मोबाइल से पहले बच्चों की पहली पसंद थे ये देसी खेल, आज बन गए यादें

  • July 17, 2026 3:25 pm
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एक समय था जब बच्चों के हाथों में मोबाइल नहीं, बल्कि सपने और शरारतें होती थीं. स्कूल की छुट्टी होते ही पूरा गांव, मोहल्ला और हर गली बच्चों की हंसी से गूंज उठती थी. मैदान ही उनका सबसे बड़ा खेल का मैदान होता था, जहां डेगा पानी, आओका पानी, डालो पत्तो, किट-किट, हाथ ताली, चोर-सिपाही, गोली-कंचा, लुका-छिपी और छुआ-छुई जैसे देसी खेल रोज़ खेले जाते थे. इन खेलों में न कोई महंगे खिलौने थे, न इंटरनेट और न ही वीडियो गेम, फिर भी खुशियों की कोई कमी नहीं थी. ये खेल बच्चों को सिर्फ मनोरंजन ही नहीं देते थे, बल्कि दोस्ती, टीमवर्क, फुर्ती, धैर्य, आत्मविश्वास और मिल-जुलकर रहने की सीख भी सिखाते थे. आज समय बदल गया है, लेकिन इन पारंपरिक खेलों की यादें आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं और सुनहरे बचपन की सबसे खूबसूरत निशानी बनकर हमेशा मुस्कुराने की वजह देती हैं

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डेगा पानी गांवों में बच्चों के बीच खेला जाने वाला बेहद लोकप्रिय पारंपरिक खेल था. इसमें दौड़, संतुलन और समझदारी की जरूरत होती थी. बच्चे बिना किसी महंगे खिलौने के घंटों तक इस खेल का आनंद लेते थे. यह खेल शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के साथ दोस्ती, टीमवर्क और आपसी मेल-जोल भी बढ़ाता था. आज यह खेल धीरे-धीरे गांवों से गायब होता जा रहा है, लेकिन इसकी यादें आज भी लोगों के बचपन को ताजा कर देती हैं.

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आओका पानी गांव के बच्चों का एक रोमांचक समूह खेल था, जिसमें सभी खिलाड़ियों को तेजी से अपनी जगह बदलनी होती थी. इसमें फुर्ती, एकाग्रता और सही समय पर फैसला लेने की कला विकसित होती थी. बच्चे घंटों तक हंसी-मजाक के साथ यह खेल खेलते थे. किसी भी तरह के खिलौने या मैदान की जरूरत नहीं होती थी. यही इसकी सबसे बड़ी खासियत थी और यही इसे हर बच्चे का पसंदीदा खेल बनाती थी.

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डालो पत्तो बचपन का ऐसा देसी खेल था, जिसमें बच्चे पत्तों, टहनियों या आसपास की छोटी-छोटी चीजों का इस्तेमाल करके खेलते थे. यह खेल बच्चों की कल्पनाशक्ति, रचनात्मक सोच और आपसी सहयोग को बढ़ावा देता था. गांव के पेड़ों की छांव में बैठकर बच्चे इसे बड़े उत्साह से खेलते थे. साधारण होने के बावजूद यह खेल भरपूर आनंद देता था और बचपन की खूबसूरत यादों का हिस्सा बन जाता था.

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किट-किट बच्चों का सबसे लोकप्रिय पारंपरिक खेल था, जिसे जमीन पर खानों की आकृति बनाकर खेला जाता था. खिलाड़ी एक पैर पर संतुलन बनाते हुए सभी खाने पार करते थे. यह खेल शारीरिक संतुलन, फुर्ती और एकाग्रता बढ़ाने में मदद करता था. लड़कियां और लड़के दोनों इसे बड़े उत्साह से खेलते थे. बिना किसी खर्च के खेला जाने वाला यह खेल आज भी लोगों के बचपन की सबसे प्यारी यादों में शामिल है.

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हाथ ताली खेल में बच्चे एक-दूसरे के साथ ताल मिलाकर हाथ बजाते हुए गीत गाते थे. इसमें लय, तालमेल और याददाश्त का अच्छा अभ्यास होता था. हंसी-खुशी और मस्ती से भरा यह खेल बच्चों के बीच दोस्ती को और मजबूत बनाता था. किसी उपकरण की जरूरत नहीं होती थी, सिर्फ साथियों का साथ ही काफी था. यह खेल आज भी कई लोगों को अपने सुनहरे बचपन की याद दिलाता है.

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चोर-सिपाही गांव और मोहल्लों का सबसे रोमांचक खेल माना जाता था. इसमें कुछ बच्चे चोर बनते थे और बाकी सिपाही बनकर उन्हें पकड़ने की कोशिश करते थे. यह खेल दौड़, रणनीति और टीमवर्क का बेहतरीन उदाहरण था. बच्चे घंटों तक बिना थके इसे खेलते रहते थे. इस खेल ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि समझदारी और तेज निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित की.

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गोली-कंचा कभी हर गांव और गली की पहचान हुआ करता था. रंग-बिरंगे कंचों से खेला जाने वाला यह खेल बच्चों में बेहद लोकप्रिय था. इसमें सही निशाना लगाकर दूसरे खिलाड़ियों के कंचे जीतने होते थे. यह खेल धैर्य, एकाग्रता और सटीक निशाना लगाने की कला सिखाता था. मोबाइल और वीडियो गेम आने से पहले यही खेल बच्चों की सबसे बड़ी खुशी हुआ करता था.

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लुका-छिपी बचपन का सबसे मजेदार और रोमांच से भरा खेल था. एक बच्चा आंख बंद करके गिनती करता था, जबकि बाकी बच्चे छिप जाते थे. फिर उन्हें ढूंढने की चुनौती शुरू होती थी. यह खेल बच्चों की फुर्ती, समझदारी और छिपने की कला को विकसित करता था. शाम होते ही गांव और मोहल्लों में बच्चों की हंसी इसी खेल की वजह से गूंज उठती थी.

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छुआ-छुई बच्चों का बेहद आसान लेकिन रोमांचक खेल था. इसमें एक खिलाड़ी बाकी बच्चों को छूकर आउट करने की कोशिश करता था, जबकि बाकी उससे बचते हुए भागते थे. यह खेल तेज दौड़, फुर्ती और चुस्ती का बेहतरीन अभ्यास कराता था. बिना किसी सामान के खेला जाने वाला यह खेल हर गांव, गली और स्कूल के मैदान की जान हुआ करता था. इसकी यादें आज भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं.