मोबाइल से पहले बच्चों की पहली पसंद थे ये देसी खेल, आज बन गए यादें
एक समय था जब बच्चों के हाथों में मोबाइल नहीं, बल्कि सपने और शरारतें होती थीं. स्कूल की छुट्टी होते ही पूरा गांव, मोहल्ला और हर गली बच्चों की हंसी से गूंज उठती थी. मैदान ही उनका सबसे बड़ा खेल का मैदान होता था, जहां डेगा पानी, आओका पानी, डालो पत्तो, किट-किट, हाथ ताली, चोर-सिपाही, गोली-कंचा, लुका-छिपी और छुआ-छुई जैसे देसी खेल रोज़ खेले जाते थे. इन खेलों में न कोई महंगे खिलौने थे, न इंटरनेट और न ही वीडियो गेम, फिर भी खुशियों की कोई कमी नहीं थी. ये खेल बच्चों को सिर्फ मनोरंजन ही नहीं देते थे, बल्कि दोस्ती, टीमवर्क, फुर्ती, धैर्य, आत्मविश्वास और मिल-जुलकर रहने की सीख भी सिखाते थे. आज समय बदल गया है, लेकिन इन पारंपरिक खेलों की यादें आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं और सुनहरे बचपन की सबसे खूबसूरत निशानी बनकर हमेशा मुस्कुराने की वजह देती हैं













