जब हाथों में घड़ी नहीं होती थी, तब लोग समय पर कैसे पहुंचते थे? जानिए पुराने जमाने के तरीके

जब हाथों में घड़ी नहीं होती थी, तब लोग समय पर कैसे पहुंचते थे? जानिए पुराने जमाने के तरीके

टीनपी डेस्क (TNP DESK): आज के दौर में समय जानना बेहद आसान हो गया है. मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच और डिजिटल घड़ियों की मदद से हम सेकेंड तक का समय देख सकते हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब लोगों के पास न कलाई घड़ी होती थी और न ही मोबाइल फोन. इसके बावजूद लोग अपने काम के लिए समय का अंदाजा लगाते थे और कई जगहों पर तय समय पर पहुंच भी जाते थे. सवाल उठता है कि आखिर पुराने जमाने में लोग समय कैसे पहचानते थे?

सूरज था सबसे बड़ी घड़ी

पुराने समय में समय का अंदाजा लगाने का सबसे आसान तरीका सूरज था. लोग सूरज की स्थिति देखकर दिन के अलग-अलग हिस्सों का अनुमान लगाते थे. सुबह सूरज के उगने से दिन की शुरुआत मानी जाती थी, जबकि दोपहर के समय सूरज लगभग सिर के ऊपर दिखाई देता था. शाम को सूरज के ढलने से दिन खत्म होने का संकेत मिलता था. किसान और ग्रामीण जीवन जीने वाले लोग सूरज की गति और रोशनी में होने वाले बदलावों से काफी हद तक समय पहचान लेते थे. खेतों में काम करने से लेकर घर लौटने तक की दिनचर्या प्रकृति के इसी चक्र पर निर्भर रहती थी.

धूपघड़ी से मिलती थी समय की जानकारी

प्राचीन सभ्यताओं में धूपघड़ी यानी Sundial का इस्तेमाल समय जानने के लिए किया जाता था. इसमें एक सीधी छड़ या कांटा लगाया जाता था, जिसकी छाया सूर्य की दिशा बदलने के साथ अलग-अलग स्थानों पर पड़ती थी. छाया की स्थिति देखकर समय का अनुमान लगाया जाता था. धूपघड़ी के इस्तेमाल के लिए सूर्य का दिखाई देना जरूरी था, इसलिए रात या बादल वाले मौसम में यह उतनी उपयोगी नहीं होती थी. फिर भी अपने समय में यह समय मापने का महत्वपूर्ण तरीका था.

पानी से भी मापा जाता था समय

घड़ी के आधुनिक रूप से पहले पानी के सहारे समय मापने की तकनीक भी इस्तेमाल की जाती थी. इसे जल घड़ी या Water Clock कहा जाता है. एक पात्र में पानी को नियंत्रित गति से बाहर निकलने दिया जाता था और पानी के स्तर में होने वाले बदलाव से समय का अनुमान लगाया जाता था. इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल प्राचीन दुनिया की कई सभ्यताओं में अलग-अलग रूपों में हुआ. खास बात यह थी कि पानी की घड़ी सूरज पर पूरी तरह निर्भर नहीं थी, इसलिए इसे रात में भी इस्तेमाल किया जा सकता था.

रेत की घड़ी भी थी उपयोगी

रेत की घड़ी यानी Hourglass भी समय मापने का एक पुराना तरीका था. इसमें ऊपर के हिस्से में मौजूद रेत धीरे-धीरे नीचे के हिस्से में गिरती थी. पूरी रेत नीचे पहुंचने में जितना समय लगता था, वह एक निश्चित अवधि को दर्शाता था. इसका इस्तेमाल किसी काम की अवधि तय करने के लिए किया जाता था. हालांकि इससे हमेशा वर्तमान समय नहीं पता चलता था, लेकिन किसी निश्चित अवधि को मापने में यह काफी उपयोगी था.

मंदिर और घंटियों से मिलता था संकेत

पुराने समय में धार्मिक और सार्वजनिक स्थान भी लोगों के लिए समय के संकेत का काम करते थे. मंदिरों, चर्चों और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर घंटियां बजाई जाती थीं. इन घंटियों की आवाज दूर तक सुनाई देती थी और लोगों को दिन के अलग-अलग समय का संकेत मिल जाता था. कई शहरों में सार्वजनिक घड़ियां लगाई गईं, जिनसे लोगों को अपने काम और यात्राओं का समय तय करने में मदद मिलने लगी.

दिनचर्या प्रकृति के हिसाब से चलती थी

सबसे बड़ी बात यह थी कि पुराने समय में लोगों की दिनचर्या आज की तरह हर मिनट और सेकेंड से नहीं जुड़ी थी. लोग सूर्योदय, सूरज की स्थिति, मौसम, पक्षियों की गतिविधियों और आसपास की गतिविधियों से समय का अंदाजा लगाते थे.

कई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी इतनी नियमित होती थी कि उन्हें बिना घड़ी के भी पता रहता था कि कब काम शुरू करना है, कब भोजन करना है और कब घर लौटना है. यानी घड़ी के बिना भी लोग समय को समझते थे, बस उनका तरीका आज से बिल्कुल अलग था.