बगैर सीएम के चेहरे के विधानसभा चुनाव लड़ रही भाजपा, आखिर क्या सोच रही है भगवा पार्टी ?

    बगैर सीएम के चेहरे के विधानसभा चुनाव लड़ रही भाजपा, आखिर क्या सोच रही है भगवा पार्टी ?

    टीएनपी डेस्क(Tnp desk):-राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे हिंदी पट्टी वाले राज्य में भाजपा की टक्कर सीधे-सीधे कांग्रेस से हैं. इसमे शायद ही कोई शक और शौर हो . भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ सभी दल जानते-समझते है कि पांच विधानसभा चुनाव के नतीजे, आगामी लोकसभा चुनाव में बहुत हद तक जनता के मूड भांपने का पैरामीटर साबित होगा.

    बीजेपी की चौकाने वाली रणनीति

    इस बार बीजेपी के लिए सबसे चौकाने वाला फैसला और सोचने वाली बात ये है कि नामचीन चेहरे जिसके बूत चुनावी जीत का दम भरा जाता था. आज भगवा पार्टी उनको किनारा लगाकर पीएम मोदी को चेहरा बनाकर चुनाव लड़ रही है. आखिर पार्टी ऐसा क्यो कर रही है, क्या उन्हें ये डर नहीं सता रहा कि चुनाव में इसका नुकसान होगा. जनाधार वाले नेता को किनारे लगाना कही से भी समझदारी भरा कदम नहीं हैं.  

    राजे,मामा और रमन नदारद

    राजस्थान में मुख्यमंत्री रह चुकी वसुंधरा राजे एक मजबूत लीडर है. उनका जनाधार और जमीनी पकड़ आज भी कायम है. राजे की अगुवाई में भाजपा राज्य की सत्ता हासिल कर चुकी है, और चिर प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को धूल चटा चुकी है. इस बात को सभी बखूबी समझते है, इसके बावजूद सीएम के चेहरे तौर पर वसुंधरा राजे के नाम नहीं है. इधर, मध्यप्रदेश में मामा यानि शिवराज सिंह चौहान क्या हस्ती रखते हैं और क्या उनकी पकड़, पहुंच और पैठ जनता के बीच है. ये शायद ही बताने की ज्यादा जरुरत हो. मध्यप्रदेश बीजेपी का बड़ा चेहरा होने के साथ-साथ अभी भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन है. विडंबना देखिए उम्र की जिस दहलीज पर मामा खड़े हैं. उन्हें इसबार मुख्यमंत्री बनाने का एलान नहीं किया गया. बगैर सीएम फेस के भाजपा मध्यप्रदेश का चुनाव लड़ रही है. ऐसा ही कुछ एमपी से सटे छत्तीसगढ़ में भी दिखता है. सियासत की लंबी समझ रखने वाले अनुभवी रमन सिंह का नाम भी नदारद है. पूर्व मुख्यमंत्री रमन जमीनी पकड़ वाले एक लोकप्रिया नेता है. बावजूद  उनका नाम भी सीएम फेस में नहीं रखा गया है.

    पार्टी के भीतर एक संदेश

    इन तीनों दिग्गज नेताओं को किनारा लगाकर बीजेपी आखिर क्या संदेश देना चाहती है. क्या ये समझ लिया जाए की सियासत में अब इन नेताओं की सांझ हो गयी. क्या बढ़ती उम्र अब आगे इनकी राह में रोड़े बन गया है. क्या नये लोगों के लिए अब दरवाजे खुलने चाहिए. क्या ओल्ड इज गोल्ड का फॉर्मूला अब इस पार्टी में तो कम से कम नहीं चलने वाला है. तमाम तरह के सवाल सभी के मन में उलझन पैदा किए हुए है. जानकार भी मानते है कि भाजपा की इस चाल से नुकसान तो होगा. लेकिन, पार्टी के भीतर ये संदेश जाएगा कि सभी के लिए दरवाजे खुले हुए हैं. पार्टी कभी भी किसी को कुछ भी मौका दे सकती है, एक पारदर्शिता भाजपा में हैं.  

    क्या सोच रही है पार्टी ?

    नामचीन चेहरों को नदारद कर विधानसभा चुनाव लड़ रही बीजेपी की सोच देखी जाए तो काफी दुरगामी है. वो पार्टी को भीतर ही भीतर संगठन को इतना सशक्कत कर देना चाहती है. जिससे कार्यकर्ताओं के मन में न किसी तरह का भटकाव हो और न ही उलझन. दर्री बिछाने से लेकर बैनर-पोस्टर औऱ झंडे ढोने वाले कार्यकर्ता भी पार्टी की विचारधारा को समझे. उसे अहसास हो कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र कितना मजबूत औऱ वजूद रखता है. भारतीय जनता पार्टी की सोच इस बात की भी झलकती है कि, पुराने चेहरे को हटाकर एक नया नेतृत्व पूरे देश में खड़ा हो. उसकी मंशा उन युवाओं को टोटोल कर आगे लाने की है, जिसमे नेतृत्व क्षमता के गुण मौजूद है. पार्टी ये समझती है कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी को राज्यों में एक मजबूत लीडरशीप की जरुरत होगी. जिसके बाद अगले 20 से 25 सालों में इस तरह के नेतृत्व  का कोई संकट ही पैदा न रहे . इसी नजरिए से वो उन युवाओं को तलाश रही है. जो उनकी पार्टी का भविष्य हो. बताया जाता है कि आरएसएस भी इसकी पक्षधर है.

    रिपोर्ट- शिवपूजन सिंह 


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