झारखंड़ का एक ऐसा गांव,जहां घर-घर रहता है जंगल टार्जन..!

    झारखंड़ का एक ऐसा गांव,जहां घर-घर रहता है जंगल टार्जन..!

    पूर्वी सिंहभूम- ना किसी सम्मान की भूख और ना ही कुछ पाने की लालच लिये पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला अनुमंडल के डुमरिया प्रखंड के कालीमाटी गांव में बीते 30 सालों से भी अधिक समय से गांव के लोग जंगल की रक्षा करते आ रहे हैं गांव में ग्राम प्रधान गुमदी हेम्ब्रम के प्रयास  के बाद से जंगल की रक्षा करने की परंपरा चली आ रही है. हर घर से एक लोग जंगल की रक्षा करते हैं। अब तक यह गांव में किसी भी वन अधिकारी ने इस गांव के ग्राम प्रधान समेत ग्रामीणों का हौसला  बढाने के लिये ना ही गांव में कदम रखा है और ना ही किसी तरह का कोई सम्मान दिया है , लेकिन गांव के ग्रामीण बताते हैं कि पर्यावरण बचेगा तो जिन्दगी बचेगी, ये हरियाली वर्षा का स्त्रोत है और पर्यावरण भी शुद्ध रह सके.और इसी के कारण वे अपना काम करते आ रहे हैं. जंगल बचाने का फैसला  बीते तीस साल पहले लिया गया था.

             36 सालों से जंगल की रक्षा करते आ रहे हैं ग्रामीण

    गांव के 75 घरों ने जंगल की रक्षा करने का  लिया है संकल्प 

    कालीमाटी गांव के ग्रामीण जंगल टार्जन बन कर 1986 से जंगल की रक्षा कर रहे हैं  कालीमाटी गांव के कुल पांच टोला में 75 घरों ने जंगल की रक्षा करने का संकल्प लिया है .इसी संकल्प को लेकर गांव के सभी घर से लोगों की पहरेदारी की ड्यूटी पड़ती है. एक दिन में घरों से पांच लोगो को सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक जंगल की पहरेदारी करते हैं. गांव के प्रधान गुईदी हेम्ब्रम ने इसकी शुरूआत की है.

                  पेड़ों की रक्षा के लिए करते है पहरेदारी 


    जंगल के टार्जन,पेड़ काटने वाले गिरोह रखते हैं पैनी नजर

    जंगल  के टार्जन,पेड़ काटने वाले गिरोह पर पैनी नजर रखते है.आशंका होने पर, टार्जन की तरह पेड़ पर चढ़ कर सीटी बजा कर एक दूसरे को इसकी खबर देते हैं.लेकिन आपको जानकर ये हैरानी होगी कि ये एक ऐसी ड्यूटी है जिसमें मजदूरी की कोई कमाई  इन्हें नहीं मिलती है पर्यावरण के महत्व को समझते हुए ये कई सालों से पहरेदारी करते आ रहे  हैं.

                       पेड़ काटने वाले पर नजर रखते है ग्रामीण


     जल जंगल जमीन की रक्षा करने वालों को नहीं मिला सम्मान

    झारखंड़ घाटशिला अनूमंडल के  कालीमाटी गांव  के लोगों की ये पहल, चिपको आन्दोलन की याद दिलाती है  चिपको आंदोलन की ही तरह  यहां के ग्रामीण भी पेड़ों की रक्षा के लिए मुहिम चला रहे हैं,फर्क बस इतना है कि चिपको आंदोलन में किसानों को आंदोलन  का फल सम्मान के रूप में मिला था. लेकिन कालीमाटी गांव के आदिवासी जो जल जंगल जमीन को बचाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं.आज तक इन गांव के लोगों को ना ही वन विभाग ने कभी हौसला बढ़ाने के लिये कोई कदम उठाया है और ना ही सरकार ने नज़रे इनायत की है.

    रिपोर्ट-प्रभंजन कुमार,घाटशिला 


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