पटना (PATNA): बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ सामने आया है. राज्य की सियासत में अचानक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. दो दशक तक सत्ता संभालने वाले नीतीश कुमार अब दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं और राज्य की जिम्मेदारी भाजपा के सम्राट चौधरी को सौंपे जाने की चर्चा है. ऐसे में इस रिपोर्ट में हम सम्राट चौधरी के राजनीतिक सफर पर नजर डालते हैं—कैसे उन्होंने लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक पृष्ठभूमि से शुरुआत कर अब मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय किया.
सबसे पहले उनके राजनीतिक जीवन की बात करें तो सम्राट चौधरी का राजनीति से गहरा जुड़ाव रहा है. उनके पिता सकुनी चौधरी राज्य के दिग्गज नेताओं में गिने जाते थे और लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी माने जाते थे. इसी वजह से सम्राट चौधरी भी अपने पिता को आदर्श मानते हुए छात्र राजनीति में सक्रिय हुए.

धीरे-धीरे उनकी सक्रियता बढ़ती गई और साल 1999 में वह सबसे कम उम्र के मंत्रियों में शामिल हो गए. हालांकि, इसी वजह से वह पहली बार विवादों में भी आए और अंततः राज्यपाल ने उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया. उस समय वह राष्ट्रीय जनता दल की सरकार में कृषि मंत्री बने थे. दिलचस्प बात यह रही कि उस समय उनका विरोध भाजपा ने ही किया था.
इसके बाद भी सम्राट चौधरी कई बार विवादों में रहे. उम्र से जुड़े मुद्दे और एक मुकदमे के कारण उनका नाम बिहार की राजनीति में सुर्खियों में बना रहा. बाद में वह जदयू सरकार में मंत्री बने, लेकिन अंततः पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. भाजपा में शामिल होने के बाद वह पूरी तरह फिट बैठ गए और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

राजनीति में उनका लगातार आगे बढ़ना उनके लंबे अनुभव, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक समीकरणों को समझने की क्षमता को दर्शाता है. तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद सम्राट चौधरी ने खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया.

अब बिहार में एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत होने जा रही है, जिसकी जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को सौंपी जा रही है. उन्हें एनडीए विधायक दल का नेता भी चुना जा चुका है और भाजपा की बैठक में उनके नाम पर सहमति बन चुकी है. माना जा रहा है कि वह जल्द ही बिहार के 23वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे और राज्य के विकास को नई दिशा देंगे.
Thenewspost - Jharkhand
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