आख़िर क्यों होती है भगवान जगन्नाथ की अधूरी प्रतिमा की पूजा? क्या है आधी-अधूरी मूर्ति का रहस्य, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

आख़िर क्यों होती है भगवान जगन्नाथ की अधूरी प्रतिमा की पूजा? क्या है आधी-अधूरी मूर्ति का रहस्य, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): भगवान जगन्नाथ का नाम लेते ही मन में सबसे पहले पुरी धाम की भव्य रथ यात्रा और उनकी अनोखी प्रतिमा की छवि उभर आती है. करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भगवान जगन्नाथ का स्वरूप अन्य देवी-देवताओं से बिल्कुल अलग दिखाई देता है. बड़ी-बड़ी गोल आंखें, लेकिन स्पष्ट हाथ और पैर नहीं. पहली नजर में ही यह प्रतिमा हर किसी के मन में एक सवाल जरूर खड़ा करती है, आखिर भगवान जगन्नाथ का स्वरूप ऐसा क्यों है? क्या यह किसी अधूरी मूर्ति का रूप है या इसके पीछे कोई दिव्य रहस्य छिपा है? धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं में इस प्रश्न का ऐसा उत्तर मिलता है, जो श्रद्धा और विश्वास दोनों को और गहरा कर देता है.

ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर को हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों में शामिल किया जाता है. यह मंदिर जितना अपनी परंपराओं और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है, उतना ही भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की अनोखी प्रतिमाओं के कारण भी चर्चा में रहता है. माना जाता है कि इन प्रतिमाओं का अधूरा स्वरूप किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरी धार्मिक कथा से जुड़ा हुआ है. पौराणिक मान्यता कहती है कि मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे. उन्होंने भगवान के दिव्य स्वरूप की प्रतिमा बनवाने का संकल्प लिया और इसके लिए देवताओं के दिव्य शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा को आमंत्रित किया.

कथा के अनुसार, विश्वकर्मा ने प्रतिमा निर्माण शुरू करने से पहले एक शर्त रखी. उन्होंने कहा कि जब तक मूर्ति निर्माण का कार्य पूरा न हो जाए, तब तक कोई भी व्यक्ति उस कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा. यदि किसी ने बीच में बाधा डाली, तो वे काम अधूरा छोड़कर तुरंत चले जाएंगे. राजा इंद्रद्युम्न ने यह शर्त स्वीकार कर ली और प्रतिमा निर्माण का कार्य शुरू हो गया. कई दिन बीत गए. राजा प्रतिदिन कक्ष के बाहर खड़े होकर भीतर से आने वाली छेनी-हथौड़ी की आवाज सुनते और धैर्य के साथ काम पूरा होने का इंतजार करते रहे. लेकिन एक दिन अचानक अंदर से कोई आवाज नहीं आई. राजा को लगा कि प्रतिमा निर्माण पूरा हो चुका है. प्रभु के दर्शन की उत्सुकता उन पर हावी हो गई और उन्होंने बिना प्रतीक्षा किए कक्ष का दरवाजा खोल दिया.

दरवाजा खुलते ही राजा ने देखा कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाएं अभी पूरी तरह तैयार नहीं हुई थीं. उसी क्षण विश्वकर्मा अपनी शर्त के अनुसार वहां से अंतर्ध्यान हो गए. मान्यता है कि तभी से भगवान जगन्नाथ का यही अधूरा स्वरूप पूजित होता आ रहा है. धार्मिक विद्वानों का मानना है कि भगवान जगन्नाथ की यह प्रतिमा केवल एक अधूरी मूर्ति नहीं, बल्कि यह संदेश देती है कि ईश्वर किसी एक आकार या पूर्ण शारीरिक रूप तक सीमित नहीं हैं. उनका स्वरूप अनंत, असीम और समस्त सृष्टि में व्याप्त है. यही कारण है कि सदियों बाद भी भगवान जगन्नाथ की यह अनूठी प्रतिमा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है.

वहीं कुछ मान्यताओं के अनुसार राजा की पत्नी ने मूर्ति बनाते समय उस कक्ष को खोला था जहाँ भगवान विश्वकर्मा भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाएं गढ़ रहे थे. दरअसल भगवान को देखने के लिए रानी की उत्सुकता इतनी बढ़ गई थी की उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने जाकर दरवाजा खोल दिया था. ऐसे में शर्त के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने प्रतिमा गढ़ने का काम अधूरा छोड़ दिया था, तबसे भगवान के आधे स्वरूप की ही पूजा की जाती है.