झारखंड में मत्स्य पालन को मिली नई रफ्तार, 3.63 लाख टन पहुंचा मछली उत्पादन
झारखंड में मछली पालन तेजी से ग्रामीण रोजगार और आय का बड़ा जरिया बन रहा है. राज्य में 1.48 लाख से ज्यादा जल निकायों का इस्तेमाल हो रहा है और मछली उत्पादन 3.63 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है.
रांची (RANCHI): झारखंड भले ही समुद्र से दूर है, लेकिन मछली पालन के क्षेत्र में राज्य तेजी से अपनी पहचान बना रहा है. तालाब, जलाशय, डैम, नदियां और दूसरे जल स्रोत अब हजारों लोगों के लिए रोजगार और आमदनी का जरिया बन रहे हैं. सरकारी योजनाओं के साथ किसानों और मछुआरों की मेहनत का असर भी अब आंकड़ों में दिखाई देने लगा है.
राज्य में फिलहाल 1,48,699 जल निकाय हैं. इनमें 1,30,740 निजी तालाब और 17,959 सरकारी तालाब शामिल हैं. इसके अलावा 436 बड़े जलाशय, 9,360 चेक डैम और आहर भी मत्स्य पालन के काम आ रहे हैं. कोयला खदानों और खदान क्षेत्रों में बने 1,741 जल स्रोतों का इस्तेमाल भी मछली पालन के लिए किया जा रहा है. राज्य में करीब 1,800 किलोमीटर लंबी नदियां हैं. वहीं, मनरेगा के तहत बने 2,04,000 सिंचाई कूप और 1,35,297 डोभा भी जल संरक्षण और मछली पालन को बढ़ावा दे रहे हैं.
3.63 लाख टन तक पहुंचा मछली उत्पादन
झारखंड में मछली उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. फिलहाल राज्य में करीब 3,63,000 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हो रहा है. आने वाले समय में इसे बढ़ाकर 4,10,000 मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा गया है. राज्य में मछली उत्पादन की उत्पादकता करीब 2,850 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष है. यह राष्ट्रीय औसत 3,000 किलोग्राम के काफी करीब है.
मछली उत्पादन के साथ-साथ मछली बीज तैयार करने पर भी जोर दिया जा रहा है. राज्य में मछली बीज का उत्पादन 963.06 करोड़ तक पहुंच गया है. अब इसे बढ़ाकर 1,250 करोड़ करने का लक्ष्य रखा गया है. इससे राज्य में मछली पालन का दायरा और बढ़ने की उम्मीद है.
केज कल्चर से बढ़ रहा उत्पादन
झारखंड में अब मछली पालन सिर्फ पारंपरिक तालाबों तक सीमित नहीं है. बड़े जलाशयों में आधुनिक तकनीक के जरिए केज कल्चर को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. राज्य में अब तक 11,941 केज लगाए जा चुके हैं. एक केज से करीब 3 से 4 टन तक मछली का उत्पादन हो रहा है.
मछली किसानों को तकनीकी जानकारी और प्रशिक्षण देने के लिए भी व्यवस्था मजबूत की गई है. रांची में डायरेक्टरेट ऑफ फिशरीज, मछली किसान प्रशिक्षण केंद्र और मछली अनुसंधान केंद्र काम कर रहे हैं. झास्कोफिश के साथ राज्य के सभी 24 जिलों में जिला मत्स्य कार्यालय भी विभागीय योजनाओं को जमीन पर पहुंचाने में जुटे हैं.
इसके अलावा राज्य में 106 निजी और 18 विभागीय हैचरी संचालित हैं. इन हैचरियों के जरिए मछली बीज की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.
1.73 लाख से ज्यादा मछुआरे जुड़े
झारखंड में मत्स्य पालन से बड़ी संख्या में लोग सीधे जुड़े हुए हैं. राज्य में 1,73,941 सक्रिय मछुआरे हैं, जबकि 50,219 लोग मत्स्य सहकारिता समितियों के सदस्य हैं. सरकार की योजनाओं के जरिए मछुआरा परिवारों को आवास और दूसरी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं.
अब तक 23,482 पक्के मछुआरा आवास और वेदव्यास आवास बनाए जा चुके हैं. वहीं, मछुआरों को दुर्घटना की स्थिति में आर्थिक मदद देने के लिए सामूहिक दुर्घटना बीमा योजना भी चलाई जा रही है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में इस योजना के तहत 6,212 मछुआरों को बीमा सुरक्षा दी गई.
इन प्रयासों से झारखंड में मत्स्य पालन अब सिर्फ मछली उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है. यह ग्रामीण इलाकों में रोजगार, स्वरोजगार और आय बढ़ाने का एक अहम साधन बनता जा रहा है.