Mahalaya 2026: महालया आज, कल से नवरात्री की शुरुआत, जानिए इस दिन की खास बातें
महालया बंगाली समुदाय का प्रमुख पर्व है, जो मां दुर्गा के आगमन और दुर्गा पूजा की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. जानिए महालया का धार्मिक महत्व, पितरों के तर्पण की परंपरा और इससे जुड़ी पौराणिक कथा.
TNP DESK: बंगाली समुदाय में महालया का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. आज महालया है वहीं इसी के साथ कल से शक्ति की स्वरूपा मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा शुरू हो जाएगी. मां दुर्गा में आस्था रखने वाले श्रद्धालु हर साल इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं. महालया को मां दुर्गा के धरती पर आगमन का प्रतीक माना जाता है. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल समेत कई क्षेत्रों में दुर्गा पूजा की तैयारियां जोर पकड़ने लगती हैं. बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और पूजा पंडालों को अंतिम रूप देने का काम तेज हो जाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महालया अमावस्या पितृपक्ष के समापन से भी जुड़ी है. पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं. इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है. इस दिन लोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक विदाई देते हैं और मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियों में जुट जाते हैं.
महालया पर क्यों किया जाता है पितरों का तर्पण?
हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है. मान्यता है कि इस दौरान पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करने से उन्हें शांति मिलती है. पितृपक्ष के अंतिम दिन पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व होता है.
इस दिन परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों को याद करते हैं और विधि-विधान से तर्पण करते हैं. धार्मिक परंपरा के अनुसार, जल में तिल, कुश और पुष्प आदि मिलाकर पितरों को अर्पित किए जाते हैं. कई परिवारों में पूर्वजों की पसंद का भोजन तैयार किया जाता है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उसका एक हिस्सा गाय, कौवे, कुत्ते तथा अन्य जीवों को भी दिया जाता है.
महालया के दिन पितरों को विदाई देने के साथ ही दुर्गा पूजा के आगमन का उत्साह भी देखने को मिलता है. बंगाली समुदाय में इस दिन का विशेष महत्व है. कई स्थानों पर सुबह-सुबह मां दुर्गा की आराधना और विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
क्या है महालया का पौराणिक इतिहास?
पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर नामक राक्षस ने अपनी शक्तियों के बल पर देवताओं को पराजित कर दिया था. उसे वरदान प्राप्त था कि कोई देवता या मनुष्य उसका वध नहीं कर सकेगा. इस वरदान के कारण वह अत्याचारी हो गया और तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगा. महिषासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान विष्णु सहित अन्य देवताओं से सहायता मांगी. इसके बाद सभी देवताओं की शक्तियों से आदिशक्ति मां दुर्गा का प्राकट्य हुआ. उन्हें विभिन्न दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए गए, ताकि वह महिषासुर का अंत कर सकें.
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भीषण युद्ध हुआ. अंततः दसवें दिन देवी ने महिषासुर का वध कर दिया. इसी कारण दुर्गा पूजा को बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है. महालया को इसी पौराणिक परंपरा से जोड़कर देखा जाता है. यह दिन मां दुर्गा के आगमन और दुर्गोत्सव की शुरुआत का संदेश देता है.
झारखंड में भी दुर्गा पूजा को लेकर उत्साह
झारखंड की राजधानी रांची समेत राज्य के विभिन्न जिलों में दुर्गा पूजा को लेकर उत्साह देखने को मिलता है. बाजारों में खरीदारी बढ़ने लगती है और पूजा समितियां पंडालों को आकर्षक रूप देने में जुट जाती हैं. जगह-जगह सजावट, रोशनी और धार्मिक आयोजनों की तैयारियां की जाती हैं. महालया के साथ ही भक्तों का इंतजार और उत्साह बढ़ जाता है. श्रद्धालु मां दुर्गा के स्वागत के लिए तैयारियां शुरू कर देते हैं. यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है.