कभी हाथियों का गढ़ था दलमा, अब जंगल में नहीं दिखते झुंड! आखिर क्या है वजह?

कभी हाथियों के प्रजनन केंद्र के रूप में पहचान रखने वाला दलमा वन्यजीव अभयारण्य आज अपनी पुरानी पहचान खोता नजर आ रहा है. जिस दलमा में कभी हाथियों के झुंड की मौजूदगी पर्यटकों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करती थी, वहां अब जंगली हाथियों का दीदार करना मुश्किल हो गया है. दावा किया जा रहा है कि 193.22 वर्ग किमी में फैला दलमा वन्यजीव अभयारण्य अब सिमटकर 188.02 वर्ग किमी रह गया है.

कभी हाथियों का गढ़ था दलमा, अब जंगल में नहीं दिखते झुंड! आखिर क्या है वजह?

सरायकेला (SARAIKELA): कभी हाथियों के प्रजनन केंद्र के रूप में पहचान रखने वाला दलमा वन्यजीव अभयारण्य आज अपनी पुरानी पहचान खोता नजर आ रहा है. जिस दलमा में कभी हाथियों के झुंड की मौजूदगी पर्यटकों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करती थी, वहां अब जंगली हाथियों का दीदार करना मुश्किल हो गया है. दावा किया जा रहा है कि 193.22 वर्ग किमी में फैला दलमा वन्यजीव अभयारण्य अब सिमटकर 188.02 वर्ग किमी रह गया है. पिछले 8 से 10 वर्षों में हाथियों के झुंडों ने अभयारण्य से दूरी बना ली है और अब वे ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के चांडिल डैम जलाशय के आसपास के जंगलों में डेरा जमाए हुए हैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर हाथियों ने अपने पुराने प्राकृतिक आश्रय दलमा को क्यों छोड़ दिया?

Image

स्थानीय स्तर पर इसके पीछे भोजन, पानी और पौष्टिक आहार की कमी को प्रमुख वजह बताया जा रहा है. आरोप है कि दलमा में हाथियों के लिए पर्याप्त संसाधन और अनुकूल वातावरण उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके झुंड दूसरे इलाकों की ओर पलायन कर गए. वहीं, जंगलों की कटाई, रिसॉर्ट और कॉटेज का निर्माण, जंगलों में आग लगने की घटनाएं और विषु शिकार के नाम पर वन्यजीवों का शिकार भी चिंता का विषय बना हुआ है. कभी पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ समेत विभिन्न राज्यों से हाथियों के झुंड प्रजनन के लिए दलमा पहुंचते थे. यहां हाथियों का प्रजनन होता था और नवजात शावकों का पालन-पोषण किया जाता था. लेकिन अब वही दलमा हाथियों की मौजूदगी के लिए तरस रहा है.

Image

पर्यटकों को जंगल में नहीं दिख रहे वन्यजीव
दलमा वन्यजीव अभयारण्य आज भी झारखंड के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है. पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार समेत कई राज्यों से पर्यटक यहां जंगल सफारी का आनंद लेने पहुंचते हैं. हालांकि, पर्यटकों को जंगल भ्रमण के दौरान वन्यजीवों का दीदार नहीं हो पाने से निराशा हाथ लग रही है. पर्यटकों का कहना है कि रास्तों में लगे बड़े-बड़े होर्डिंग पर विभिन्न प्रजातियों के वन्यजीवों की तस्वीरें तो दिखाई देती हैं, लेकिन जंगल के अंदर बंदरों के अलावा दूसरे वन्यजीव नजर नहीं आते. सफारी के दौरान हाथियों का झुंड देखने की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले पर्यटकों को आखिरकार माकुलाकोचा चेकनाका स्थित हिरण पार्क में रजनी हथिनी और बादल हाथी को देखकर ही संतोष करना पड़ता है.

Image

रेस्क्यू सेंटर में बढ़ रही हाथियों की संख्या
एक तरफ दलमा से जंगली हाथियों के पलायन को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ अभयारण्य में रेस्क्यू किए गए हाथियों की संख्या बढ़ रही है. इसी कड़ी में सोमवार को सात माह के नन्हे हाथी शेखर को गुमला वन प्रमंडल से दलमा लाया गया. अब पर्यटकों को रजनी हथिनी और बादल हाथी के साथ नन्हे शेखर को देखने का भी मौका मिलेगा. दलमा पहुंचने के बाद शेखर नए माहौल में काफी चंचल नजर आया. उसे नियंत्रित करने में वनकर्मियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी. बाद में उसके दोनों पैरों में रस्सी बांधकर संभाला गया. इसके बाद रजनी हथिनी के महावत ने अपने हाथों से उसे भोजन कराया. वन विभाग को उम्मीद है कि दलमा का प्राकृतिक वातावरण और रजनी-बादल का साथ शेखर को यहां के माहौल में ढलने में मदद करेगा.

Image

दलमा की पुरानी पहचान बचाने की चुनौती
हालांकि, शेखर के आने से अभयारण्य में पर्यटकों के लिए नया आकर्षण जरूर बढ़ा है, लेकिन इससे दलमा के सामने खड़े मूल सवाल खत्म नहीं होते. आखिर हाथियों के प्राकृतिक झुंड अभयारण्य छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में क्यों जा रहे हैं? जंगल का क्षेत्रफल घटने, भोजन-पानी की उपलब्धता और वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा? पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए जंगलों में रिसॉर्ट और कॉटेज का निर्माण कितना उचित है, इस पर भी चर्चा जरूरी है. स्पष्ट है कि केवल रेस्क्यू किए गए हाथियों को रखकर दलमा की पुरानी पहचान वापस नहीं लाई जा सकती. इसके लिए जंगलों का संरक्षण, पर्याप्त भोजन-पानी, वन्यजीवों की सुरक्षा और हाथियों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित करना जरूरी होगा. वरना कभी हाथियों के प्रजनन केंद्र के रूप में मशहूर दलमा की पहचान धीरे-धीरे सिर्फ एक रेस्क्यू सेंटर तक सिमटकर रह जाएगी.

रिपोर्ट: रंजीत ओझा