कॉल उठाने से क्यों कतराती है Gen Z: जानिए क्या है ' Telephobia ' और क्यों फोन पर बात करने से डरते हैं आज के युवा

कॉल उठाने से क्यों कतराती है Gen Z: जानिए क्या है ' Telephobia ' और क्यों फोन पर बात करने से डरते हैं आज के युवा

टीनपी डेस्क (TNP DESK): आज के डिजिटल दौर में जहां स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है, वहीं बातचीत का तरीका पूरी तरह बदल गया है. एक जमाना था जब किसी भी जरूरी काम या हाल-चाल जानने के लिए फोन कॉल को सबसे आसान और पहला जरिया माना जाता था. लेकिन आज की 'Gen Z' (यानी 1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के शुरुआती वर्षों में पैदा हुई पीढ़ी) फोन कॉल करने या किसी का कॉल उठाने से साफ बचती नजर आती है. उन्हें फोन की घंटी बजने पर एक अजीब सी घबराहट होती है. कॉल पर लंबी बात करने के बजाय वे वॉट्सऐप मैसेज, इंस्टाग्राम डीएम (DM) या ईमेल के जरिए अपनी बात कहना ज्यादा आरामदायक और सुरक्षित समझते हैं. बड़ों को युवाओं का यह बर्ताव अजीब या गैर-जिम्मेदाराना लग सकता है, लेकिन इसके पीछे सिर्फ आलस या सुविधा नहीं, बल्कि एक गहरा मनोवैज्ञानिक कारण है, जिसे मेडिकल साइंस की भाषा में 'टेलीफोबिया' (Telephobia) कहा जाता है.

 

क्या है 'टेलीफोबिया' और इसके मुख्य लक्षण?

सरल शब्दों में कहें तो टेलीफोबिया का मतलब है फोन पर बातचीत करने से लगने वाला डर, अत्यधिक घबराहट या मानसिक असहजता. यह एक प्रकार का सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर (Social Anxiety Disorder) है. जिन लोगों को टेलीफोबिया होता है, वे फोन मिलाने से पहले कई बार सोचते हैं, मन में पूरी स्क्रिप्ट तैयार करते हैं और कॉल कटने के बाद भी इस बात का विश्लेषण करते रहते हैं कि उन्होंने क्या सही कहा और क्या गलत.

इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:

  • फोन की रिंगटोन सुनते ही अचानक दिल की धड़कनें तेज हो जाना या पसीना आना.
  • कॉल उठाने में देरी करना या जानबूझकर कॉल मिस कर देना ताकि बाद में मैसेज किया जा सके.
  • फोन पर बात करते समय शब्दों का न मिलना या हकलाना.
  • अनजान नंबरों से आने वाले फोन को देखकर अत्यधिक तनाव में आ जाना.

Gen Z आखिर क्यों कॉल से ज्यादा मैसेंजिंग को मानती है बेहतर?

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, मैसेजिंग ऐप्स ने युवाओं को अपनी बात रखने के लिए 'कंट्रोल' (नियंत्रण) और 'समय' दिया है. जब कोई युवा किसी को मैसेज भेजता है, तो उसके पास सोचने, शब्दों को सही ढंग से चुनने और अपनी बात को एडिट (सुधारने) करने का पूरा मौका होता है. इसके विपरीत, फोन कॉल पूरी तरह से 'रियल-टाइम' (तत्काल) होती है. कॉल पर आपको सामने वाले के सवाल का तुरंत जवाब देना होता है, जिससे युवाओं को लगता है कि वे कोई गलत बात न बोल दें या उनका मजाक न उड़ जाए. इसके अलावा, फोन कॉल में सामने वाले के चेहरे के हाव-भाव (Body Language) नहीं दिखते, जिससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि सामने वाला व्यक्ति आपकी बात पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है. यही अनिश्चितता युवाओं की एंग्जायटी (चिंता) को और ज्यादा बढ़ा देती है.

क्या कहती है रिसर्च?

'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ' (NIH) में छपी एक हालिया रिसर्च के अनुसार, टेलीफोबिया केवल आम युवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि हाई-स्ट्रेस वाले प्रोफेशनल्स, खासकर मेडिकल स्टूडेंट्स और कॉर्पोरेट सेक्टर के कर्मचारियों में यह काफी कॉमन पाया गया है. लगातार काम का तनाव, नींद की कमी और हर वक्त उपलब्ध रहने का दबाव (Work Pressure) युवाओं के दिमाग को इस कदर थका देता है कि उनके लिए फोन की एक सामान्य रिंगटोन भी एक बड़े 'ट्रिगर' की तरह काम करने लगती है. उन्हें डर सताता है कि फोन की घंटी का मतलब कोई नया काम, कोई बुरी खबर या किसी गलती पर मिलने वाली डांट हो सकती है. यह स्थिति धीरे-धीरे उनके मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को गंभीर रूप से प्रभावित करने लगती है.

टेलीफोबिया से बाहर निकलने के आसान उपाय

यदि आप या आपके आसपास का कोई व्यक्ति इस समस्या से जूझ रहा है, तो कुछ छोटे और व्यावहारिक कदमों से इस डर पर काबू पाया जा सकता है:

  • शुरुआत अपनों से करें: सबसे पहले अपने परिवार के सदस्यों या करीबी दोस्तों को बिना किसी हिचकिचाहट के कॉल करने की आदत डालें.
  • कॉल से पहले नोट्स बनाएं: अगर किसी जरूरी या आधिकारिक काम के लिए फोन करना है, तो मुख्य बिंदुओं को एक डायरी में पहले ही लिख लें ताकि बात करते समय घबराहट न हो.
  • फूड डिलीवरी या कस्टमर केयर से अभ्यास करें: किसी अनजान व्यक्ति से बात करने का डर निकालने के लिए खाना ऑर्डर करने या किसी सर्विस के लिए कस्टमर केयर पर छोटी-मोटी कॉल्स करें. इससे आत्मविश्वास बढ़ेगा.

टेलीफोबिया कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इलाज न हो सके; यह केवल एक मानसिक झिझक है जिसे थोड़े से अभ्यास और सही समझ के साथ आसानी से दूर किया जा सकता है.