झारखंड में अब भी PESA के पेंच में फंसा है बालू और पत्थर! आखिर छोटे कारोबारियों और आम जनता को कब तक मिलेगी राहत

    झारखंड में अब भी PESA के पेंच में फंसा है बालू और पत्थर! आखिर छोटे कारोबारियों और आम जनता को कब तक मिलेगी राहत

    टीएनपी डेस्क  (TNP DESK) : एक तरफ झारखंड में पेसा कानून सरकार ने लागू कर दिया है, लेकिन कई वर्षों से बालू और पत्थर की आपूर्ति बीते प्रशासनिक उलझनों और नीतिगत असमंजस की भेंट चढ़ी हुई है. PESA के प्रावधानों की क्रियान्वयन को लेकर चल रही खींचतान ने राज्य में खनिज आधारित छोटे कारोबार और आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. हालात यह हैं कि घर निर्माण से लेकर सरकारी योजनाओं तक, हर स्तर पर लागत बढ़ रही है, जबकि स्थानीय रोजगार पर भी संकट गहराता जा रहा है.

    PESA का उद्देश्य और जमीनी हकीकत

    PESA कानून का मूल उद्देश्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णय का अधिकार देना है. झारखंड जैसे अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्य में यह कानून आदिवासी हितों की सुरक्षा के लिए बेहद अहम है. लेकिन बालू और पत्थर जैसे लघु खनिजों के मामले में यही कानून अब स्पष्ट नीति के अभाव में सबसे बड़ी बाधा बनता दिख रहा है. कई जिलों में ग्राम सभा की अनुमति, पर्यावरण स्वीकृति, खनन पट्टा और प्रशासनिक आदेश इन सबके बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा. नतीजतन, वैध खनन ठप है और अवैध खनन को लेकर कार्रवाई जोरों पर चल रही है.

    छोटे कारोबारियों पर सबसे ज्यादा मार

    राज्य में हजारों छोटे कारोबारी बालू घाटों और पत्थर क्रशर से जुड़े हैं. वैध नीलामी और पट्टे नहीं मिलने से उनका काम बंद पड़ा है. स्थानीय व्यवसायियों का कहना है कि बड़े ठेकेदार किसी तरह रास्ता निकाल लेते हैं, लेकिन छोटे लोगों के लिए न नियम साफ हैं और न प्रक्रिया आसान. महीनों से कारोबार ठप है. काम बंद होने से ट्रांसपोर्टर, मजदूर और क्रशर कर्मी भी बेरोजगार हो रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में आय के सीमित साधनों के बीच यह संकट और गहरा हो गया है.

    आम जनता पर असर

    • बालू और पत्थर की कमी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है.
    • घर बनाने की लागत बढ़ गई है
    • सरकारी योजनाओं में देरी हो रही है
    • बाजार में अवैध तरीके से बिक रहे महंगे निर्माण सामग्री पर निर्भरता बढ़ रही है

    राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि PESA का सम्मान करते हुए व्यावहारिक समाधान निकालना. जानकारों का कहना है कि अगर ग्राम सभा की भूमिका, खनन की सीमा और पर्यावरणीय शर्तों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, तो वैध खनन फिर से शुरू हो सकता है. इसके लिए जरूरी है कि एक समान और पारदर्शी नीति बनाया जाए. ग्राम सभा को प्रशिक्षित और सशक्त किया जाए.  छोटे कारोबारियों के लिए सरल प्रक्रिया अपनायी जाए.

    आखिर कब मिल सकती है राहत

    यह सवाल आज भी लोगों के मन में है. जब तक सरकार और प्रशासन PESA के प्रावधानों को जमीन पर उतारने के लिए ठोस  कदम नहीं उठाते, तब तक बालू और पत्थर का संकट यूं ही बना रहेगा. झारखंड के लिए यह केवल खनन नीति का सवाल नहीं, बल्कि रोजगार, विकास और जनहित से जुड़ा मुद्दा है. अब देखने वाली बात यह है कि सरकार कब तक इस पेंच को सुलझा पाती है और कब छोटे कारोबारियों व आम जनता को वास्तविक राहत मिलती है.


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