हरमू चौक का नया नाम! पुरानी पहचान पर सवाल, क्या शहीद जनरल वैद्य का नाम हटाना उचित?
राजधानी रांची का चर्चित हरमू चौक बुधवार यानी 7 अक्टूबर से एक नए नाम के साथ नजर आया. भाजपा ने हरमू चौक पर ‘विकसित भारत संकल्प सेवा चौक’ नाम का बोर्ड लगाया.
राजधानी रांची का चर्चित हरमू चौक बुधवार यानी 7 अक्टूबर से एक नए नाम के साथ नजर आया. भाजपा ने हरमू चौक पर ‘विकसित भारत संकल्प सेवा चौक’ नाम का बोर्ड लगाया.
Tnp desk राजधानी रांची का चर्चित हरमू चौक बुधवार यानी 7 अक्टूबर से एक नए नाम के साथ नजर आया. भाजपा ने हरमू चौक पर ‘विकसित भारत संकल्प सेवा चौक’ नाम का बोर्ड लगाया. इस दौरान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू, विधायक सीपी सिंह, विधायक नवीन जायसवाल समेत बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता मौजूद रहे. रांची में 7 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सेवा ज्योति यात्रा और विकसित भारत संकल्प सभा का आयोजन भी किया गया.
पुरानी पहचान का क्या होगा
लेकिन इस नए नाम के साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है. आखिर उस चौक की पुरानी पहचान का क्या होगा, जिसे लंबे समय से लोग ‘शहीद जनरल वैद्य चौक’ के नाम से जानते रहे हैं. जनरल अरुणकुमार श्रीधर वैद्य भारतीय सेना के पूर्व थलसेना अध्यक्ष थे. जून 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना और नेतृत्व में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. 10 अगस्त 1986 को पुणे में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उनकी हत्या ऑपरेशन ब्लू स्टार में उनकी भूमिका के प्रतिशोध के तौर पर खालिस्तानी आतंकवादियों ने की थी. इस मामले में हरजिंदर सिंह जिंदा और सुखदेव सिंह सुखा को दोषी ठहराया गया था। इसलिए जनरल वैद्य के नाम से जुड़ा चौक महज एक भौगोलिक पहचान नहीं है. यह एक पूर्व सेना प्रमुख की स्मृति और उनके सैन्य जीवन से जुड़े इतिहास का भी प्रतीक रहा है. ऐसे में चौक का नाम बदलने की पहल के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी नई विचारधारा, अभियान या राजनीतिक संदेश को स्थापित करने के लिए पुरानी ऐतिहासिक पहचान को पूरी तरह हटाना जरूरी था.
भाजपा की ओर से ‘विकसित भारत संकल्प सेवा चौक’ नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में सेवा के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर से जोड़ा गया है. पार्टी के लिए यह नामकरण उसके सेवा और विकसित भारत के अभियान का हिस्सा हो सकता है. लेकिन शहर की सार्वजनिक स्मृतियों में किसी शहीद या सैन्य अधिकारी के नाम की अपनी अलग जगह होती है.क्या दोनों पहचानों को साथ रखा जा सकता था. क्या ‘शहीद जनरल वैद्य चौक’ की पहचान बरकरार रखते हुए ‘विकसित भारत संकल्प सेवा चौक’ को किसी दूसरे तरीके से जोड़ा जा सकता था. यह सवाल अब रांची के लोगों के बीच चर्चा का विषय बन सकता है.
नामकरण केवल बोर्ड बदलने की प्रक्रिया नहीं है. किसी सार्वजनिक स्थान का नाम उसके इतिहास, स्मृति और भावनाओं से भी जुड़ता है. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नया नाम क्या रखा गया. बड़ा सवाल यह है कि पुरानी पहचान के साथ न्याय कैसे होगा.विकास और सेवा के नए संदेश के साथ इतिहास और बलिदान की पुरानी स्मृति भी कायम रहे, यही इस पूरे नामकरण विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है.