अटल बिहारी वाजपेयी और झारखंड का खास रिश्ता, कैसे उनके कार्यकाल में पूरा हुआ अलग राज्य का सपना?

अटल बिहारी वाजपेयी और झारखंड का खास रिश्ता, कैसे उनके कार्यकाल में पूरा हुआ अलग राज्य का सपना?

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को आज उनकी आठवीं पुण्यतिथि पर याद किया जा रहा है. 16 अगस्त 2018 को उनके निधन के बाद से हर साल यह दिन उनके योगदान को याद करने के लिए मनाया जाता है. अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति का असर देश के कई हिस्सों पर पड़ा, लेकिन झारखंड के साथ उनका रिश्ता कुछ खास रहा. उनके प्रधानमंत्री रहते ही लंबे समय से अलग राज्य की मांग को मंजूरी मिली और 15 नवंबर 2000 को झारखंड देश के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया. ऐसे में झारखंड की कहानी और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विरासत एक-दूसरे से जुड़ जाती है.

अलग झारखंड की मांग की कहानी काफी पुरानी थी

अलग झारखंड राज्य की मांग अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने से कई दशक पहले शुरू हो चुकी थी. आदिवासी पहचान, स्थानीय लोगों के अधिकार, जल-जंगल-जमीन और क्षेत्र के विकास जैसे मुद्दों को लेकर अलग राज्य की आवाज लगातार उठती रही.

समय के साथ इस आंदोलन से कई सामाजिक और राजनीतिक संगठन जुड़े. अलग-अलग दौर में आंदोलन का नेतृत्व भी बदला, लेकिन एक अलग राज्य की मांग लगातार बनी रही. इसलिए झारखंड का गठन किसी एक नेता या पार्टी की कोशिश का नतीजा नहीं था. इसके पीछे लंबे समय तक चले जनआंदोलन और हजारों लोगों के संघर्ष की बड़ी भूमिका थी.

अटल सरकार में तेज हुई राज्य गठन की प्रक्रिया

1990 के दशक में अलग झारखंड की मांग को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा. भारतीय जनता पार्टी ने भी अलग राज्य के गठन का समर्थन किया. 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने छोटे राज्यों के गठन को अपने एजेंडे में शामिल किया.

केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद बिहार के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी. सरकार ने अलग झारखंड राज्य के गठन को लेकर जरूरी कानूनी और संसदीय प्रक्रिया शुरू की.

संसद से पास हुआ बिहार पुनर्गठन विधेयक

झारखंड गठन की दिशा में सबसे अहम कदम बिहार पुनर्गठन विधेयक, 2000 था. लोकसभा ने 2 अगस्त 2000 को इस विधेयक को मंजूरी दी. इसके बाद 11 अगस्त को राज्यसभा ने भी इसे पारित कर दिया.

संसद से मंजूरी मिलने के बाद बिहार के दक्षिणी हिस्से को अलग करके नया राज्य बनाने का रास्ता साफ हो गया. इसके बाद बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत झारखंड के गठन की प्रक्रिया पूरी की गई.

15 नवंबर 2000 को बना देश का 28वां राज्य

15 नवंबर 2000 झारखंड के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. इसी दिन बिहार से अलग होकर झारखंड देश का 28वां राज्य बना. इस तारीख को चुनने के पीछे भी खास वजह थी. 15 नवंबर महान आदिवासी नेता और स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती है.

रांची को झारखंड की राजधानी बनाया गया. लंबे समय से अलग राज्य के लिए चल रहा आंदोलन आखिरकार संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के जरिए अपने मुकाम तक पहुंचा.

झारखंड के लिए क्यों खास हैं अटल बिहारी वाजपेयी

झारखंड के गठन की पूरी कहानी को सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी से जोड़ना सही नहीं होगा. अलग राज्य के लिए लंबे समय तक चले आंदोलन और आम लोगों के संघर्ष की इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका थी. लेकिन इस मांग को साल 2000 में संसद से कानूनी मंजूरी दिलाने की प्रक्रिया में तत्कालीन वाजपेयी सरकार की अहम भूमिका रही.

यही वजह है कि झारखंड में अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विरासत का एक बड़ा हिस्सा राज्य के गठन से जुड़ा माना जाता है. उनके प्रधानमंत्री रहते हुए वह मांग पूरी हुई, जिसके लिए झारखंड के लोग दशकों से संघर्ष कर रहे थे.

अटल की पुण्यतिथि पर फिर याद आया झारखंड का इतिहास

16 अगस्त 2026 को अटल बिहारी वाजपेयी की आठवीं पुण्यतिथि पर देश उन्हें उनके राजनीतिक जीवन और राष्ट्र निर्माण में योगदान के लिए याद कर रहा है. वहीं झारखंड के लिए उनकी विरासत की चर्चा राज्य गठन के संदर्भ में भी होती है.

झारखंड की कहानी एक लंबे जनआंदोलन से शुरू हुई, राजनीतिक समर्थन के कई दौर से गुजरी और आखिरकार संसद की मंजूरी के बाद 15 नवंबर 2000 को एक नए राज्य के रूप में सामने आई. इस पूरी प्रक्रिया में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का महत्वपूर्ण योगदान रहा.

यही वजह है कि झारखंड के इतिहास में 15 नवंबर 2000 सिर्फ राज्य के जन्म की तारीख नहीं है, बल्कि उस लंबे संघर्ष की मंजिल भी है, जिसकी राजनीतिक प्रक्रिया को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अंतिम रूप दिया.