार और राजेंद्र कुमार जैसे नामों का ही चलन फिल्मों में जोर-शोर से था. 22 अप्रैल 1949 को फिल्म शबनम रिलीज हुई, इसमें दिलीप कुमार के किरदार का नाम मनोज कुमार था. हरि ने तुरंत अपना नाम मनोज कुमार रख लिया. इसके बाद उसके जुनून ने असर दिखाया और उसे एक 1957 में फिल्म ‘फैशन’ मिल गई. इसमें उसे एक 80 वर्षीय बुजुर्ग का रोल निभाना था, वो तैयार हो गया और इस तरह यह उसकी पहली फिल्म हो गई.

    शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के किरदार को जब निभाया

    इसके बाद 1962 में आई फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ ने तो तहलका मचा दिया. इसकी कहानी त्रिकोणीय प्रेम कहानी पर केंद्रित थी. माला सिन्हा के साथ इनकी जोड़ी हिट हो गई. 1964 में उनकी एक और हिट फिल्म ‘वो कौन थी’ आई. साल 1965 में ‘गुमनाम’ और ‘हिमालय की गोद में’ फिल्म सुपर हिट साबित हुई. इसी साल उन्हें एक ऐसी फिल्म में काम करने का मौक़ा मिला, जिसमें उन्हें शहीद भगत सिंह की भूमिका निभानी थी. फिल्म थी-शहीद. इस फिल्म के जरिए उन्होंने लोगों के भीतर देशभक्ति की भावना को जगा दिया था. उन की छवि एक देशभक्त के रूप में स्थापित हो गई. इसके बाद तो देशभक्ति फिल्मों का तांता लग गया.

    उपकार से हो गए भारत कुमार, लाल बहादुर हो गए फैन

    सन 1965 में ही हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ गई. तब देश की अगुवाई प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री कर रहे थे. उन्होंने एक लोकप्रिय नारा भारतवासी को दिया था- “जय जवान जय किसान।”  उनकी हसरत थी कि देशभक्ति से लबरेज़ एक फिल्म उनके नारे पर आधारित बने. मनोज कुमार के जज्बे ने उछाल मारी और उन्होंने उपकार टाइटल से फिल्म बनाने की ठान ली. इसका निर्माण और निर्देशन भी उन्होंने ही किया. 1967 में फिल्म पर्दे पर आ गई और इसने धूम मचा दी. इसमें उनके कैरेक्टर का नाम भारत था. बाद में मनोज कुमार इसी नाम से मशहूर हो गए. उन्होंने इसमें एक सैनिक और एक किसान की भूमिका निभाई थी.  इस फिल्म से उनकी झोली में आया सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार. उनके फैन में लाल बहादुर शास्त्री भी थे.

    देशभक्ति से लबालब उनकी फिल्में

    उपकार के बाद देशभक्ति से लबालब मनोज कुमार की कई फिल्में आईं. जिनमें जय हिंद, रोटी कपड़ा और मकान, शोर, पूरब और पश्चिम और क्रांति जैसी फिल्में शामिल हैं. 1972 में फ़िल्म 'बेईमान' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफेयर तो 1975 में फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के लिए उनको सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार नसीब हुआ. 1995 में उन्होंने अभिनय करना छोड़ दिया. 1995 में प्रदर्शित फिल्म “मैदान-ए-जंग” में आखिरी बार अभिनय किया था. 1999 में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट फ़िल्मफेयर पुरस्कार तो 2016 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किये गए.

    85 वां जन्म दिन मना रहे मनोज कुमार का मलाल

    मनोज कुमार को संगीत सुनना और गाना पसंद हैं. पत्नी शशि गोस्वामी और तीन बच्चे कर्म गोस्वामी, वंश गोस्वामी और मुस्कान गोस्वामी के साथ उनके रिटायरमेंट का दौर बखूबी गुजर रहा है. लेकिन आज अपना 85 वां जन्म दिन मना रहे मनोज कुमार को एक बात का मलाल टीसता जरूर है. वो है फिल्म अभिनेत्री नंदा के एहसान का बोझ. कहानी कुछ इस तरह है कि वो फिल्म शोर के लिए  शर्मिला टैगोर को लेना चाहते थे, लेकिन बात नहीं बन पाई. इसके बाद स्मिता पाटिल ने भी फिल्म के लिए इनकार कर दिया था. तब मनोज कुमार ने पत्नी शशि के कहने पर अभिनेत्री नंदा को फोन किया. नंदा ने एक शर्त रख दी कि फिल्म वह जरूर करेंगी लेकिन एक रुपया नहीं लेंगी.' बीबीसी को दिये एक इंटरव्यू में मनोज बताते हैं, 'किसी के एहसान का बदला आप नहीं चुका सकते लेकिन फिर भी मैंने हर कोशिश की थी कि नंदा जी का एहसान उतार सकूं, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया……' दरअसल 25 मार्च 2014 को  60 और 70 के दशक की मशहूर अभिनेत्री नंदा का निधन हो गया था.


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