गंगा की लहरों में सिमटता महाराजपुर का छठ घाट, आस्था के महापर्व पर मंडराता संकट! आखिर कब जागेगा प्रशासन?
जिले में गंगा की लहरें कभी जीवन देती हैं, कभी आस्था का प्रतीक बनती हैं, लेकिन जब यही लहरें आबादी और आस्था के ठिकानों को निगलने लगती हैं, तो लोगों की आंखों में चिंता और दिल में डर उतर आता है. साहिबगंज जिले के महाराजपुर में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है.
साहिबगंज(SAHIBGANJ): जिले में गंगा की लहरें कभी जीवन देती हैं, कभी आस्था का प्रतीक बनती हैं, लेकिन जब यही लहरें आबादी और आस्था के ठिकानों को निगलने लगती हैं, तो लोगों की आंखों में चिंता और दिल में डर उतर आता है. साहिबगंज जिले के महाराजपुर में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है. यहां गंगा का लगातार हो रहा कटाव अब केवल जमीन का संकट नहीं रह गया है, बल्कि लोकआस्था के महापर्व छठ पूजा की तैयारियों पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं.
जिस गंगा के पवित्र जल में हजारों श्रद्धालु छठ महापर्व पर आस्था की डुबकी लगाते हैं और अस्ताचलगामी तथा उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं, आज उसी गंगा की तेज धारा महाराजपुर छठ घाट के अस्तित्व के लिए चुनौती बनती जा रही है. नदी का कटाव लगातार जारी है. ग्रामीण अपने स्तर से इसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनकी मेहनत पर गंगा की तेज धारा भारी पड़ रही है.
जहां बचाव की कोशिश, वहीं गंगा का नया प्रहार
महाराजपुर के ग्रामीणों की परेशानी यह है कि वे जिस स्थान पर कटाव रोकने के लिए प्रयास करते हैं, गंगा की धारा दूसरी जगह से किनारे को काटना शुरू कर देती है. एक तरफ बचाव का प्रयास होता है, तो दूसरी तरफ जमीन कटने लगती है. इस तरह ग्रामीणों की कोशिशें लगातार चुनौती का सामना कर रही हैं.
ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक वे अपने सीमित संसाधनों से गंगा के कटाव से मुकाबला करते रहेंगे? क्या छठ घाट को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी केवल ग्रामीणों के कंधों पर ही रहेगी?

आस्था का महापर्व करीब, लेकिन घाट की हालत चिंताजनक
छठ पूजा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, विश्वास और परंपरा का प्रतीक है. महाराजपुर में भी छठ महापर्व को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है. घाट पर व्रती महिलाएं और पुरुष पूरे श्रद्धाभाव से भगवान सूर्य की उपासना करते हैं. लेकिन इस बार घाट की बिगड़ती स्थिति ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है.
यदि समय रहते कटाव पर रोक नहीं लगी और घाट को सुरक्षित नहीं किया गया, तो छठ पूजा के दौरान व्रतियों, बच्चों, बुजुर्गों और श्रद्धालुओं को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. नदी किनारे की असुरक्षित स्थिति किसी बड़ी अनहोनी का कारण भी बन सकती है.
हर साल उठती है आवाज, फिर क्यों नहीं निकलता स्थायी समाधान?
स्थानीय लोगों का कहना है कि महाराजपुर में गंगा कटाव की समस्या वर्षों से बनी हुई है. हर साल छठ पूजा के समय घाट की स्थिति को लेकर आवाज उठाई जाती है. सोशल मीडिया से लेकर समाचार पत्रों और अन्य मीडिया माध्यमों तक इस समस्या को प्रमुखता से सामने लाया जाता रहा है. बावजूद इसके अब तक स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित पहल नहीं हो सकी है.
हर साल समस्या सामने आती है, ग्रामीण परेशान होते हैं, प्रशासन से गुहार लगाई जाती है, लेकिन कटाव की समस्या फिर अगले वर्ष उसी तरह सामने खड़ी हो जाती है. ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर महाराजपुर के छठ घाट को सुरक्षित करने के लिए ठोस योजना कब बनेगी?
बजरंगी महतो की प्रशासन से भावुक अपील
महाराजपुर निवासी बजरंगी महतो ने जिला प्रशासन से हाथ जोड़कर अपील की है कि इस गंभीर समस्या को केवल एक स्थानीय परेशानी समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाए. उन्होंने छठ पूजा से पहले गंगा कटाव रोकने और घाट को सुरक्षित बनाने के लिए युद्धस्तर पर कार्य शुरू कराने की मांग की है.
उनका कहना है कि छठ व्रतियों और श्रद्धालुओं की आस्था के साथ उनकी सुरक्षा भी बेहद महत्वपूर्ण है. प्रशासन को समय रहते संज्ञान लेकर ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे श्रद्धालु सुरक्षित वातावरण में छठ महापर्व मना सकें.

प्रशासन के सामने पांच बड़े सवाल
क्या छठ पूजा से पहले महाराजपुर घाट पर कटाव रोकने की ठोस व्यवस्था होगी?
क्या संबंधित विभाग की तकनीकी टीम घाट का निरीक्षण करेगी?
क्या श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए अस्थायी और स्थायी दोनों तरह के उपाय किए जाएंगे?
क्या हर साल सामने आने वाली इस समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा?
क्या इस बार छठ महापर्व से पहले प्रशासन ग्रामीणों को राहत दे पाएगा?
यह सिर्फ घाट बचाने की लड़ाई नहीं, आस्था और सुरक्षा का सवाल है.
गंगा की धारा को रोकना आसान नहीं, लेकिन वैज्ञानिक और तकनीकी उपायों से कटाव के प्रभाव को कम करने की कोशिश जरूर की जा सकती है. जरूरत है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग समय रहते विशेषज्ञों की मदद से स्थल का निरीक्षण कर उचित कदम उठाएं.
महाराजपुर के ग्रामीणों की मांग भी बहुत बड़ी नहीं है. वे बस इतना चाहते हैं कि छठ महापर्व पर उनकी आस्था का केंद्र सुरक्षित रहे और किसी श्रद्धालु की जिंदगी खतरे में न पड़े.
गंगा की लहरों से जूझता महाराजपुर आज प्रशासन की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है. अब सवाल यही है, इस बार भी छठ घाट की चिंता सिर्फ खबरों तक सीमित रहेगी या प्रशासन की पहल से जमीन पर कोई बदलाव भी दिखाई देगा?
रिपोर्ट- गोविंद ठाकुर