मां-बाप की डाट से पहले डरते थे बच्चें, अब बच्चों को डाटने से मां-बाप डरते हैं


टीएनपी डेस्क (TNP DESK): कभी घरों में बच्चों की छोटी-सी गलती पर भी माता-पिता की डांट का डर बच्चों में अनुशासन और जिम्मेदारी का एहसास पैदा करता था. उस डर में सीख भी छिपी होती थी और रिश्तों की मजबूती भी. बच्चे जानते थे कि गलती करने पर उन्हें सजा मिलेगी. लेकिन इसी के साथ उनमें सही और गलत की समझ भी होती थी. माता-पिता की डांट का डर बच्चे को केवल अनुशासन नहीं सिखाता, बल्कि उनके विकास में भी काफी मदद मिलता है.
लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदल गईं. आज स्थिति यह है कि बच्चे बहुत जल्दी स्वतंत्र हो गए हैं. इसके साथ ही माता-पिता के लिए बच्चों को टोकना या डांटना मुश्किल हो गया है. कई परिवारों में देखा जा रहा है कि माता-पिता खुद डरते हैं कि कहीं उनका बच्चा नाराज न हो जाए या कोई गलत कदम न उठा ले.
उत्तर प्रदेश के देवरिया से सामने आया एक मामला इस बदलाव की गवाही देता है. यहां एक पिता ने अपने 11 वर्षीय बेटे को किसी बात पर डांट दिया. इससे नाराज होकर बच्चा सीधे पुलिस थाने पहुंच गया और अपने पिता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की कोशिश करने लगा. जिसेके बाद पिता थाने पहुंचे और बेटे से माफी मांगने की कोशिश की लेकिन बच्चा नहीं माना. उसेक बाद पिता को हाथ जोड़कर घुटने पर बैठ कर बेटे से माफी मांगनी पड़ी. जिसेक बाद बच्चा शांत हुआ.
इसी तरह की एक घटना महाराष्ट्र के अकोला से भी सामने आई. माता-पिता की डांट से नाराज बच्चा शाम को बिना बताए घर छोड़कर चला गया. माता-पिता ने उसे खोजने की कोशिश की, लेकिन न मिलने पर उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने बच्चे को पंढरपुर के सरगम चौक से सुरक्षित बरामद किया और उसके माता-पिता को सौंप दिया.
ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. पहले स्कूलों में सख्ती आम थी. शिक्षक कभी-कभी बच्चों की गलती पर डांटते या मारते भी थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है. अगर कोई शिक्षक बच्चे को मारता है या डाटता है, तो अभिभावक तुरंत स्कूल पहुंचकर शिक्षक से जवाब मांगते हैं
बदलते समय में सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया ने भी बच्चों की सोच पर गहरा प्रभाव डाला है. वे अपने माता-पिता और शिक्षकों से ज्यादा बाहरी दुनिया के नियम को तेजी से सीख रहे हैं. यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों को जल्दी अपनी ओर आकर्षित करते है. कई बार सोशल मीडिया से मिलने वाली गलत जानकारी बच्चें की भ्रमित करती है.
इस बदलाव का दूसरा पहलू यह है कि माता-पिता और बच्चे के बीच बातचीत जरूरत है. केवल डांट या सख्ती से बच्चों को समझाना अब काम नहीं करता. माता-पिता को बच्चों को समझना औऱ उनकी चिंताओं को सुनना और सही मार्गदर्शन देना जरूरी है. डर की जगह समझ और भरोसे की जरूरत अब पहले से कहीं ज्यादा है. बच्चों को आजादी देने के साथ-साथ उन्हें सीमाओं और जिम्मेदारियों का एहसास दिलाना भा जरुरी है.
समय बदल गया है और बदलते समय के साथ बच्चों और माता-पिता के रिश्तों का स्वरूप भी बदल गया है. माता-पिता को डर की बजाय बच्चों को समझने, उनकी भावनाओं का सम्मान करने और सही तरीके से शिक्षा देने पर ध्यान देना होगा. सोशल मीडिया और बाहरी दुनिया के प्रभाव के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा.
रिपोर्ट: वर्षा वर्मा
4+