स्मृति शेष: रूपी सोरेन की "मौन तपस्या" से कैसे सोरेन परिवार राजनीति के शिखर तक पंहुचा? बाबू लाल मरांडी को कैसे दी थी चुनौती
रूपी सोरेन ने झारखंड आंदोलन और शिबू सोरेन के राजनीतिक सफर में पर्दे के पीछे रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.1999 में दुमका लोकसभा सीट से उनका चुनाव लड़ना भी उनके राजनीतिक योगदान की अहम कड़ी रहा
TNP DESK- दिवंगत शिबू सोरेन की पत्नी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन अब इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन झारखंड आंदोलन के इतिहास में पर्दे के पीछे से उन्होंने जो भूमिका निभाई, चुपचाप तपस्या की, उसकी कहानी कम से कम सोरेन परिवार और झारखंड कभी भूल नहीं सकता है. धनबाद के टुंडी विधानसभा से 1977 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद शिबू सोरेन संथाल परगना का रुख किया और फिर दुमका को अपने राजनीतिक जीवन का केंद्र बना लिया. देखते -देखते आदिवासियों का नेता बन गए. समय ने पलटा खाया, 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के बाबूलाल मरांडी से शिबू सोरेन चुनाव हार गए थे. इसके बाद वह राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. इसके एक साल बाद जब 1999 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई, तो दुमका सीट पर रूपी सोरेन को झामुमो ने उतारने का फैसला किया.
उस समय दुर्गा सोरेन जीवित थे और खूब पसीना बहाया था
इस चुनाव में रूपी सोरेन का मुकाबला भाजपा के बाबूलाल मरांडी से हुआ. जानकार बताते हैं कि चुनाव प्रचार की कमान स्वयं शिबू सोरेन और उनके बेटे दुर्गा सोरेन(अब स्वर्गीय ) ने संभाली थी. दुमका उस समय संथाल परगना की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था. 1999 में एक तरफ शिबू सोरेन की वर्षों पुरानी राजनीति की विरासत थी, तो दूसरी ओर बाबूलाल मरांडी भाजपा के मजबूत आदिवासी चेहरा के रूप में उभर चुके थे. 1998 में शिबू सोरेन को लगभग 13,000 वोटो से बाबूलाल मरांडी ने हराया था. ऐसे में 1999 का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हो चला था. 1999 में दुमका में सोरेन परिवार की बड़ी परीक्षा थी. यह अलग बात है कि 1999 में भी बाबूलाल मरांडी ने ही चुनाव जीता, लेकिन रूपी सोरेन ने बाबूलाल मरांडी की सांसें अटका कर रख दी थी. इस सीट पर बाबूलाल मरांडी को कड़ा संघर्ष करना पड़ा था.
दुमका लोकसभा सीट पर केवल 4,648 मतों से हारीं थी रूपी सोरेन
आंकड़े बताते हैं कि बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले जबकि झामुमो से लड़ रही रूपी सोरेन को 1,96,493 वोट मिले थे. 4,648 मतों से वह चुनाव हार गई थी. मतगणना के साथ ही उस समय बाबूलाल मरांडी की धड़कनें बढ़ती गई थी. यह अलग बात है कि अंततः विजय उन्हीं की हुई. 1999 के बाद रूपी सोरेन ने कोई चुनाव नहीं लड़ा. धनबाद के झामुमो के एक नेता के अनुसार 1 जनवरी 1962 को रूपी सोरेन का विवाह शिबू सोरेन के साथ हुआ था. समय चलता रहा. जामा से विधायक रहे बड़े बेटे दुर्गा सोरेन का निधन 2009 में हो गया. यह सोरेन परिवार के लिए बड़ा आघात था. उनके बेटे हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं और छोटे बेटे बसंत सोरेन दुमका से विधायक हैं. बेटी अंजनी सोरेन भी झामुमो से जुड़ी हैं और ओडिशा में सक्रिय हैं. इसके पहले एक समय ऐसा आया जब शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर झारखंड आंदोलन से राज्य की सत्ता और राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंच गया. परिवार के दूसरे सदस्य भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए, लेकिन इस पूरी यात्रा में रूपी सोरेन की तपस्या ही थी, जिन्होंने वर्षों तक परिवार को संभालते हुए अगली पीढ़ी को तैयार किया: