हजारीबाग कांड के बाद फिर तंत्र-मंत्र, डायन बिसाही की चर्चा तेज,जानिए जागरूकता पर सरकार कितना करती है खर्च

    Black Magic देश जहां एक ओर तेजी से आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में आगे बढ़ रहा है, वहीं झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी तंत्र-मंत्र और डायन बिसाही जैसी कुप्रथाएं गहराई से जमी हुई हैं. आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं,

    हजारीबाग कांड के बाद फिर तंत्र-मंत्र, डायन बिसाही की चर्चा तेज,जानिए जागरूकता पर  सरकार कितना करती है खर्च

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK): देश जहां एक ओर तेजी से आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में आगे बढ़ रहा है, वहीं झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी तंत्र-मंत्र और डायन बिसाही जैसी कुप्रथाएं गहराई से जमी हुई हैं. आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जहां महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित किया जाता है, यहां तक कि कई मामलों में उनकी हत्या तक कर दी जाती है. राज्य सरकार इन घटनाओं को रोकने के लिए लगातार जागरूकता अभियान चला रही है और इस पर लाखों रुपये खर्च भी किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद यह कुप्रथा थमने का नाम नहीं ले रही है.

    झारखंड सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 2001 लागू किया है. इस कानून के तहत किसी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित करना दंडनीय अपराध है. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हालात चिंताजनक बने हुए हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के बीतों वर्षों के रिपोर्ट के अनुसार, डायन बिसाही से जुड़े मामलों में झारखंड देश में तीसरे स्थान पर है.

    डायन बिसाही के पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारण होते हैं. इनमें प्रमुख रूप से ईर्ष्या, जमीन हड़पने की साजिश, पारिवारिक विवाद, संतान न होना या विधवा महिलाओं को निशाना बनाना शामिल है. कई मामलों में देखा गया है कि गांव में किसी के बीमार होने पर इलाज के लिए अस्पताल जाने के बजाय लोग तांत्रिक, ओझा या झाड़-फूंक करने वालों के पास पहुंच जाते हैं. उनके कहने पर किसी महिला को डायन घोषित कर हिंसा तक की घटनाएं हो जाती हैं.

    राज्य का महिला एवं समाज कल्याण विभाग इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए कई स्तरों पर काम कर रहा है. विभाग की ओर से दूरदराज के क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने के लिए महिला वॉलंटियर नियुक्त करने की योजना बनाई गई है, जिन्हें हर महिने 2000 मानदेय दिया जाता है उसके बावजूद ऐसी घटनाएँ कम होने का नाम नहीं ले रही है.

    इसके अलावा गांव-गांव में कैंप, नुक्कड़ नाटक, और ऑडियो-वीडियो माध्यमों से जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. साप्ताहिक हाट-बाजारों में भी माइक के जरिए लोगों को अंधविश्वास के खिलाफ जागरूक किया जा रहा है. आंगनबाड़ी सेविकाओं, सहिया कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से पंचायत स्तर तक जागरूकता पहुंचाने की कोशिश की जा रही है. स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में भी बच्चों और महिलाओं को इस विषय पर जानकारी दी जा रही है. वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य सरकार ने सामाजिक जागरूकता और विकास से जुड़ी योजनाओं के लिए 1.45 लाख करोड़ बजट पेश किया गया है 

     


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