कोयलांचल के अपराध का इतिहास: फ़िल्मी स्टाइल में कैसे करा दी गई सकलदेव सिंह की हत्या, पढ़िए

    कोयलांचल के अपराध का इतिहास: फ़िल्मी स्टाइल में कैसे करा दी गई सकलदेव सिंह की हत्या, पढ़िए

    धनबाद (DHANBAD): कोयलांचल में कोयला उद्योग का इतिहास जितना पुराना है, उतनी ही गहरी है यहां अपराध की जड़ें ,कालखंड के अनुसार अपराध के तौर-तरीके बदलते रहे. साथ ही साथ चेहरे भी बदलते रहे. 1950 के आसपास धनबाद कोयलांचल में शुरू हुई माफियागिरी आज भी जारी है. तरीका जरूर बदल गया है, लोग बदल गए हैं, चेहरे बदल गए हैं. दरअसल कोलियरियों पर कब्जा को लेकर आपसी लड़ाई खूब चली. सूर्यदेव सिंह और सत्यदेव सिंह के बीच टकराहट होती रही, इसी बीच तीसरी शक्ति के रूप में सकलदेव सिंह भी उभरे. अब टकराहट तीन गुटों में होने लगी थी.  

    अब तीसरी शक्ति के रूप में उभर चुके थे सकलदेव सिंह 

    सकलदेव सिंह तीसरी ताकत के रूप में उभर चुके थे. लोग बताते हैं कि वह सूर्यदेव सिंह को किसी न किसी प्रकार कमजोर करने की कोशिश करने लगे थे. इसी क्रम में सूर्यदेव सिंह के साथ रहने वाले रघुनाथ सिंह को सकलदेव सिंह ने अपने पाले में कर लिया।  लोग बताते हैं कि रघुनाथ सिंह का निशाना अचूक था. धवनि सुनकर भी उनकी पिस्टल से चली गोलियां लक्ष्य को भेंद  देती थी. रघुनाथ सिंह का साथ छोड़ना सूर्यदेव सिंह को अच्छा नहीं लगा था. बुजुर्ग बताते हैं कि एक रात तो धनबाद के सिजुआ  स्थित सकलदेव सिंह के आवास पर हमला भी हुआ था. जहां सोए हालत में रघुनाथ सिंह  बच गए थे. रघुनाथ सिंह की चर्चा कई मामलों में होती रही. कतरास के कार्यक्रम में किसी बात को लेकर गोली चल गई थी. 

    कतरास के एक कार्यक्रम में चली थी गोली, खूब हुई थी चर्चा 
     
    यह कार्यक्रम जैसा कि लोग बताते हैं शिव जी के बारात के दृश्य का था. कतरास पुलिस भी वहां मौजूद थी. किसने फायरिंग की, यह तो स्पष्ट नहीं हुआ लेकिन इस फायरिंग में कतरास थाना के एक दरोगा के सिर में गोली लग गई थी. काफी इलाज के बाद उन्हें बचाया जा सका था.  सकलदेव सिंह की ताकत धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी और और मजदूर संगठन की आड़ में वह तीसरी शक्ति बन चुके थे. कतरास में भी हत्याओं का दौर शुरू हो गया था. जानकार बताते हैं कि 28 मई1986 को कतरास के पास कतरी नदी पुल पर कोलियरी  मजदूर संघ के एक पदाधिकारी की हत्या कर दी गई थी. उसके पहले 7 मार्च 1984 को कतरास के विधायक और तत्कालीन मंत्री ओमप्रकाश लाल (अब स्वर्गीय) पर भी गोलियां चलाई गई थी. संयोग से ओमप्रकाश लाल की जान बच गई, गोली उनके दाएं हाथ में लगी थी. यह अलग बात है कि इन हमलों में मार्क्सवादी यूनियन का नाम आया था. 

    सकलदेव सिंह की हत्या 25 जनवरी 1999 को कर दी गई 

    इस समय सकलदेव सिंह की ताकत बढ़ती जा रही थी. सकलदेव सिंह की हत्या 25 जनवरी 1999 को फिल्मी स्टाइल में कर दी गई थी. लोग बताते हैं कि नौरंग देव  सिंह के भोज में हिंसा लेने के लिए धनबाद आ रहे थे कि बाईपास सड़क पर उनके अंगरक्षकों की गाड़ियों को गोलियों के बल पर रोक कर शार्प  शूटर ने उन्हें केवल एक गोली मारी, जो उनके सिर में लगी और जगजीवन नगर स्थित अस्पताल में डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. सकलदेव सिंह के भाई विनोद सिंह की भी15 जुलाई 1998 को हत्या कर दी  गई थी. जानकार बताते हैं कि इसी हत्याकांड में सूर्यदेव सिंह के भाई रामधीर  सिंह अभी आजीवन कारावास की सजा काट रहे है. 

    रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में की जाती थी हत्याएं
     
    लोग बताते हैं कि वह ऐसा दौर था जब हत्याएं रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में की जाती थी. बाहर से शूटर बुलाए जाते थे और वह घटना को अंजाम देने के बाद फिर लापता हो जाते थे. लोग बताते हैं कि उस समय की हत्याओं में शूटर खाली हाथ धनबाद आते थे. उन्हें किसी अलग-अलग स्थान पर ठहराया जाता था. वह हत्या करने के स्थान का चयन करते थे, फिर रेकी करते थे. रेकी करने के बाद हत्या को अंजाम देते थे. हत्या को अंजाम देने के बाद वह अपने भागने का भी तरीका पहले से ही तैयार रखते थे. हथियार भी यही छोड़ देते थे और जिस तरह शरीर लेकर आते, उसी  तरह यहां से चले जाते. उस समय कोलियारियों में अपराधी किस्म के लोग नाम बदलकर नौकरियां भी करते थे. इस वजह से बाहर के अपराधियों को ठिकाना पाने  में भी सहूलियत होती थी.



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