International Women's Day : पुुरुषों से नहीं, चाहिए पुरुषवादी सोच से हमें मुक्ति

    International Women's Day  : पुुरुषों से नहीं, चाहिए पुरुषवादी सोच से हमें मुक्ति

    8 मार्च यानि महिला दिवस पर हर साल एक सवाल इसके औचित्य पर उठता है. साथ ही पूछा जाने लगता है कि महिलाएं मुक्ति आखिर किनसे चाहतीं. अपनी शारीरिक-प्राकृतिक विशेषताओं से, पिता, पति, भाई या बेटे से या या दुनिया के तमाम पुरुषों से. एक बार फिर दुनिया की तमाम महिलाओं की तरफ से हम एलान करना चाहते हैं कि हमें न पुरुषों से मुक्ति चाहिए और न परिवार, समाज या देश से. हमारी लड़ाई बस पीढ़ी दर पीढ़ी स्थापित कर दी गई उस पुरुषवादी मनोवृति से है जो महिलाओं को खुद से कमतर समझते हैं. हमारी लड़ाई में भी हमारी जिम्मेदारी छिपी है, क्योंकि हम जानते हैं कि पुरुष कहीं दूसरी दुनिया से आयातित नहीं, बल्कि हमारी ही कोख से आया है. जाहिर है कि जब जन्म हमने दिया है तो उसके परवरिश में हुई भूल चूक की जिम्मेदारी भी हमारी ही है.

    बच्चों का हित सबसे अहम

    हम जानते हैं कि लाख विरोध, लाख संघर्ष के बावजूद स्त्री और पुरुष की लड़ाई दो देश, दो नस्ल, दो जाति, दो दल या दो वर्ग की लड़ाई नहीं. यहां अमीर-गरीब, सवर्ण-दलित, गोरे-काले या सत्ता पक्ष-विपक्ष की तरह इंट्रेस्ट ग्रुप अलग नहीं. स्त्री और पुरुष में हारे जो कोई, प्रभावित दोनों होता है. परिवार और बच्चे पर इसका असर पड़ता है. शायद यही कारण है कि तमाम कानून से वाकिफ रहने के बावजूद महिलाएं कई बार चुप लगा जाती हैं. पर इस चुप्पी की भी वकालत नहीं की जा सकती. आवाज उठानी होगी.

    पर्सनल इज पॉलिटिकल

    अक्सर चावल या दाल पकाते समय हम एक दाना निकाल कर देखते हैं कि यह पका या नहीं. कुछ यही हाल है समाज में महिलाओं की अभिव्यक्ति का. अगर आप, आपके परिवार, पड़ोस या गांव में कोई महिला पीड़ित है तो इसका मतलब है कि और भी कई महिलाएं इस दर्द से गुजर रही हैं. अक्सर हम घर परिवार की इज्जत, समाज क्या कहेगा आदि के नाम पर उफ तक नहीं करते. महिला सशक्तिकरण के लिए काम कर रही महिलाओं ने इस सूत्र की पहचान कर अपने अनुभवों का निचोड़ देते हुए कहा है कि पर्सनल इज पॉलिटिकल. एक के प्रतिरोध में दूसरी कई महिलाओं की तकलीफों का इलाज छिपा है.

    हम पुरुष नहीं बनना चाहते

    महिला दिवस पर एक बार फिर हम चीख कर कहना चाहते कि हम महिला दिवस मनाते है, फेमिनिस्ट हैं, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हम मर्द बनना चाहते. हां, अपवाद में हुई है घटना कभी ब्रा बर्निंग की. पर सच यही है कि हमें अपनी प्राकृतिक संरचना पर गर्व है. जो हमारी शारीरिक-मानिसक संरचना है, हमें बेहद प्रिय है. हमें मातृत्व से मुक्ति नहीं चाहिए, मुक्ति चाहिए पुरुषों की उस सोच से जो हमें जनने की मशीन समझता. मुक्ति चाहिए उस दानवी सोच से जो स्त्रियों के शरीर को बस भोग्या समझता.

    मुक्ति पूर्वाग्रह से

    माया महा ठगनी हम जानी...त्रिया चरित्रं देवम न जानम...जाने कितने पूर्वाग्रह कैसे कैसे पैठ कर रखा है पुरुषों ने पीढ़ियों से. हमें इन पूर्वाग्रहों से मुक्ति चाहिए. जी हां, हम जानते हैं कि दोषी पुरुष नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जो जन्म से मृत्यु तक पुरुषों को एक ही पाठ पढ़ाती है कि महिलाएं उनसे कमतर हैं.  उनके भोग के लिए हैं. घर संभालना और बच्चे जन्म देना ही उनका काम है. नन्हा सा बच्चा रोने लगता है तो आप झट से कहते हैं, ये क्या लड़कियों की तरह रोने लगे. दरअसल दोषी ये बातें हैं जो जाने अनजाने बच्चों के मन में यह बात पैठ करा देती कि लड़कियां कमतर हैं. रोना, सुबकना ही उनकी नियति है.

    डर से मुक्ति

    आज दरकार इस बात की है कि हम काम, गुण या प्रवृति को औरताना और मर्दाना खाना में बांटना बंद कर दें. इस संबंध में वर्षों पहले पढ़ा राष्ट्रीय महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्षा विभा पार्थसारथी का इंटरव्यू मुझे अक्सर याद आ जाता है. उन्होंने लिखा था कि नन्हें बेटे के लिए किताब खरीदने गईं तो देखा कि किताब चाहे हिन्दी में लिखी गई हों या इंग्लिश में, पुरुष ही पुरुष छाए हुए थे. उन्होंने कुछ चित्रों पर पेन चलाते हुए उन्हें स्त्री का रूप दिया. छोटी सी बात, पर गहरे असर वाली. हम शर्माते हैं, अधिक महात्वाकांक्षा नहीं पालते, चूहों-काक्रोच से डरते हैं...दरकार हमारे खुद के इन प्रदर्शनों से मुक्ति की है. हम डरते हैं कि क्रोध, साहस, महत्वाकांक्षा के प्रदर्शन से हमें लेस फेमिनाइन मान लिया जाएगा.

    क्योंकि सफलता के लिए जरूरी है संतुलन

    अक्सर परिवार में यह तर्क भी दिया जाता है कि बच्चों को उनके लिंग के अनुरुप परवरिश नहीं देने पर आगे एडजस्टमेंट में दिक्कत होगी. मनोविज्ञान हमारी इस आशंका को निर्मूल मानता है. मनोविज्ञान स्पष्ट कर चुका है कि सफल और सुव्यवस्थित जीवन के लिए औरतों के गुण यानि स्नेह, ममता, सहनशीलता, उदारता की जितनी दरकार होती है, उतना ही जरूरी होता है साहस, वीरता, क्रोध जैसा पुरुषों का माने जाने वाला गुण. यानि एक अच्छा और सफल व्यक्तित्व वही है जिसमें महिलाओं व पुरुषों, दोनों के गुण संतुलित मात्रा में उपलब्ध हों. मनोविज्ञान ऐसे व्यक्तित्व को एंड्रोजेनस कहता है. भारतीय संस्कृति में इसे ही अर्धनारिश्वर का नाम दिया गया है.

    इस महिला दिवस पर दरकार इस बात की है हम पुरुषवादी सोच से मुक्ति पाएं. काम, गुण और प्रवृति को औरताना मर्दाना खाना में बांटना बंद कर दें. बच्चों को ऐसे संस्कार दें कि वे उसे ही हीन न समझें जो कोख में रख कर देह से सींचित करती हैं.


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