एक परीक्षा, दो जांच रिपोर्ट और हजारों युवाओं का भविष्य. आखिर सच क्या है?
रांची. झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती. यह वर्षों की मेहनत, परिवार की उम्मीद और बेहतर भविष्य का रास्ता होती है. लेकिन जब उसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें, जब पेपर लीक के आरोप सामने आएं, जब जांच एजेंसियों की रिपोर्ट एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत नजर आएं और फिर पैसे लेकर सवाल-जवाब उपलब्ध कराने के आरोप सामने आ जाएं, तो सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं रहता. सवाल पूरी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है.
झारखंड का JSSC-CGL 2024 विवाद अब इसी मोड़ पर पहुंच चुका है. एक तरफ मार्च 2025 की सामने आई CID जांच रिपोर्ट में 150 में से करीब 120 सवालों के लीक होने का दावा सामने आया. दूसरी तरफ बाद की SIT जांच ने संगठित पेपर लीक के आरोपों को स्वीकार नहीं किया. दिसंबर 2025 में झारखंड हाई कोर्ट ने SIT की जांच जारी रखते हुए JSSC को परिणाम प्रकाशित करने और सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आगे की जांच में कोई चयनित अभ्यर्थी गड़बड़ी में शामिल पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. लेकिन 2026 में कहानी ने फिर करवट ली. JPSC-JSSC परीक्षा विवाद की जांच के दौरान TDPL के पूर्व मार्केटिंग मैनेजर अभय तिवारी से पूछताछ में कथित तौर पर JSSC-CGL 2024 के पेपर लीक और अभ्यर्थियों से पैसे लिए जाने के नए आरोप सामने आए. रिपोर्टों के मुताबिक 15 अभ्यर्थियों से 12-12 लाख रुपये लेने और परीक्षा से पहले 65 सवाल-जवाब उपलब्ध कराने का दावा किया गया. हालांकि यह बेहद महत्वपूर्ण बात है कि ये दावे फिलहाल जांच के दौरान सामने आए कथित बयान हैं और जांच एजेंसी ने इन्हें अंतिम रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में सार्वजनिक नहीं किया है. यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है.
अगर पहली CID रिपोर्ट सही थी तो दूसरी जांच ने क्या बदला. और अगर दूसरी जांच सही थी तो पहली जांच में 120 सवालों के लीक होने का दावा किस आधार पर सामने आया.
यही सवाल आज झारखंड के हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य और पूरी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता के केंद्र में है.

2024 से शुरू हुआ विवाद
JSSC-CGL परीक्षा का विवाद 2024 में उस समय गंभीर हुआ जब परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितता के आरोप सामने आए. इसके बाद दोबारा परीक्षा आयोजित की गई. 21 और 22 सितंबर 2024 को आयोजित परीक्षा के दौरान प्रशासन ने इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध जैसे कदम भी उठाए ताकि प्रश्नपत्र लीक या उत्तरों के प्रसार को रोका जा सके.
लेकिन अभ्यर्थियों की शिकायतें यहीं खत्म नहीं हुईं.
आरोप सामने आए कि परीक्षा शुरू होने से पहले कुछ अभ्यर्थियों तक उत्तर पहुंच गए थे. इंटरनेट बंद होने के बावजूद कथित तौर पर दूसरे माध्यमों से उत्तर उपलब्ध कराए गए. एक अभ्यर्थी जीत कुमार की ओर से अदालत में ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आई जिसमें परीक्षा शुरू होने से पहले उत्तर उपलब्ध होने का दावा किया गया. NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक एक तस्वीर पर 22 सितंबर 2024 की सुबह 7 बजकर 23 मिनट का टाइमस्टैम्प भी था और लोकेशन जमशेदपुर के बिशनपुर से जुड़ी बताई गई. यहीं से मामला केवल छात्रों की शिकायत से निकलकर जांच एजेंसी के सामने पहुंचा.

पहली CID जांच ने क्या कहा था
मामले की जांच CID को सौंपी गई. मार्च 2025 में तैयार की गई पहली जांच रिपोर्ट को लेकर 2026 में सामने आई रिपोर्टों ने पूरे विवाद को फिर से जिंदा कर दिया. NDTV और द वीक की रिपोर्टों के मुताबिक पहली CID जांच में दावा किया गया कि 150 में से लगभग 120 सवालों के जवाब परीक्षा से पहले उपलब्ध हो गए थे. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परीक्षा के करीब 80 प्रतिशत प्रश्न परीक्षा से कुछ घंटे पहले तैयार किए गए थे और कथित तौर पर उत्तर WhatsApp समेत दूसरे माध्यमों से प्रसारित किए गए. अगर यह दावा सही है तो यह सामान्य परीक्षा अनियमितता नहीं बल्कि भर्ती प्रक्रिया की बुनियादी सुरक्षा को तोड़ने वाला मामला है.
क्योंकि प्रश्नपत्र के सुरक्षित रहने की पूरी व्यवस्था का उद्देश्य यही होता है कि परीक्षा केंद्र में प्रश्न खुलने से पहले किसी अभ्यर्थी को उसके बारे में जानकारी न मिले. लेकिन यदि परीक्षा से पहले ही उत्तर उपलब्ध करा दिए गए हों तो मेहनत करने वाले लाखों छात्रों और पहले से जानकारी रखने वाले कुछ अभ्यर्थियों के बीच मुकाबला बराबरी का नहीं रह जाता.यही वजह है कि पहली CID रिपोर्ट का सामने आना इतना महत्वपूर्ण है.
फिर आई दूसरी जांच और कहानी बदल गई
पहली जांच के बाद मामला वहीं नहीं रुका. सरकार ने दूसरी जांच व्यवस्था यानी SIT के जरिए मामले को आगे बढ़ाया. इसी दूसरी जांच के निष्कर्षों को लेकर विवाद और गहरा गया. जहां पहली रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर लीक की बात सामने आई थी, वहीं दूसरी जांच में संगठित प्रश्नपत्र लीक को उसी तरह स्वीकार नहीं किया गया. इसके बाद परीक्षा के परिणाम और नियुक्तियों का रास्ता खुला. दिसंबर 2025 में झारखंड हाई कोर्ट ने JSSC-CGL का परिणाम प्रकाशित करने और सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति का निर्देश दिया. साथ ही SIT को जांच जारी रखते हुए छह महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया. अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच में कोई चयनित अभ्यर्थी गड़बड़ी में शामिल पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. यानी अदालत ने केवल एक रिपोर्ट के आधार पर मामला खत्म नहीं किया था. जांच जारी रखने का रास्ता खुला रखा गया था. यही तथ्य इस पूरे विवाद को समझने में बेहद महत्वपूर्ण है.

असली सवाल. दो जांचों में इतना अंतर क्यों?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक ही परीक्षा को लेकर दो अलग-अलग जांचों में इतनी बड़ी दूरी कैसे पैदा हुई.
पहली जांच कहती है कि 150 में से करीब 120 सवालों के जवाब लीक हुए.
दूसरी जांच संगठित पेपर लीक की उसी तस्वीर को स्वीकार नहीं करती.
अगर पहली जांच में जुटाए गए WhatsApp चैट, तस्वीरें, बयान और अन्य साक्ष्य विश्वसनीय थे तो दूसरी जांच में उनका मूल्यांकन कैसे हुआ.
अगर पहली जांच के निष्कर्ष गलत थे तो क्या जांच अधिकारियों से जवाबदेही तय हुई.
और अगर दोनों जांचों में कुछ साक्ष्य सही और कुछ गलत थे तो जनता के सामने पूरी जांच सामग्री क्यों नहीं रखी गई.
यही वह जगह है जहां छात्रों का भरोसा टूटता है.
एक अभ्यर्थी के लिए यह समझना मुश्किल है कि वह किस रिपोर्ट पर विश्वास करे. सरकार किस रिपोर्ट को सही मानती है. जांच एजेंसी की अंतिम स्थिति क्या है. अदालत ने किस सामग्री के आधार पर परिणाम जारी करने की अनुमति दी. और बाद में सामने आए नए आरोप पुराने निष्कर्षों को कितना प्रभावित करते हैं. इन सवालों का जवाब केवल राजनीतिक बयान से नहीं मिल सकता. इसके लिए दस्तावेजी और स्वतंत्र जांच की जरूरत है.
2026 में अभय तिवारी के कथित बयान से फिर उठा तूफान
2026 में JPSC-JSSC परीक्षा विवाद की जांच के दौरान अभय तिवारी का नाम सामने आया. तिवारी TDPL के पूर्व मार्केटिंग मैनेजर बताए गए हैं. JPSC मेधा घोटाला मामले में उनकी गिरफ्तारी के बाद CID पूछताछ में JSSC-CGL से जुड़ी कथित जानकारी सामने आने की रिपोर्ट प्रकाशित हुई. रिपोर्टों के अनुसार तिवारी ने कथित तौर पर बताया कि सितंबर 2024 की JSSC-CGL परीक्षा में भी प्रश्न और उत्तर पहले उपलब्ध कराए गए थे. बोकारो में करीब 15 अभ्यर्थियों को परीक्षा से पहले 65 सवाल-जवाब रटवाने और प्रत्येक अभ्यर्थी से 12 लाख रुपये लेने का दावा किया गया. इस हिसाब से कुल रकम करीब 1.80 करोड़ रुपये बैठती है. यह दावा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे उस सवाल को फिर सामने लाता है जिसे 2025 की जांच के बाद लगभग खत्म मान लिया गया था. लेकिन यहां पत्रकारिता की एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है.
अभय तिवारी का कथित बयान अपने आप में अंतिम न्यायिक प्रमाण नहीं है.
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि, पैसों के लेन-देन का ट्रेल, अभ्यर्थियों के बयान, डिजिटल साक्ष्य, परीक्षा एजेंसियों की भूमिका और प्रश्नपत्र की सुरक्षा से जुड़े रिकॉर्ड की जांच जरूरी है. एक आरोपी या संदिग्ध का बयान जांच की दिशा तय कर सकता है, लेकिन दोष सिद्ध करने के लिए अदालत के सामने पर्याप्त साक्ष्य जरूरी होंगे. उपलब्ध रिपोर्टों में भी यह उल्लेख है कि CID इन दावों की जांच कर रही है और आरोपों की अंतिम पुष्टि अभी नहीं हुई है.
12 लाख में 65 सवाल. अगर आरोप सही निकले तो मामला कितना बड़ा है?
मान लीजिए जांच में 15 अभ्यर्थियों से 12-12 लाख रुपये लेने का आरोप सही साबित होता है. तब कुल रकम करीब 1.80 करोड़ रुपये होती है.लेकिन असली सवाल रकम का नहीं है.असली सवाल यह है कि यदि किसी संगठित नेटवर्क ने परीक्षा से पहले सवाल-जवाब उपलब्ध कराने के बदले पैसा लिया तो उस नेटवर्क की पहुंच कहां तक थी.
- किसने प्रश्न तैयार किया.
- किसने प्रश्नपत्र प्रिंट कराया.
- प्रिंटिंग के बाद प्रश्नपत्र की सुरक्षा किसके जिम्मे थी.
- किस स्तर पर प्रश्नपत्र की कॉपी बनी.
- किसने उसे बाहर पहुंचाया.
- किसने अभ्यर्थियों को चुना.
- किसने पैसा लिया.
- पैसे का भुगतान किस माध्यम से हुआ.
- क्या बैंक ट्रांजैक्शन हुए.
- क्या नकद भुगतान हुआ.
- क्या मोबाइल फोन, WhatsApp चैट या कॉल रिकॉर्ड उपलब्ध हैं.
- क्या परीक्षा के बाद उन अभ्यर्थियों के प्रदर्शन में असामान्य पैटर्न दिखा.
इन सभी सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि मामला वास्तव में पेपर लीक का संगठित नेटवर्क था या फिर कुछ लोगों की ओर से किया गया दावा.
क्या यह सिर्फ JSSC-CGL तक सीमित है?
2026 में सरकार के सामने यही सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल है. सरकार ने अगस्त 2026 में छात्र आंदोलन के बाद JSSC-CGL 2024 परीक्षा को रद्द करने के साथ TDPL द्वारा कराई गई परीक्षाओं को भी जांच के दायरे में लाने का निर्णय लिया. रिपोर्टों के मुताबिक 2014 से TDPL से जुड़ी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं की व्यापक जांच का फैसला किया गया. इस फैसले का असर केवल एक परीक्षा पर नहीं पड़ा. रिपोर्टों के मुताबिक JSSC-CGL में चयनित करीब 1,975 अभ्यर्थियों की नौकरियां प्रभावित होने की स्थिति बनी. कई चयनित अभ्यर्थियों ने नियुक्ति के आधार पर अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसले लिए थे. ऐसे में पूरी भर्ती प्रक्रिया पर दोबारा सवाल उठना उनके लिए बेहद गंभीर संकट है. यहां एक बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत लागू होना चाहिए.
दोषी को सजा मिले, लेकिन निर्दोष को सामूहिक सजा नहीं मिलनी चाहिए.
अगर किसी चयनित अभ्यर्थी की भूमिका पेपर लीक में साबित होती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन यदि किसी अभ्यर्थी की कोई भूमिका नहीं थी और उसने सामान्य प्रक्रिया के तहत परीक्षा दी तथा चयन हासिल किया, तो केवल पूरी प्रक्रिया पर संदेह होने के आधार पर उसका भविष्य खत्म करना न्यायसंगत नहीं होगा.

छात्रों का भरोसा आखिर क्यों टूटा?
छात्रों का गुस्सा केवल परीक्षा रद्द होने को लेकर नहीं है. उनका गुस्सा उस अनिश्चितता को लेकर है जो लगातार बदलती जांच और फैसलों से पैदा हुई है. एक युवा तीन या चार साल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है. कोचिंग, किताब, किराया, यात्रा और आवेदन में परिवार का पैसा खर्च होता है. कई युवा दूसरी नौकरियां छोड़कर सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं. फिर परीक्षा होती है.
- पेपर लीक का आरोप लगता है.
- जांच शुरू होती है.
- एक रिपोर्ट आती है.
- दूसरी रिपोर्ट अलग निष्कर्ष देती है.
- परिणाम जारी होता है.
- नियुक्ति होती है.
और फिर दो साल बाद पूरी प्रक्रिया दोबारा सवालों में आ जाती है. ऐसे में छात्र के मन में एक सवाल स्वाभाविक है. क्या मेहनत से ज्यादा जरूरी सिस्टम में पहुंच और पैसे हैं. यही धारणा किसी भी भर्ती व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक है.
CBI जांच क्या समाधान है?
छात्रों और विपक्ष के एक हिस्से की मांग है कि मामले की जांच किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए. CBI जांच की मांग का आधार यही है कि राज्य सरकार की अपनी एजेंसी पर राजनीतिक दबाव का संदेह बना रह सकता है. लेकिन दूसरी तरफ यह तर्क भी दिया जा सकता है कि केवल जांच एजेंसी बदल देने से न्याय की गारंटी नहीं मिलती.
CBI के पुराने मामलों में भी लंबी जांच और मुकदमों का इतिहास है. इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि जांच CID करे या CBI. सवाल यह होना चाहिए कि जांच कितनी स्वतंत्र, कितनी पारदर्शी और कितनी समयबद्ध है. यदि CBI को जांच दी जाती है तो समयसीमा तय हो. यदि SIT जांच करती है तो उसकी पूरी रिपोर्ट अदालत के सामने रखी जाए. और यदि मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील है तो विधानसभा की सर्वदलीय समिति या न्यायिक आयोग जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है.

थर्ड पार्टी जांच की मांग क्यों महत्वपूर्ण है?
भर्ती घोटाले जैसे मामलों में जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होता है. अगर जांच करने वाली संस्था पर ही सवाल उठ जाएं तो जांच के निष्कर्ष चाहे सही हों, उनके प्रति भरोसा कमजोर रह सकता है. इसीलिए थर्ड पार्टी निगरानी की मांग को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उसके संस्थागत विकल्प पर चर्चा होनी चाहिए.एक सेवानिवृत्त हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग. सत्ता और विपक्ष के प्रतिनिधियों वाली विधानसभा समिति.
- फॉरेंसिक विशेषज्ञ.
- साइबर विशेषज्ञ.
- परीक्षा सुरक्षा विशेषज्ञ.
- और छात्र प्रतिनिधि.
इन सभी को मिलाकर एक निगरानी तंत्र बनाया जा सकता है. इसका उद्देश्य किसी सरकार या किसी एजेंसी को कटघरे में खड़ा करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि जांच का निष्कर्ष राजनीतिक सुविधा के हिसाब से न बदले.
बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों का मुद्दा
भर्ती विवाद में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और नेपाल तक से जुड़े नेटवर्क के आरोप और चर्चाएं सामने आई हैं. हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में नेपाल ले जाए गए कुछ अभ्यर्थियों से जुड़ी जांच का भी उल्लेख है. अदालत ने 28 ऐसे अभ्यर्थियों में से 10 के परिणाम को जांच पूरी होने तक अलग रखने का निर्देश दिया था. इससे यह सवाल जरूर उठता है कि यदि पेपर लीक या प्रश्न-जवाब उपलब्ध कराने का कोई नेटवर्क था तो उसकी पहुंच कितनी व्यापक थी. लेकिन केवल किसी अभ्यर्थी का दूसरे राज्य से होना उसे दोषी नहीं बनाता. यह distinction बेहद जरूरी है. बाहरी राज्य का अभ्यर्थी होना अपराध नहीं है. अपराध तब होगा जब किसी अभ्यर्थी ने अवैध तरीके से प्रश्नपत्र या उत्तर हासिल किए हों या किसी नेटवर्क का हिस्सा रहा हो. इसलिए जांच में राज्यवार सूची बनाने से ज्यादा जरूरी है कि साक्ष्य आधारित कार्रवाई हो.
अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सरकार ने JSSC-CGL सहित TDPL से जुड़ी परीक्षाओं पर कार्रवाई कर दी है. लेकिन परीक्षा रद्द करना समस्या का अंतिम समाधान नहीं है.
अब चार सवाल सबसे महत्वपूर्ण हैं -
- पहला. नए सिरे से परीक्षा कब होगी.
- दूसरा. पुराने चयनित अभ्यर्थियों के साथ क्या होगा.
- तीसरा. जांच कब पूरी होगी.
- चौथा. भविष्य में पेपर लीक रोकने की गारंटी क्या होगी.
अगर इन चार सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता तो आंदोलन और अविश्वास दोनों बने रहेंगे. छात्रों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि जांच चल रही है. उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि जांच की समयसीमा क्या है. कौन अधिकारी जांच कर रहे हैं. कौन से साक्ष्य की फॉरेंसिक जांच हुई. कितने लोगों से पूछताछ हुई. कितने डिजिटल उपकरण जब्त हुए.कितने वित्तीय लेन-देन की जांच हुई.
और किन लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया.
परीक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की जरूरत
- झारखंड की भर्ती व्यवस्था को केवल नए प्रश्नपत्र से नहीं बल्कि नए सिस्टम से सुधारना होगा.
- प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और एन्क्रिप्टेड किया जाना चाहिए.
- प्रश्नपत्र के हर चरण का डिजिटल लॉग होना चाहिए.
- किस अधिकारी ने प्रश्न देखा.
- किस प्रिंटिंग प्रेस ने प्रिंट किया.
- कितनी प्रतियां छपीं.
- कहां भेजी गईं.
- किस वाहन से भेजी गईं.
- किस अधिकारी ने प्राप्त किया.
- किस स्ट्रॉन्ग रूम में रखा गया.
- हर चरण का रिकॉर्ड सुरक्षित होना चाहिए.
- प्रश्नपत्र खोलने की प्रक्रिया भी CCTV और डिजिटल ऑडिट के तहत होनी चाहिए.
- परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक उपस्थिति हो.
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी का उपयोग किया जा सकता है.
- लेकिन तकनीक के साथ मानव जवाबदेही भी जरूरी है.
क्योंकि कोई भी तकनीक तभी काम करेगी जब उसके पीछे काम करने वाला सिस्टम ईमानदार और जवाबदेह हो.
पेपर लीक को आर्थिक अपराध की तरह देखना होगा
आज पेपर लीक सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की समस्या नहीं है. यह एक बड़ा आर्थिक अपराध भी बन चुका है. एक सरकारी नौकरी के लिए लाखों रुपये देने को तैयार नेटवर्क का मतलब है कि इसमें बड़ी रकम घूम रही है. इसलिए जांच केवल प्रश्नपत्र तक सीमित नहीं होनी चाहिए.
- मनी ट्रेल की जांच होनी चाहिए.
- बैंक खाते जांचे जाएं.
- संपत्तियों की जांच हो.
- फोन रिकॉर्ड और डिजिटल चैट की फॉरेंसिक जांच हो.
यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ आपराधिक कार्रवाई भी हो.और यदि कोई अभ्यर्थी पैसे देकर चयन हासिल करता है तो उसके खिलाफ भी समान रूप से कार्रवाई हो.लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भी जरूरी है.
जिस अभ्यर्थी ने पैसे नहीं दिए, जिसने किसी लीक सामग्री का लाभ नहीं उठाया और जिसकी भूमिका किसी अपराध में नहीं मिली, उसे केवल संदेह के आधार पर दोषी न माना जाए.
छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़े तो प्रक्रिया निष्पक्ष हो
- अगर परीक्षा रद्द कर दी गई है तो नए सिरे से परीक्षा कराने की प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए.
- अभ्यर्थियों से अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए.
- उम्र सीमा में उचित राहत दी जानी चाहिए.
- पुराने आवेदन को मान्य रखा जाना चाहिए.
- जो अभ्यर्थी बीच में दूसरी नौकरी में चले गए हैं उन्हें उचित अवसर मिलना चाहिए.
- परीक्षा की तारीख पर्याप्त समय पहले घोषित हो.
- सिलेबस में अचानक बदलाव न हो.
और सबसे जरूरी बात. परीक्षा के दिन तक प्रश्नपत्र की सुरक्षा पर किसी तरह का संदेह न रहे.
दोषियों के साथ-साथ सिस्टम की भी जांच हो
किसी भी भर्ती घोटाले में केवल कुछ व्यक्तियों को गिरफ्तार कर देने से समस्या खत्म नहीं होती.
- यह पता लगाना जरूरी है कि सिस्टम में कौन-कौन से loopholes थे.
- क्या प्रश्नपत्र बनाने की प्रक्रिया सुरक्षित थी.
- क्या प्रिंटिंग एजेंसी का चयन पारदर्शी था.
- क्या परीक्षा संचालन एजेंसी की पर्याप्त जांच हुई थी.
- क्या कर्मचारियों का background verification हुआ था.
- क्या प्रश्नपत्र परिवहन की निगरानी थी.
- क्या CCTV रिकॉर्ड सुरक्षित रखा गया.
- क्या डिजिटल सिस्टम में unauthorized access की जांच हुई.
- और क्या शिकायत मिलने के बाद तत्काल कार्रवाई हुई.
- इन सवालों का जवाब आने वाली परीक्षाओं को सुरक्षित बना सकता है.
यह सिर्फ JSSC की समस्या नहीं
JSSC-CGL विवाद ने एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचा है. सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. एक पद के लिए हजारों अभ्यर्थी आवेदन करते हैं. ऐसे में परीक्षा प्रणाली में छोटी सी भी गड़बड़ी हजारों परिवारों को प्रभावित करती है.इसलिए JSSC और JPSC जैसे संस्थानों को केवल भर्ती आयोग की तरह नहीं बल्कि संवैधानिक भरोसे की संस्था की तरह देखा जाना चाहिए.इन संस्थानों की स्वतंत्रता, वित्तीय पारदर्शिता, तकनीकी क्षमता और नियुक्ति प्रक्रिया को मजबूत करना जरूरी है.
अब सबसे जरूरी है. दोषी और निर्दोष के बीच फर्क
JSSC-CGL 2024 के विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा यही है.
- यदि पेपर लीक हुआ तो दोषियों को सजा मिलनी चाहिए.
- यदि पैसे लेकर प्रश्न दिए गए तो पैसा देने वाले और लेने वाले दोनों की भूमिका की जांच होनी चाहिए.
- यदि अधिकारी शामिल थे तो उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.
- लेकिन जिन अभ्यर्थियों ने मेहनत से परीक्षा दी है, उन्हें सिर्फ इसलिए दोषी नहीं माना जा सकता क्योंकि परीक्षा प्रक्रिया में किसी और ने अपराध किया. यही न्याय का मूल सिद्धांत है.
व्यवस्था की गलती का बोझ निर्दोष अभ्यर्थी पर नहीं डाला जा सकता.

निष्कर्ष. सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, भरोसे का है
झारखंड भर्ती घोटाले की कहानी अब केवल JSSC-CGL 2024 की कहानी नहीं रह गई है. यह उस भरोसे की कहानी है जो एक छात्र अपने राज्य की भर्ती व्यवस्था पर करता है. एक तरफ पहली CID रिपोर्ट में 150 में से 120 सवालों के कथित लीक का दावा सामने आया. दूसरी तरफ बाद की SIT जांच ने संगठित लीक की तस्वीर को स्वीकार नहीं किया. फिर दिसंबर 2025 में हाई कोर्ट ने परिणाम और नियुक्ति का रास्ता खोला, साथ ही SIT जांच जारी रखने का निर्देश दिया. और अब 2026 में अभय तिवारी से पूछताछ के दौरान 15 अभ्यर्थियों से कथित तौर पर 12-12 लाख रुपये लेने और 65 सवाल-जवाब पहले उपलब्ध कराने का दावा सामने आया है. इन आरोपों की स्वतंत्र और न्यायिक रूप से स्वीकार्य पुष्टि अभी बाकी है.
- यही वजह है कि अब केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा.
- झारखंड सरकार को जांच की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी करनी होगी.
- विपक्ष को भी राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर संस्थागत सुधार का रोडमैप देना होगा.
- जांच एजेंसियों को भी अपनी रिपोर्ट के आधार और साक्ष्य सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराने होंगे.
- और अदालतों की निगरानी में यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच अनिश्चितकाल तक न चले.
सरकार ने 2026 में JSSC-CGL और TDPL से जुड़ी परीक्षाओं पर बड़ा फैसला लिया है. अब अगला कदम उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है. नई परीक्षा सुरक्षित हो. निर्दोष अभ्यर्थियों का भविष्य सुरक्षित हो. दोषियों की पहचान हो. और भर्ती प्रक्रिया में ऐसी व्यवस्था बने जिसमें किसी को लाखों रुपये देकर नौकरी खरीदने का रास्ता ही न मिले. क्योंकि अंत में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसने पेपर लीक किया. सवाल यह है कि क्या झारखंड का एक सामान्य छात्र बिना पैसे, बिना सिफारिश और बिना किसी नेटवर्क के सिर्फ अपनी मेहनत के दम पर सरकारी नौकरी हासिल कर सकता है. अगर इस सवाल का जवाब हां में देना है तो भर्ती व्यवस्था को केवल बदलना नहीं होगा. उसे पूरी तरह भरोसेमंद बनाना होगा.
झारखंड के युवा नौकरी के साथ न्याय मांग रहे हैं. और इस न्याय की पहली शर्त है. सच सामने आए. दोषी बचे नहीं. निर्दोष फंसे नहीं. और अगली परीक्षा में किसी छात्र को यह डर न रहे कि उसकी मेहनत से ज्यादा किसी और की पहुंच मायने रखती है.