स्मृति विशेष: सुदिव्य ने अपनी रणनीति से JMM को दी थी नई ताकत, आखिर उन्हें क्यों कहा जाता था 'हनुमान'
मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के निधन से JMM ने एक भरोसेमंद और रणनीतिक नेता खो दिया है. हेमंत सोरेन के संकट के दौर से लेकर कल्पना सोरेन के चुनाव और छात्र आंदोलन तक उन्होंने पार्टी में अहम भूमिका निभाई.
टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बीते कल झारखंड ने अपना एक महान नेता खो दिया. मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो चुका है. उनकी अंतिम यात्रा में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, तमाम मंत्री सहित लोगों का एक बड़ा हुजूम देखने को मिला जहां सबकी आँखें नाम दिखी. मंत्री सुदिव्य के जाने से जितनी क्षति उनके परिवार और परिजनों को हुई है, उतनी ही क्षति झारखंड मुक्ति मोर्चा के लिए भी है. यह कहना गलत नहीं होगा की सुदिव्य कुमार के निधन के साथ जेएमएम सिर्फ अपने एक मंत्री और विधायक को नहीं खोया, बल्कि संगठन का एक ऐसा भरोसेमंद चेहरा खो दिया है जो मुश्किल वक्त में बिल्कुल संकटमोचन की तरह खड़े रहे हैं. 56 वर्षीय सुदिव्य कुमार आज भले ही लोगों और पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच नहीं हैं पर उनकी जैसे महत्वता को पार्टी कभी भूल नहीं पाएगी क्योंकि उनकी राजनीतिक उपयोगिता केवल सरकार में मंत्री रहने तक सीमित नहीं थी. पार्टी के भीतर रणनीतिक फैसलों, संगठनात्मक समन्वय और संवेदनशील राजनीतिक परिस्थितियों में उनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण रही.

कैसे JMM के कद्दावर नेता बने सुदिव्य
सुदिव्य कुमार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बेहद भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल थे. दोनों के बीच लंबे समय से मजबूत राजनीतिक और व्यक्तिगत विश्वास का रिश्ता रहा है. यहाँ तक की मुख्यमंत्री खुद सुदिव्य को सोनू भैया कहकर बुलाते थे. ऐसे में जनवरी 2024 का वह समय था जब जमीन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने सीएम हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया था. तब JMM के सामने नेतृत्व और संगठन दोनों स्तरों पर बड़ी चुनौती थी. उस दौर में सुदिव्य कुमार ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने संगठन को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए लगातार सक्रियता दिखाई. यही वजह रही कि पार्टी के कठिन समय में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रहीं.

कल्पना सोरेन के पहले चुनाव में संभाली बड़ी जिम्मेदारी
हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद सुदिव्य कुमार को गांडेय विधानसभा उपचुनाव में झामुमो के चुनाव अभियान की अहम जिम्मेदारी दी गई. यह चुनाव कल्पना सोरेन के राजनीतिक सफर का पहला बड़ा चुनाव था. सुदिव्य कुमार ने चुनाव अभियान समिति की कमान संभाली और पार्टी की रणनीति को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जून 2024 में कल्पना सोरेन की जीत के बाद JMM को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मजबूती मिली और कल्पना सोरेन पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गईं.
सुदिव्य कुमार की राजनीतिक भूमिका झारखंड तक सीमित नहीं रही. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल के साथ सीट बंटवारे को लेकर हुई बातचीत में भी वह JMM की ओर से प्रमुख वार्ताकारों में शामिल थे. पार्टी संगठन और सरकार के बीच समन्वय बनाने में भी उनकी अहम भूमिका थी. चुनावी रणनीति हो, राजनीतिक बातचीत हो या कोई संवेदनशील मुद्दा, पार्टी नेतृत्व उन पर भरोसा करता था.

छात्र आंदोलन में भी बने सरकार का चेहरा
हाल के छात्र आंदोलन के दौरान भी सुदिव्य कुमार की संकट संभालने की क्षमता सामने आई. परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर अभ्यर्थियों के आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक मंत्रिमंडलीय समिति बनाई थी, जिसकी अध्यक्षता सुदिव्य कुमार को सौंपी गई. उन्होंने आंदोलनकारी छात्रों के साथ कई दौर की बातचीत की और सरकार तथा छात्रों के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश की. इस भूमिका ने एक बार फिर साबित किया कि पार्टी और सरकार मुश्किल परिस्थितियों में उन्हें भरोसेमंद चेहरा मानती थी.
सुदिव्य कुमार के परिवार में पत्नी श्वेता शर्मा, दो बेटियां और एक बेटा हैं. उनके आकस्मिक निधन से झामुमो को ऐसा नेता खोना पड़ा है, जो सिर्फ चुनाव जीतने वाला जनप्रतिनिधि नहीं बल्कि संगठन के भीतर संकट के समय जिम्मेदारी उठाने वाले रणनीतिकार भी थे. हेमंत सोरेन के साथ उनका भरोसे का रिश्ता, कल्पना सोरेन के चुनाव अभियान में उनकी भूमिका, बिहार में राजनीतिक बातचीत और छात्र आंदोलन के दौरान संवाद की जिम्मेदारी बताती है कि पार्टी में उनका कद मंत्री पद से कहीं व्यापक था. उनके जाने से JMM के सामने संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर एक बड़ी कमी पैदा हुई है.