TNP DESK): एक समय था जब बच्चों की शामें गली-मोहल्लों की चहल-पहल से गुलजार रहती थीं. क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो, पिट्ठू, रस्सी कूद और लुका-छिपी जैसे खेल उनके बचपन का अहम हिस्सा थे. स्कूल से लौटते ही बच्चे बैग फेंककर दोस्तों के साथ मैदान की ओर दौड़ पड़ते थे. लेकिन आज का बचपन पहले जैसा नहीं रहा. स्मार्टफोन, टैबलेट, वीडियो गेम, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म ने बच्चों की दिनचर्या को पूरी तरह बदल दिया है. अब खेल के मैदान की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है. तकनीक ने जहां सीखने के नए अवसर दिए हैं, वहीं बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर भी असर डाल रहा है.

खेल के मैदान से मोबाइल स्क्रीन तक का सफर
कुछ साल पहले तक बच्चों का मनोरंजन मुख्य रूप से आउटडोर गेम्स और दोस्तों के साथ बिताए गए समय पर निर्भर था. आज अधिकांश बच्चे खाली समय में मोबाइल, टीवी या टैबलेट का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं. ऑनलाइन गेम्स, शॉर्ट वीडियो और डिजिटल कंटेंट ने उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखना आसान बना दिया है. कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई ने भी बच्चों के स्क्रीन टाइम को काफी बढ़ा दिया. हालांकि पढ़ाई सामान्य होने के बाद भी कई बच्चों की यह आदत बनी रही. अब पढ़ाई के अलावा मनोरंजन और सोशल इंटरैक्शन का बड़ा हिस्सा भी डिजिटल माध्यमों पर सिमट गया है.

स्क्रीन टाइम का बच्चों के स्वास्थ्य पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों की आंखों पर दबाव बढ़ सकता है. लगातार मोबाइल या लैपटॉप देखने से आंखों में जलन, धुंधला दिखना और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा लंबे समय तक बैठकर स्क्रीन देखने से शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं. इससे मोटापा, खराब बॉडी पोस्टर, नींद की समस्या और फिटनेस में कमी जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं. पर्याप्त शारीरिक गतिविधि न होने से बच्चों की मांसपेशियों और हड्डियों के विकास पर भी असर पड़ सकता है.

मानसिक और सामाजिक विकास पर भी पड़ रहा प्रभाव
स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग केवल शरीर ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है. कई शोध बताते हैं कि जरूरत से ज्यादा डिजिटल कंटेंट देखने वाले बच्चों में चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और तनाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.
साथ ही, जब बच्चे दोस्तों के साथ मैदान में खेलने के बजाय अकेले स्क्रीन पर समय बिताते हैं, तो उनके सामाजिक कौशल भी प्रभावित हो सकते हैं. टीमवर्क, नेतृत्व, धैर्य, हार-जीत को स्वीकार करना और आपसी संवाद जैसी बातें मैदान में खेलते समय स्वाभाविक रूप से सीखने को मिलती हैं, जिन्हें स्क्रीन पूरी तरह से नहीं सिखा सकती.
क्या तकनीक पूरी तरह गलत है?
ऐसा नहीं है कि तकनीक केवल नुकसान ही पहुंचाती है. सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए सीखने का बेहतरीन माध्यम भी बन सकते हैं. ऑनलाइन एजुकेशनल वीडियो, इंटरैक्टिव लर्निंग ऐप्स, भाषा सीखने के प्लेटफॉर्म और विज्ञान से जुड़े डिजिटल संसाधन बच्चों के ज्ञान को बढ़ाने में मदद करते हैं. समस्या तब शुरू होती है जब स्क्रीन मनोरंजन का एकमात्र साधन बन जाती है और उसका उपयोग जरूरत से ज्यादा होने लगता है. इसलिए संतुलित उपयोग सबसे महत्वपूर्ण है.

माता-पिता क्या कर सकते हैं?
बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने में माता-पिता की भूमिका सबसे अहम होती है. परिवार में स्क्रीन उपयोग के स्पष्ट नियम बनाए जा सकते हैं, जैसे खाने के समय मोबाइल का इस्तेमाल न करना, सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन बंद करना और रोजाना कुछ समय आउटडोर गतिविधियों के लिए तय करना.
माता-पिता यदि स्वयं भी मोबाइल का सीमित उपयोग करें और बच्चों के साथ खेलें, किताबें पढ़ें या अन्य रचनात्मक गतिविधियों में शामिल हों, तो बच्चे भी उसी आदत को अपनाने लगते हैं. परिवार के साथ बिताया गया गुणवत्तापूर्ण समय बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है.
संतुलन ही है बेहतर बचपन की कुंजी
तकनीक आज की जरूरत है और इससे पूरी तरह दूरी बनाना संभव भी नहीं है. लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि स्क्रीन बच्चों के बचपन पर हावी न हो जाए. खुला मैदान, दोस्तों का साथ, शारीरिक खेल, रचनात्मक गतिविधियां और परिवार के साथ बिताया गया समय आज भी बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए उतना ही जरूरी है जितना पहले था.

बदलते दौर में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाना है. यदि बच्चे स्क्रीन और वास्तविक जीवन के अनुभवों के बीच सही संतुलन बना सकें, तो वे न केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनेंगे बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से भी स्वस्थ और आत्मविश्वासी नागरिक बनकर आगे बढ़ेंगे.

