टीएनपी डेस्क(TNP):जंगल में शेर को खुलेआम घूमते देखना अपने आप में एक अलग अनुभव होता है, लेकिन इन शेरों को सुरक्षित रखना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है. इसी जिम्मेदारी और गिर के एशियाई सिंहों के संरक्षण की पूरी कहानी को सामने लाने के लिए राज्यसभा सांसद परिमल नथवाणी ने विश्व शेर दिवस यानी 10 अगस्त 2026 के मौके पर ‘गिर की अमूल्य धरोहर’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री जारी की. इस डॉक्यूमेंट्री में बताया गया है कि गिर में एशियाई सिंहों को बचाने के लिए अब तक क्या-क्या प्रयास किए गए और इसमें वन विभाग, स्थानीय लोगों और मालधारी समुदाय की क्या भूमिका रही है.डॉक्यूमेंट्री में गिर के जंगलों में आजादी से घूमते एशियाई सिंहों के साथ खास तौर पर शेरनियों की भूमिका को भी दिखाया गया है. शेरनियां अपने शावकों की देखभाल करने और सिंहों की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं. यही वजह है कि सिंहों की बढ़ती संख्या और उनके संरक्षण में शेरनियों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
प्रजनन वाले इलाकों को इंसानी दखल से बचाने जैसी कई संरक्षण योजनाओं का भी जिक्र
डॉक्यूमेंट्री में गिर के वन्यजीवों और मालधारी समुदाय के बीच पीढ़ियों से चले आ रहे रिश्ते और सह-अस्तित्व की कहानी भी दिखाई गई है. इसके साथ ही वन अधिकारियों, वनकर्मियों और ट्रैकर्स की मेहनत को भी सामने लाया गया है, जो लगातार सिंहों की निगरानी और सुरक्षा में जुटे रहते हैं.सिंहों के प्रजनन वाले इलाकों को इंसानी दखल से बचाने जैसी कई संरक्षण योजनाओं का भी इसमें जिक्र किया गया है. इन प्रयासों से सिंहों और उनके शावकों को सुरक्षित माहौल मिला है, जिससे वे आसानी से रह सकें, प्रजनन कर सकें और अपना प्राकृतिक क्षेत्र बढ़ा सकें. पिछले एक दशक में एशियाई सिंहों की संख्या में 70 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. साल 2025 में इनकी संख्या बढ़कर 891 हो गई, जबकि वयस्क शेरनियों की संख्या भी बढ़कर 330 तक पहुंच गई है.
एशियाई सिंह करीब 35 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं
सिर्फ सिंहों की संख्या ही नहीं बढ़ी है, बल्कि उनका प्राकृतिक विचरण क्षेत्र भी लगातार बढ़ रहा है. अब एशियाई सिंह करीब 35 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं. यह इलाका सौराष्ट्र के 11 जिलों की 58 तहसीलों तक फैला हुआ है. वहीं, बरडा क्षेत्र भी अब एशियाई सिंहों के दूसरे घर के तौर पर उभर रहा है. सिंहों की बढ़ती संख्या और उनके बढ़ते क्षेत्र को देखते हुए अब उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी पहले से ज्यादा बढ़ गई है.ऐसे में इंसानों और वन्यजीवों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना बेहद जरूरी है. सिंहों के प्राकृतिक क्षेत्र में बेवजह दखल न देना और उनके विचरण क्षेत्र का सम्मान करना जरूरी है. इससे सिंह अपने प्राकृतिक व्यवहार के मुताबिक रह सकेंगे और सुरक्षित तरीके से अपनी संख्या बढ़ा सकेंगे.
सिंहों के संरक्षण की यह सफलता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच
डॉक्यूमेंट्री के लोकार्पण के मौके पर परिमल नथवाणी ने कहा कि एशियाई सिंहों के संरक्षण की यह सफलता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच के साथ-साथ वन अधिकारियों और अग्रिम पंक्ति में तैनात वनकर्मियों की मेहनत का नतीजा है. उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं और स्थानीय समुदायों ने भी सिंहों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. नथवाणी ने बताया कि वह पिछले 35 वर्षों से ज्यादा समय से गिर की यात्रा कर रहे हैं और इस दौरान उन्होंने सिंहों के संरक्षण की पूरी यात्रा को करीब से देखा है.उन्होंने कहा कि अब जब सिंहों का इलाका लगातार बढ़ रहा है, तो संरक्षण के अगले चरण में सिंहों और उनके समूहों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. सिंहों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना, उनके क्षेत्र में अनावश्यक दखल से बचना और स्थानीय लोगों को वन्यजीवों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझाना जरूरी है, ताकि आज किए जा रहे संरक्षण के प्रयासों का फायदा आने वाली पीढ़ियों को भी मिल सके.
पढिए इसमें क्या दिखाया गया है
‘गिर की अमूल्य धरोहर’ परिमल नथवाणी द्वारा बनाई गई एक डॉक्यूमेंट्री है, जिसमें गिर के जंगलों, वहां की जैव-विविधता और एशियाई सिंहों के संरक्षण की कहानी दिखाई गई है. इसमें वन विभाग, स्थानीय समुदाय और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के योगदान को भी सामने लाया गया है. परिमल नथवाणी लंबे समय से गिर और एशियाई सिंहों के संरक्षण से जुड़े रहे हैं. इससे पहले उन्होंने ‘गिर गजवती आवी सिंहण’ गीत, ‘जय-वीरू नी जोड़ी’ गीत और इसी शेर-जोड़ी की कहानी पर आधारित ‘जय-वीरू नी अमर गाथा’ नामक डॉक्यूमेंट्री भी प्रस्तुत की है. वह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति के सदस्य भी हैं.

