बड़ी खबर : JSSC CGL पर बड़ा दावा,  केस डायरी में पेपर लीक के सबूत, सरकार ने कोर्ट से छिपाई सच्चाई?

बड़ी खबर : JSSC CGL पर  बड़ा दावा,  केस डायरी में पेपर लीक के सबूत, सरकार ने कोर्ट से छिपाई सच्चाई?

रांची :JSSC CGL परीक्षा को लेकर विवाद एक बार फिर गहराता नजर आ रहा है. पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार ने परीक्षा की निष्पक्षता, जांच और सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका दावा है कि केस डायरी में ऐसे कई तथ्य और साक्ष्य दर्ज हैं, जो परीक्षा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और कथित पेपर लीक की ओर इशारा करते हैं.

अजीत कुमार के मुताबिक, इस बार पूरा प्रश्नपत्र छात्रों तक पहुंचने का दावा नहीं है, बल्कि एक ऐसा जवाब का पत्र सामने आया था, जिसमें प्रश्नों के सभी विकल्प हटाकर केवल सही उत्तर का विकल्प दिया गया था. उनका दावा है कि परीक्षा शुरू होने से पहले नेपाल में एक कैंप चलाया जा रहा था, जहां अभ्यर्थियों को कथित तौर पर उत्तर याद कराए जा रहे थे.

उन्होंने बताया कि जांच के दौरान एक छात्र ने कथित तौर पर बताया कि उसे 120 उत्तर रटवाए गए थे.बाद में जब परीक्षा हुई तो करीब 135 में से 120 प्रश्नों के उत्तर मैच होने की बात जांच में सामने आई. इसके बाद नेपाल के बाद पश्चिम बंगाल के नयामतपुर में भी कथित कैंप चलाए जाने की जानकारी सामने आई.

अजीत कुमार का दावा है कि छात्रों ने CID को कई साक्ष्य उपलब्ध कराए थे. इन साक्ष्यों से परीक्षा में गड़बड़ी की आशंका मजबूत होती थी. लेकिन, उनके मुताबिक, जब मामला कोर्ट पहुंचा तो राज्य सरकार की ओर से रिजल्ट पर लगी रोक हटाने के लिए अलग-अलग दलीलें दी गईं.

उन्होंने आरोप लगाया कि  केस डायरी में मौजूद साक्ष्यों के बावजूद शपथपत्र के माध्यम से कोर्ट के सामने पेपर लीक के आरोपों को कमजोर तरीके से पेश किया गया. कोर्ट को यह बताया गया कि बरामद दस्तावेज कोई लीक पेपर नहीं, बल्कि छात्रों द्वारा तैयार किया गया गेस पेपर था.

पूर्व महाधिवक्ता ने केस डायरी का हवाला देते हुए एक और गंभीर दावा किया. उनके मुताबिक, एक व्यक्ति ने 28 अभ्यर्थियों को पटना के रास्ते नेपाल पहुंचाया था और इसके एवज में करीब 8 लाख रुपये मिलने तथा औरंगाबाद के एक बैंक खाते में रकम भेजे जाने का उल्लेख केस डायरी में है.

उनका कहना है कि यदि  135 में से 120 प्रश्नों के उत्तर मैच होने जैसी बात केस डायरी में दर्ज है, तो इसे महज संयोग मानकर खारिज नहीं किया जा सकता. सवाल यह है कि इन तथ्यों की जांच पूरी तरह क्यों नहीं हुई?
कोर्ट के आदेश को लेकर भी सवाल

अजीत कुमार के मुताबिक, कोर्ट ने परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ी की जांच छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया था. उनका दावा है कि जांच निर्धारित समय में पूरी नहीं हुई.

उनके अनुसार, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि जांच में पेपर लीक का मामला सामने आता है, तो आगे परीक्षा रद्द करने पर विचार किया जा सकता है. ऐसे में अब बड़ा सवाल यह है कि जब जांच में कथित तौर पर महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद हैं, तो सरकार परीक्षा रद्द करने या आगे की कार्रवाई पर निर्णय क्यों नहीं ले रही है?

 JSSC-JPSC की कार्यप्रणाली पर भी सवाल

अजीत कुमार ने सिर्फ JSSC CGL तक सवाल सीमित नहीं रखे. उन्होंने  JSSC और JPSC की कार्यप्रणाली तथा नियुक्ति नियमों  पर भी सवाल उठाए.

उन्होंने सहायक आचार्य नियुक्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि B.Ed. की अवधि और पात्रता से जुड़े नियमों में बदलाव के बाद झारखंड में निकाले गए विज्ञापन में एक वर्षीय B.Ed. को ही मान्यता दिए जाने का प्रावधान रखा गया. उनका सवाल है कि यदि अलग-अलग अवधि की डिग्री को लेकर नियमों में बदलाव हुआ है, तो नियुक्ति प्रक्रिया में अभ्यर्थियों के हितों का ध्यान क्यों नहीं रखा गया?

 सबसे बड़ा सवाल

पूरे विवाद में अब मूल सवाल यही है. अगर जांच में केस डायरी के भीतर पेपर लीक या परीक्षा में संगठित गड़बड़ी के साक्ष्य मौजूद हैं, तो सरकार और जांच एजेंसी ने अब तक अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश क्यों नहीं की?

और दूसरा सवाल. क्या कोर्ट के आदेश के तहत आयोजित परीक्षा होने भर से बाद में सामने आए कथित पेपर लीक या संगठित धांधली के आरोपों की जांच और संभावित कार्रवाई पर रोक लग जाती है?

इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि JSSC CGL का विवाद महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप है या फिर परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर कानूनी और प्रशासनिक सवाल खड़े करता है.