टीएनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड में राज्यसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही सियासी हलचल तेज हो गई है. दो सीटों पर होने वाले चुनाव ने महागठबंधन और भाजपा दोनों खेमों में हलचल बढ़ा दी है. एक सीट दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है, जबकि दूसरी सीट भाजपा नेता दीपक प्रकाश का कार्यकाल समाप्त होने के कारण रिक्त हो रही है. अब सवाल यह है कि दिल्ली के ऊपरी सदन में कौन जाएगा और किस दल का कौन सा चेहरा दांव पर लगाया जाएगा.
महागठबंधन के पास संख्या बल ऐसा है कि वह दोनों सीटें जीत सकता है, लेकिन अंदरखाने टिकट को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी है. कांग्रेस इस बार एक सीट पर मजबूत दावा ठोक रही है. पार्टी के भीतर कई बड़े नेता टिकट की दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं. इनमें राजेश ठाकुर, प्रदीप बलमुचू, सुबोधकांत सहाय और फुरकान अंसारी जैसे नाम चर्चा में हैं. वहीं शहजादा अनवर ने भी पार्टी आलाकमान से अपनी दावेदारी पेश कर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है.
दूसरी ओर झामुमो फिलहाल अपने पत्ते खोलने से बच रही है. पार्टी नेतृत्व ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति पर काम कर रहा है. इसी बीच शिबू सोरेन की बेटी अंजलि सोरेन ने चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी है, जिससे राजनीतिक समीकरण और दिलचस्प हो गए हैं. माना जा रहा है कि झामुमो अंतिम समय तक अपने उम्मीदवार को लेकर रणनीतिक चुप्पी बनाए रख सकता है.
उधर भाजपा ने साफ संकेत दिया है कि इस बार किसी बाहरी या निर्दलीय चेहरे पर दांव नहीं लगाया जाएगा. पार्टी अपने समर्पित नेता को ही मैदान में उतारने की तैयारी में है. भाजपा खेमे में दीपक प्रकाश, रघुवर दास और आशा लकड़ा के नाम चर्चा में हैं, लेकिन सबसे ज्यादा सुर्खियां अर्जुन मुंडा और आईआरएस अधिकारी निशा उरांव को लेकर हैं.
निशा उरांव का नाम सामने आने के पीछे कई राजनीतिक वजहें मानी जा रही हैं. वह कांग्रेस विधायक और वरिष्ठ आदिवासी नेता रामेश्वर उरांव की बेटी हैं. ऐसे में भाजपा अगर उन्हें उम्मीदवार बनाती है तो यह कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक झटका साबित हो सकता है. साथ ही भाजपा एक शिक्षित और युवा आदिवासी महिला चेहरे को सामने लाकर नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी कर सकती है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि 2029 की राजनीति की दिशा तय करने वाला संकेत भी बन सकता है. इसलिए सभी दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुट गए हैं.