दुनिया भर में विजयादशमी के दिन होता है रावण दहन, पर इस जगह पर पूजे जाते हैं दशानन्द

20 अक्टूबर को विजयादशमी का त्योहार मानाया जाएगा. ऐसे में विजयादशमी के दिन देशभर में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण का पुतला जलाया जाता है.

दुनिया भर में विजयादशमी के दिन होता है रावण दहन, पर इस जगह पर पूजे जाते हैं दशानन्द

देवघर DEOGHAR): 20 अक्टूबर को विजयादशमी का त्योहार मानाया जाएगा. ऐसे में विजयादशमी के दिन देशभर में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण का पुतला जलाया जाता है, लेकिन क्या आपको पता है, हमारे भारत में भी एक जगह ऐसी है जहां रावण दहन नहीं, बल्कि दशानन की पूजा की जाती है. याह जगह और कहीं नहीं बल्कि हमरे अपने राज्य झारखंड का देवघर जिला है. यहां दशहरा मनाने की परंपरा बिल्कुल अलग है. दरअसल बाबा बैद्यनाथ की नगरी में रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें भगवान शिव के महान भक्त के रूप में सम्मान दिया जाता है. यहां की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण की तपस्या और भक्ति का बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना से गहरा संबंध है. यही वजह है कि देवघर में दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को संजोने का अवसर भी है.

रावण की भक्ति से जुड़ा है बैद्यनाथ धाम का इतिहास

देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान रखता है. इसे रावणेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है. स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, रावण भगवान शिव का परम भक्त था और उसने अपनी कठोर तपस्या से महादेव को प्रसन्न किया था. इसी कथा को बाबा बैद्यनाथ धाम में शिवलिंग की स्थापना से जोड़कर देखा जाता है. यही धार्मिक विश्वास देवघर में रावण के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करता है. यहां के लोगों का मानना है कि रावण के जीवन में कई नकारात्मक पहलू होने के बावजूद उसकी विद्वता, तपस्या और शिवभक्ति को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसलिए यहां रावण दहन की परंपरा नहीं है.

पहले रावणेश्वर का स्मरण, फिर बाबा बैद्यनाथ की पूजा

बाबा बैद्यनाथ मंदिर की पूजा परंपरा में भी रावण का विशेष उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि श्रद्धालु पूजा के दौरान 'श्रीश्री 108 रावणेश्वर बाबा वैद्यनाथ' मंत्र का उच्चारण करते हैं. इस परंपरा में पहले रावणेश्वर का स्मरण और फिर बाबा बैद्यनाथ की पूजा का महत्व बताया जाता है. मंदिर के वरिष्ठ पुजारी धर्मचंद मिश्र के अनुसार, शास्त्रों में रावण को महान विद्वान और भगवान शिव का अनन्य भक्त माना गया है. उन्होंने यह भी कहा कि रावण ने माता सीता का हरण कर गंभीर पाप किया था, जिसके कारण अंततः उसका विनाश हुआ, लेकिन उसके ज्ञान, तपस्या और भक्ति को भी याद रखना चाहिए. ऐसे में बाबा बैद्यनाथ धाम को रावण द्वारा स्थापित किए जाने की मान्यता के कारण यहां रावण दहन की परंपरा नहीं रही है. उनके अनुसार. यहां शिवभक्तों के सम्मान की परंपरा को महत्व दिया जाता है.

रावण की महिमा पर लिखा गया था झूमर

देवघर की इस परंपरा का प्रभाव यहां की लोकसंस्कृति में भी देखने को मिलता है. बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तत्कालीन सरदार पंडा भवप्रीता नंद ओझा ने रावण की महिमा पर देवघरिया भाषा में एक झूमर गीत की रचना की थी. यह गीत आज भी स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के रूप में गाया जाता है और रावण के प्रति यहां की विशिष्ट धार्मिक भावना को दर्शाता है. पंडा धर्मरक्षिणी सभा के पूर्व महामंत्री दुर्लभ मिश्र के मुताबिक, देवघर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान रावण से जुड़ी मान्यताओं से भी प्रभावित है. इसी कारण यहां दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने या उसके अपमान से जुड़ा कोई आयोजन नहीं किया जाता.

आस्था और परंपरा का अनूठा संगम है देवघर का दशहरा

मंदिर के मुख्य प्रबंधक रमेश परिहस्त के अनुसार, स्थानीय लोगों की मान्यता ही यहां रावण दहन नहीं होने का प्रमुख आधार है. देवघर में दुर्गा पूजा और विजयादशमी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है, लेकिन रावण दहन इस उत्सव का हिस्सा नहीं है. जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी पर रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है, वहीं देवघर में यह पर्व रावण की शिवभक्ति और बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी मान्यताओं को याद करने का अवसर बन जाता है. यहां की परंपरा यह भी बताती है कि किसी ऐतिहासिक या धार्मिक पात्र के जीवन का मूल्यांकन करते समय उसके अलग-अलग पहलुओं को देखा जाता है. इस तरह देवघर का दशहरा देश की विविध धार्मिक परंपराओं की एक अनूठी मिसाल है, जहां रावण के प्रति सम्मान और भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था एक साथ दिखाई देती है.