जब रावण मांग बैठा भगवान शिव का कामना लिंग, फिर विष्णु ने रची ऐसी माया कि देवघर में ही बस गए भोलेनाथ

जब रावण मांग बैठा भगवान शिव का कामना लिंग, फिर विष्णु ने रची ऐसी माया कि देवघर में ही बस गए भोलेनाथ

टीएनपी डेस्क(TNP DESK):सावन का महीना चल रहा है. ऐसे में देशभर से बाबा भोलेनाथ के भक्त देवघर पहुंच रहे हैं. बाबा बैद्यनाथ का धाम देश के प्रमुख शिव तीर्थों में से एक माना जाता है. वहीं, इसे भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर से जुड़ी काफी रोचक कथा है, जिसमें लंकापति रावण की भक्ति, भगवान शिव और देवताओं की चिंता का प्रसंग आता है. भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग कैसे देवघर में स्थापित किया गया, इसके पीछे की कथा काफी रोचक है. अलग-अलग धर्मग्रंथों और परंपराओं में इसका उल्लेख मिलता है. शिव पुराण की कोटि रुद्र संहिता में बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा और रावण की तपस्या की कथा विस्तार से बताई गई है. लंकापति रावण भगवान भोलेनाथ का कितना बड़ा भक्त था, यह बताने की जरूरत नहीं है. अब चलिए जानते हैं कि कैसे भगवान भोलेनाथ देवघर में स्थापित हुए.

रावण ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए की घोर तपस्या

पुरानी कथा की मानें तो भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए रावण ने घोर तपस्या की. उसने हिमालय क्षेत्र में जाकर भगवान भोलेनाथ के लिए तपस्या जारी रखी, लेकिन जब भगवान भोलेनाथ उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट नहीं हुए तो उसने भक्ति की चरम परीक्षा लेते हुए अपने सिर को एक-एक कर काटना शुरू कर दिया और भगवान भोलेनाथ के चरणों में चढ़ाने लगा. रावण ने एक-एक कर अपने नौ सिर काटकर भगवान भोलेनाथ के चरणों में अर्पित कर दिए.

वहीं, जब वह दसवां सिर अर्पित करने वाला था, तब भगवान भोलेनाथ उसके सामने आ गए.भगवान शिव ने उससे वरदान मांगने को कहा. उसने भगवान शिव से अपार शक्ति मांगी. इसके बाद उसने भगवान भोलेनाथ को अपने साथ लंका चलने के लिए कहा. लेकिन यह संभव नहीं था. भगवान भोलेनाथ ने कहा कि मैं तो नहीं जा सकता, लेकिन मेरे शिवलिंग स्वरूप को तुम लंका ले जा सकते हो. लेकिन भगवान भोलेनाथ के साथ अन्य देवी-देवताओं को यह बात सताने लगी कि यदि भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग स्वरूप को लंका ले जाया जाएगा तो रावण और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा और अत्याचार करना शुरू कर देगा. इसी वजह से शिव पुराण में भगवान भोलेनाथ से रावण द्वारा लंका चलने की इच्छा और निवेदन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है.

इस प्रकार लंका की जगह देवघर में स्थापित हुए भोलेनाथ

 वरदान के मुताबिक भगवान भोलेनाथ लंका जाने के लिए रावण के साथ तैयार हो गए. हालांकि, उन्होंने एक शर्त रखी. उन्होंने कहा कि तुम रास्ते में कहीं भी मेरे शिवलिंग को नहीं रख सकते. जहां भी मुझे रखा जाएगा, वहीं मैं स्थिर हो जाऊंगा और दोबारा मुझे हटाया नहीं जा सकेगा. भगवान भोलेनाथ की शर्त रावण ने स्वीकार कर ली और वह शिवलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा.लेकिन देवी-देवताओं को अलग चिंता हो रही थी. तभी भगवान विष्णु ने एक खेल रचा और ग्वाले के रूप में देवघर में प्रकट हुए. अचानक देवघर पहुंचते ही रास्ते में रावण को लघुशंका की जरूरत महसूस हुई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह शिवलिंग किसको दे. यदि वह उसे जमीन पर रखता तो भगवान भोलेनाथ वहीं स्थापित हो जाते. इसी डर से वह शिवलिंग को नीचे नहीं रख रहा था. तभी उसे एक ग्वाला दिखाई दिया. उसने ग्वाले को बुलाकर शिवलिंग अपने हाथ में रखने के लिए कहा और जमीन पर न रखने का आग्रह किया.रावण शिवलिंग ग्वाले को देकर लघुशंका के लिए चला गया. बहुत देर तक वापस नहीं आया. शिवलिंग का वजन काफी ज्यादा था, इसलिए ग्वाला उसका वजन ज्यादा देर तक संभाल नहीं पाया और आखिरकार उसने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया.

कथा के अनुसार, भगवान भोलेनाथ वहीं स्थापित हो गए. जब रावण वापस लघुशंका से आया तो उसने शिवलिंग को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह उसे उठा नहीं पाया. गुस्से में आकर उसने भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग को अंगूठे से धरती में धंसा दिया, जिसका चिन्ह आज भी देवघर के बाबा मंदिर के शिवलिंग में दिखाई देता है. यह ग्वाला कोई और नहीं, बल्कि भगवान विष्णु थे. इस स्थान को बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्धि मिली. शिव पुराण में इसे बैद्यनाथ, वैद्यनाथ और रावणेश्वर जैसे नामों से वर्णित किया गया है.

सबसे पहले देवी देवताओं ने की थी बैद्यनाथ धाम में पूजा

वैसे, पुराणों में इस बात का भी वर्णन मिलता है कि जब भगवान भोलेनाथ देवघर में स्थापित हुए तो सबसे पहले देवी-देवताओं ने मिलकर भगवान शिव की पूजा की और ज्योतिर्लिंग की प्रतिष्ठा की. इसी वजह से इस स्थान को प्रमुख तीर्थों में से एक माना जाता है.आपको बता दें कि भले ही रामायण में रावण का चरित्र एक ऐसे राजा के रूप में सामने आया था, जो काफी शक्तिशाली और अहंकारी था, लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि वह एक महान पंडित था और शिव का बहुत बड़ा भक्त था. उसने भगवान शिव की स्तुति के रूप में शिव तांडव स्तोत्र गया .आज देवघर में रोजाना सावन के महीने में लाखों कांवरिया देशभर से कांवर लेकर भगवान भोलेनाथ को जल अर्पित करने आते हैं. रावण की घोर तपस्या, शिव के वरदान और रास्ते में शिवलिंग के धरती पर स्थापित होने की पौराणिक कथा धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से काफी रोचक है.

इस तरह हुआ माता सती और भोलेनाथ का मिलन

वहीं दूसरी कथा की मानें तो कहा जाता है कि जब माता सती अग्निकुंड में कूदीं और उसके बाद उनके जले हुए शरीर को भगवान भोलेनाथ कंधे पर लेकर गुस्से में तांडव कर रहे थे, तो उनके विरह को कम करने के लिए भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चलाया था, जिससे माता सती के जले हुए शरीर का एक-एक अंग कट-कट कर अलग-अलग जगह पर गिरा. माना जाता है कि देवघर में माता सती का हृदय गिरा था, जहां भोलेनाथ स्थापित हो गए. वहां भगवान भोलेनाथ के बगल में माता सती का भी मंदिर है, जहां गठबंधन किया जाता है.