जामताड़ा का ये आदिवासी समुदाय अनोखे अंदाज में मनाया जाता है नवरात्रि का त्योहार, जानिए दशाय पर्व की खास परंपरा

झारखंड के जामताड़ा में दुर्गा पूजा के दौरान आदिवासी समुदाय दशाय पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों, लोकगीतों और लोकनृत्य के साथ मनाता है.

जामताड़ा का ये आदिवासी समुदाय अनोखे अंदाज में मनाया जाता है नवरात्रि का त्योहार, जानिए दशाय पर्व की खास परंपरा

जामताड़ा(Jamtara) : झारखंड में बसा जामताड़ा एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आए दिन वारदातों, चोरी और लूट जैसी खबरें सामने आती रहती हैं. लेकिन अब जामताड़ा अपने एक अलग ही रूप में सामने आ रहा है. नवरात्रि के इस शुभ अवसर पर जहां लोग अपनी-अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार त्योहार मनाते हैं, वहीं दूसरी ओर जामताड़ा में पारंपरिक रीति-रिवाजों और आदिवासी समुदायों से जुड़ी लोककथाओं के तालमेल से इस त्योहार को मनाया जाता है. यहां के लोग अपने लोकनृत्य के माध्यम से इस परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने का काम करते हैं. सदियों से चली आ रही इस परंपरा में महिलाएं और बच्चे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और त्योहार को उत्साहपूर्वक मनाते हैं.

जामताड़ा के इस जनजातीय समुदाय को खास बनाने में उनकी पारंपरिक वेशभूषा की भी अहम भूमिका है. नीला दुपट्टा और सिर पर मोर पंख धारण कर यहां के आदिवासी समुदाय के लोग अपने आसपास के लोगों और दर्शकों का मन मोह लेते हैं. ढोल की थाप पर नृत्य करना और लोकगीतों के माध्यम से अपनी संस्कृति को प्रस्तुत करना उन्हें प्रशंसा का पात्र बनाता है.

आपको बता दें कि झारखंड के इस आदिवासी समाज में दुर्गा पूजा के दौरान दशाय पर्व मनाने की एक प्राचीन परंपरा प्रचलित है. समुदाय के लोगों के अनुसार, इस पर्व की तैयारियां रोहिणी नक्षत्र से ही शुरू हो जाती हैं और दुर्गा पूजा के दौरान विशेष अनुष्ठानों के साथ इसका आयोजन किया जाता है.

आदिवासी समुदाय कैसे मनाता है नवरात्रि का यह पावन त्योहार?

सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, दुर्गा पूजा के बेलभरण के दिन आदिवासी समाज के कुछ समुदायों में सफेद मुर्गे की बलि देने की प्रथा है. इसके बाद लगातार पांच दिनों तक दशाय नृत्य किया जाता है. इस दौरान लोग पारंपरिक पोशाक पहनते हैं और सिर पर मोर पंख सजाकर गांव-गांव घूमते हुए नृत्य एवं गायन करते हैं.

यह आयोजन आदिवासी समाज की पारंपरिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा में गुरु-शिष्य परंपरा का भी विशेष महत्व बताया जाता है. दुर्गा पूजा के दौरान मनाए जाने वाले इस पर्व को दशाय पूजा के नाम से भी जाना जाता है, जिसका महत्व जानना आम लोगों के लिए बेहद खास है.

वहीं, अन्य मान्यताओं के अनुसार, हर साल इस त्योहार के दौरान राजा वेश बदलकर अपनी आराध्य देवी दुर्गा की खोज में निकलता है. इसी भाव को कलाकार पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं.

आदिवासी समुदाय के साहित्यकार भी मानते हैं इस परंपरा को बेहद खास

झारखंड के आदिवासी समुदाय के साहित्यकार, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुशील हांसदा के अनुसार, आदिवासी समाज में दशाय पर्व का गहरा सांस्कृतिक महत्व है. उन्होंने बताया कि इस पर्व के दौरान लोग वेश बदलकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हैं और गुरु, हृदय तथा दुर्गा की खोज से जुड़ी परंपरा का निर्वाह करते हैं. पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आदिवासी समाज की लोकसंस्कृति, आस्था और सामुदायिक विरासत को दर्शाती है.

झारखंड के इस आदिवासी समुदाय को जानना और उसकी लोककथाओं को महसूस करना इतना भी कठिन नहीं है. मां दुर्गा के प्रति आस्था और विश्वास हर समुदाय में अपने-अपने तरीके से देखने को मिलता है. जामताड़ा का दशाय पर्व इसी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विविधता का एक अनूठा उदाहरण है.