टाइगर जयराम ने दरोगा को क्यों दी गाली? विधायक के समर्थन में बाबूलाल भी मैदान में, जानिए डिटेल्ड रिपोर्ट

धनबाद के बरवाअड्डा थाना विवाद में जयराम महतो और थाना प्रभारी रवि कुमार के बीच कथित वायरल ऑडियो से मामला गरमा गया है. पुलिस संगठनों के अल्टीमेटम के बीच बाबूलाल मरांडी ने भी पुलिस के आचरण पर सवाल उठाए हैं.

टाइगर जयराम ने दरोगा को क्यों दी गाली? विधायक के समर्थन में बाबूलाल भी मैदान में, जानिए डिटेल्ड रिपोर्ट

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): धनबाद का बरवाअड्डा थाना इन दिनों सिर्फ एक थाने का नाम नहीं, बल्कि झारखंड की सियासत और पुलिस व्यवस्था के बीच छिड़ी बहस का नया केंद्र बन गया है. डुमरी विधायक और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) प्रमुख जयराम महतो और थाना प्रभारी रवि कुमार के बीच शुरू हुआ विवाद अब वायरल ऑडियो, गाली-गलौज के आरोप, एफआईआर और पुलिस संगठनों के अल्टीमेटम तक पहुंच चुका है. खास बात यह है कि अब इस मामले में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी की भी एंट्री हो गई है. मरांडी ने सीधे तौर पर पुलिस एसोसिएशन के रवैये और पुलिस अधिकारियों के आचरण पर सवाल उठाए हैं.

आखिर कहां से शुरू हुआ पूरा विवाद?
दरअसल, विवाद की शुरुआत बड़ापिछरी पंचायत की मुखिया यशोदा देवी की शिकायत से हुई. आरोप था कि उनके फर्जी पैड, मुहर और हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर जाति, आवास और वंशावली से जुड़े प्रमाणपत्र तैयार किए जा रहे थे. इस शिकायत के बाद बरवाअड्डा पुलिस ने जेएलकेएम नेता गणेश दास को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की. गणेश दास की हिरासत की जानकारी मिलते ही विधायक जयराम महतो अपने समर्थकों के साथ थाने पहुंच गए. इसके बाद थाना परिसर में पुलिस और विधायक समर्थकों के बीच कहासुनी और हाथापाई की स्थिति बनने का आरोप सामने आया. पुलिस का कहना है कि समर्थकों की भीड़ ने थाना परिसर में हंगामा किया और सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाई. इसी आधार पर जयराम महतो समेत 10 नामजद और 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई.

दूसरी तरफ विधायक पक्ष ने पुलिस पर ही गंभीर आरोप लगाए. जयराम महतो के समर्थकों का दावा है कि थाने में विधायक के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की गई तथा उनका गला दबाने का प्रयास हुआ. समर्थक सुशील मंडल ने भी मारपीट कर सोने की चेन और नकदी छीनने का आरोप लगाया. वहीं, बड़ापिछरी मुखिया के बेटे प्रदीप कुमार रजक ने विधायक पर जातिसूचक टिप्पणी करने और गला दबाने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दी. यानी इस विवाद में दोनों पक्षों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है और पुलिस सभी शिकायतों की जांच कर रही है.

थाना विवाद के बाद 22 अगस्त की रात जयराम महतो और थाना प्रभारी रवि कुमार के बीच हुई कथित व्हाट्सऐप कॉल का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. थाना प्रभारी की शिकायत के मुताबिक, रात करीब 8:09 बजे विधायक ने फोन कर अपने समर्थक के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई. आरोप है कि बातचीत के दौरान जयराम महतो ने थाना प्रभारी के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया. शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि विधायक ने वर्दी उतरवाने और सरकार बदलने के बाद देख लेने जैसी बातें कहीं. इसी शिकायत के आधार पर जयराम महतो के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई.

वायरल ऑडियो को लेकर जयराम महतो ने अलग पक्ष रखा है. विधायक का कहना है कि थाना प्रभारी के साथ उनकी बातचीत करीब 11 मिनट तक हुई थी, लेकिन सोशल मीडिया पर केवल कुछ हिस्से को काटकर वायरल किया गया. उन्होंने ऑडियो में एडिटिंग किए जाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए छेड़छाड़ की आशंका भी जताई है. हालांकि, इस दावे के समर्थन में फिलहाल कोई तकनीकी प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया गया है. जयराम महतो ने पूरे मामले को अपने खिलाफ साजिश बताते हुए थाना परिसर के सीसीटीवी फुटेज और मौके पर मौजूद मीडिया के वीडियो की जांच कराने की मांग की है.

पुलिस एसोसिएशन के अल्टीमेटम के बाद बाबूलाल की एंट्री
वायरल ऑडियो के बाद झारखंड पुलिस एसोसिएशन और पुलिस मेंस एसोसिएशन ने भी मोर्चा खोल दिया. पुलिस संगठनों ने जयराम महतो के कथित व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की. साथ ही माफी नहीं मांगने पर आंदोलन की चेतावनी दी गई. यहीं से मामला एक नए राजनीतिक मोड़ पर पहुंच गया. नेता प्रतिपक्ष और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने पुलिस एसोसिएशन के इस रुख पर सवाल खड़े किए.

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि जनप्रतिनिधि और पुलिस अधिकारी के बीच बातचीत में भाषा की मर्यादा और शिष्टाचार जरूरी है, लेकिन यह नियम सिर्फ एक पक्ष पर लागू नहीं होना चाहिए. उनके मुताबिक, पुलिस अधिकारियों और जवानों पर भी आम नागरिकों और जनप्रतिनिधियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार की उतनी ही जिम्मेदारी है. मरांडी ने सवाल उठाया कि जब पुलिस अधिकारी आम लोगों से कथित तौर पर अभद्र भाषा में बात करते हैं, तब क्या पुलिस एसोसिएशन ने कभी उनके खिलाफ आवाज उठाई है? क्या एसोसिएशन ने कभी अपने अधिकारियों और जवानों को जनता के साथ मर्यादित व्यवहार करने की सलाह दी है? उनका तर्क है कि कानून और अनुशासन के मानक सभी के लिए समान होने चाहिए. अगर किसी जनप्रतिनिधि का गाली देना या अभद्र भाषा का इस्तेमाल गलत है, तो पुलिस अधिकारी के लिए भी जनता के साथ अमर्यादित व्यवहार को सही नहीं ठहराया जा सकता.

बरवाअड्डा विवाद में फिलहाल कई सवालों के जवाब बाकी हैं. थाना परिसर में वास्तव में क्या हुआ? किस पक्ष ने पहले विवाद बढ़ाया? वायरल ऑडियो पूरा और वास्तविक है या उसमें एडिटिंग हुई है? क्या बातचीत को संदर्भ से काटकर पेश किया गया? और दोनों पक्षों की शिकायतों में लगाए गए आरोप कितने सही हैं?